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राजस्थान: 1 जनवरी, 2017 तक अगर आप 'चोर' थे तो अब मिलेगी जमीन

राजस्थान के 45 हजार गांवों में सरकारी जमीन पर कब्जा किए बैठे 3 लाख से ज्यादा लोगों को पट्टा देने की योजना है

Updated On: Oct 07, 2017 10:57 AM IST

Mahendra Saini
स्वतंत्र पत्रकार

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राजस्थान: 1 जनवरी, 2017 तक अगर आप 'चोर' थे तो अब मिलेगी जमीन

देश की अर्थव्यवस्था को लगातार बदहाल बताया जा रहा है. मोदीनॉमिक्स पर अपने ही चौतरफा हमले कर रहे हैं. लोगों की ही नहीं, सरकार की भी कमाई घट रही है. ऐसे में राजस्थान सरकार ने राजस्व बढ़ाने का एक ऐसा तरीका निकाला है, जिसमें 'चोरों' को इनाम दिया जाएगा. बस शर्त ये है कि आप 1 जनवरी, 2017 से पहले के 'चोर' हों, बाद के नहीं.

राजे सरकार की ये मेहर आम चोरों पर नहीं होगी. सरकार 'जमीन चोरों' पर दया दिखाएगी. वो जमीन चोर, जिन्होंने 1 जनवरी, 2017 तक गांवों में सरकार की जमीन चुराई हो यानी सरकारी जमीन पर अतिक्रमण किया हो, अपने घर-खेत के बगल के आम रास्ते का कुछ या पूरा हिस्सा दबा लिया हो या फिर चारागाह या सामुदायिक संपत्ति जैसे तालाब आदि पर कब्जा कर लिया हो.

ऐसे सभी बाहुबली बदमाशों के लिए राजे सरकार ने अपनी चौथी वर्षगांठ से पहले तोहफा पेश किया है. तहसीलदारों से 'जमीन चोरों' की सर्वे रिपोर्ट मांगी जा चुकी है. अब तैयारी राजस्थान के 45 हजार गांवों में सरकारी जमीन पर कब्जा किए बैठे 3 लाख से ज्यादा लोगों को पट्टा देकर इसका मालिक बनाने की है.

नजर में सिर्फ वोट, ईमान में खोट! 

Photo. Pradesh 18.

अभी जून से अगस्त तक शिविर लगा-लगाकर करीब 8 से 10 लाख पट्टे बांटे गए थे. इसी के विस्तार में अब गांवों में 300 गज तक सिवायचक यानी सरकारी जमीन पर कब्जा जमाए लोगों को बड़ी आसानी से मालिकाना हक देने की तैयारी कर ली गई है. हालांकि इसके बदले सरकार जमीन की डीएलसी कीमत वसूलेगी.

जानकारों की राय में ये मतदाताओं को एक तरह की 'रिश्वत' देने की कोशिश है. हालिया समय में किसान और ग्रामीणों में राजे सरकार के खिलाफ नाराजगी खुलकर देखी गई है. सीकर में कर्ज माफी के लिए किसान आंदोलन कर चुके हैं. अब किसानों के समर्थन में कांग्रेस राज्य भर में पदयात्राओं के जरिए खासी भीड़ भी जुटा रही है.

कांग्रेस की सभाओं में जुट रही इसी भीड़ से बीजेपी सरकार परेशान है. इसीलिए 2018 में होने वाले विधानसभा चुनावों से पहले ग्रामीणों और किसानों को रिझाने के लिए ये दांव खेला जा रहा है. हालांकि कांग्रेस अध्यक्ष सचिन पायलट का कहना है कि राजे सरकार की नाकामियों से पर्दा उठ चुका है. अब न किसान बीजेपी के झांसे में आने वाले हैं और न ही ग्रामीण.

ऐसा नहीं है कि सिर्फ गांवों पर ही वसुंधरा राजे सरकार की नजर है. पिछले दिनों मास्टरप्लान की गंभीर अनदेखी कर बड़े शहरों में 40 फीट और छोटे शहरों में 30 फीट सड़कों पर भी व्यावसायिक गतिविधियों के लिए नियम बना दिया गया था. लेकिन इस पर मानवाधिकार आयोग और कोर्ट के दखल के कारण सरकार को कदम वापस खींचने पड़े.

सरकार बनी सुपर बॉस, कोर्ट का भी नहीं डर 

vasundhara

अभी 4 अक्टूबर को ही राजस्थान हाइकोर्ट में मास्टर प्लान से जुड़ी एक जनहित याचिका की सुनवाई में न्यायाधीशों ने कड़ी टिप्पणी की है. जस्टिस संगीतराज लोढ़ा और जस्टिस अरुण भंसाली ने कहा कि राज्य में जिस तरह से बर्बादी हो रही है, उससे तो अच्छा है कि भू-परिवर्तन का काम रुक ही जाए.

लेकिन लगता नहीं कि राजस्थान सरकार को किसी की परवाह भी है. 4 अक्टूबर को ही राजे कैबिनेट ने राजस्थान काश्तकारी अधिनियम, 1955 में संशोधन का फैसला कर लिया. इस संशोधन से अब चरागाहों यानी गांवों में जानवरों के चरने के लिए आरक्षित जमीन के नियमों में भारी बदलाव हो जाएगा.

पहले, चारागाह भूमि को कृषि और अकृषि उपयोग के लिए अलग करते वक्त उतनी ही जमीन उसी पंचायत में रिजर्व करने का नियम था. लेकिन संशोधन के बाद अब पंचायत में जमीन न मिलने पर पूरे जिले में कहीं भी अलग कर चारागाह के लिए जमीन आरक्षित की जा सकेगी.

मिसाल के तौर पर अलवर जिले के नीमराणा में जमीन की कीमत 2 से 5 करोड़ प्रति बीघा की है. यहां पर चारागाह की जमीन लेने वाला जिले के ही मेवात इलाके में बदले में जमीन देने की पेशकश कर सकता है, जहां कीमत 10 लाख बीघा से भी कम हो सकते हैं. एडवोकेट फतेह सिंह का कहना है कि इस संशोधन की आड़ में प्राइम लैंड को हड़पने का खेल भी शुरू हो सकता है.

अपनों के लिए खास रेवड़ियां

राजस्थान में एक पुरानी कहावत भी आजकल खूब सच हो रही है- अंधा बांटे रेवड़ियां, फिर-फिर अपनों को दे. राजनीतिक रेवड़ियों की बंदरबांट में राजस्थान सरकार अपने अधिकारों के सही-गलत उपयोग में भी पीछे नहीं है. सरकार अब बीजेपी को जिलों में दफ्तर खोलने के लिए भी जमीन दे रही है.

28 जिलों में तो जमीन आवंटित भी की जा चुकी है. ये सारी जमीन आवासीय या कमर्शियल है. इनका लैंड यूज बदल कर इंस्टिट्यूशनल कर दिया गया है. नगरीय विकास विभाग ने तुरंत अलॉटमेंट के लिए इन मामलों को व्यापक जनहित का बता दिया.

क्या ईमानदार होना बेवकूफी है? 

कांग्रेस ने इसे एक बड़ा घपला बताते हुए आरोप लगाया है कि सरकार ने अपने संगठन को चुन-चुन कर वही प्लॉट अलॉट किए हैं जो प्राइम लोकेशन पर हैं. लेकिन मेरी राय में ये सिर्फ एक घपला नहीं हो सकता. वास्तव में ये उन करदाताओं से धोखा है जिनके बूते सरकार अपना खर्च चलाती है. ये उन ईमानदार लोगों से भी धोखा है, जो सरकारी संपत्तियों को नहीं चुराते हैं.

जरा सोचिए, वोट बैंक की राजनीति के क्या नतीजे सामने आ रहे हैं. जो सार्वजनिक जमीन पर जबरन कब्जा किए बैठा है, उसे इनाम में जमीन दी जा रही है. जो कर्ज लेकर चुकाता नहीं है, उसका कर्ज माफ किया जा रहा है. जो बिजली का बिल नहीं भरता है, उसका बिल माफ कर दिया जाता है. कॉरपोरेट सेक्टर में घाटा दिखाने वाले को बेल आउट पैकेज मिल जाता है.

काला धन जोड़ने वाले को एमनेस्टी स्कीमों में बचने का मौका दिया जाता है. ऐसे में एक ईमानदार शख्स, जो अतिक्रमण नहीं करता, जो समय पर लोन और बिजली-पानी के बिल भरता है, वो क्या खुद को ठगा हुआ सा महसूस नहीं करेगा? अगर कोई ईमानदार है तो क्या वो बेवकूफ है?

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