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भारतीय रेल: इंफ्रास्ट्रक्चर मजबूत कीजिए, तभी सुधरेंगे हालात

रेलवे का इंफ्रास्ट्रक्चर सही नहीं कर गाड़ियों की संख्या बढ़ाई जा रही है. स्टाफ को मेंटिनेंस का टाइम नहीं मिलता है. साथ ही सभी गाड़ियों को टाइम पर चलाने के लिए बहुत प्रेशर रहता है

Ravishankar Singh Ravishankar Singh Updated On: Sep 07, 2017 06:22 PM IST

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भारतीय रेल: इंफ्रास्ट्रक्चर मजबूत कीजिए, तभी सुधरेंगे हालात

देश में हो रहे लगातार रेल दुर्घटनाओं पर फ़र्स्टपोस्ट हिंदी ने रेलवे बोर्ड के पूर्व चेयरमैन आर एन मल्होत्रा से बात की. आर एन मल्होत्रा साल 2000 से 2002 तक अटल विहारी वाजपेयी सरकार में रेलवे बोर्ड के मेंबर और चेयरमैन रह चुके हैं. आरएन मल्होत्रा ने देश के दो पूर्व रेल मंत्री ममता बनर्जी और नीतीश कुमार के साथ रेलवे में कई नई पहल की शुरुआत की थी.

पेश है फर्स्टपोस्ट हिंदी संवाददाता रविशंकर सिंह के साथ आरएन मल्होत्रा की बातचीत पर आधारित आलेख

पिछले कुछ महीनों से रेल में एक्सीडेंट की घटनाएं बढ़ी हैं. इन दुर्घटनाओं की वजह से पैसेंजर्स की केजुअल्टी भी बढ़े हैं. ज्यादातर दुर्घटनाएं गाड़ियों की डिरेलमेंट की वजह से हुई हैं.

रेल दुर्घटनाएं मुख्य तौर पर तीन कारणों से होती हैं 

पहला, रेलवे में मटेरियल फेल्योर. अगर रेल टूट जाए, पटरी टूट जाए, सिग्नलिंग सिस्टम खराब हो जाए, ट्रैक में कोई खराबी आ जाए या बोगी के कुछ पार्ट्स ब्रैकडाउन हो जाएं. ये सारे कारण मटेरियल फेल्योर के अंतगर्त आते हैं.

दूसरा कारण होता है स्टाफ का फेल्योर होना. जिन स्टाफ रेलवे को चलाने के लिए या रेलवे की सुरक्षा के लिए लगाया है उनका फेल्योर होना. रेलवे का जो रूल स्टाफ के लिए बनाए गए हैं उन रूल्स को रेलवे के स्टाफ फॉलो नहीं करते हैं.

तीसरा कारण वह होता है, जो रेलवे से संबंघित नहीं होता है पर उसकी किए की सजा रेलवे और पैसेंजर्स को भुगतनी पड़ती है. दूसरे की गलतियों की वजहों से ट्रेन एक्सीडेंट होना. जैसे क्रॉसिंग के ऊपर गाड़ियां बिना देखे निकलना, क्रासिंग के ऊपर खड़े हो जाना. कुछ लोग पटरी के साथ-साथ अपनी ट्रैक्टर ट्रॉली चलाते हैं. जिसकी वजह से कभी-कभी वे लोग ट्रेन के चपेट में आ जाते हैं.

इन तीन कारणों को ठीक करने की जरूरत है. इसके लिए जरूरत है कि रेलवे का जो इंफ्रॉस्ट्रक्चर पूराना हो रहा है, जिसकी लाइफ खत्म हो गई है उसको बदला जाए.

अटल बिहारी ने मंजूर किया था 17 हजार करोड़ रुपए का सेफ्टी फंड 

Kanpur-Rail-Accident

साल 2002 में पहली बार रेलवे ने 17 हजार करोड़ रुपए का सेफ्टी फंड अटल जी से मंजूर करवाया था. इस फंड का इस्तेमाल हम लोग रेलवे के पुराने डिब्बों, सिग्नल सिस्टम और रेलवे लाइनों को दुरुस्त करने के लिए शुरू किया था.

यह जो रेलवे की पुरानी चीजें हैं उनको बदलने की प्रक्रिया लगातार जारी रहनी चाहिए. यह प्रक्रिया किसी भी समय में बंद हो जाती है या कम हो जाती है. बंद और कम होने की वजहों से भी रेल की एक्सीडेंट की घटना बढ़ जाती हैं.

साल 2005 से 2010 तक रेलवे की अपनी माली हालत बेहतर हो गई थी, क्योंकि देश में जीडीपी का ग्रोथ इकॉनमी की वजह से अच्छी हो रही थी. भाड़ा भी अच्छा आ रहा था और रेलवे की आय भी ठीक तरीके से बढ़ रही थी. इससे रेलवे का जो पैसा सरप्लस हो रहा था उससे वह रिप्लेसमेंट करते जा रहे थे.

इस साल रेल बजट में एक लाख करोड़ रुपए का सेफ्टी फंड मिला है 

साल 2010 के बाद वर्ल्ड इकॉनोमी में मंदी आने के बाद जीडीपी की ग्रोथ कम हो गई. इसकी वजह से रलवे की माल भाड़ा में भारी कमी आ गई. इससे रेलवे की हालत थोड़ी डाउन हो गई. इस वजह से रेलवे की फंड में कमी आने लगी. जिसकी वजह से पटरियों के बदलने में या सिग्निलिंग सिस्टम के मरम्मती में कमी आ गई.

मैं समझता हूं इस अवधि में जो पटरियों और सिग्नलिंग, डिब्बों, वैगन्स इत्यादि के बदलाव या रखरखाव का काम जो पेंडिंग रह गए, वो सब आगे चल कर इकठ्ठे हो गए.

इस साल रेल बजट में वित्त मंत्री ने रेलवे को एक लाख करोड़ रुपए का सेफ्टी फंड देने का फैसला किया है. वह काम अभी शुरू हुआ है. इस काम का रिजल्ट आने में चार-पांच साल का वक्त लगेगा. मेरे समझ से इस फंड को और बढ़ाया जाएगा तो और बढ़िया रिजल्ट देखने को मिलेगा.

रेलवे का सिस्टम ऐसा है कि तीन फेल्योर के बिना संभव नहीं है एक्सीडेंट 

मैं यह कहना चाहता हूं कि रेलवे का सिस्टम ऐसा है कि जब तक तीन फेल्योर न हों कम से कम रेल एक्सीडेंट नहीं हो पाता. चाहे मटेरियल फेल्योर हों, चाहे जनरल पब्लिक फेल्योर हों या रेलवे के स्टाफ के फेल्योर हों.

मेरे समझ से स्टाफ फेल्योर भी दो तरह के होते हैं. एक तो स्टाफ अपने ड्यूटी का घ्यान नहीं रखते कि उनका रोल क्या है और वह लापरवाही बरतते हैं.

दूसरा यह होता है कि उन लोगों पर वर्क प्रेशर इतना होता है कि नियम के अंदर रह कर काम नहीं कर पाते हैं. वह खुद गलती करते हैं. दाबाव में काम करते हैं. इस वजह से दुर्घटनाएं होती हैं. कभी-कभी उनको काफी सजा भी मिलती है. नौकरी से निकाल दिए जाते हैं.

पिछले 30-40 सालों से ट्रेनों के नंबर लगातार बढ़ते जा रहे है. हर नई सरकार आने पर नया मंत्री और सांसद अपने इलाके में नई गाड़ियां चाहता है. सरकार को मजबूरी में नई गाड़ियां चलानी पड़ती हैं.

इंफ्रास्टक्चर नहीं,  बढ़ाई जाती है केवल गाड़ियों की संख्या 

Muzaffarnagar: Workers repair and restore the railway tracks at the accident site where Utkal Express derailed, at Khatuali near Muzaffarnagar on Tuesday. PTI Photo (PTI8_22_2017_000190B)

एक तरफ इंफ्रास्टक्चर नहीं बढ़ाया जाता और गाड़ियों की संख्या बढ़ाई जाती है. स्टाफ को मेंटिनेंस का टाइम नहीं मिलता है. साथ ही सब गाड़ियों को टाइम पर चलाने के लिए उन पर बहुत प्रेशर रहता है.

अगर वो गाड़ियां देरी से चलाते हैं तो उनको चार्जशीट मिलती है. जिससे स्टाफ के दिमाग पर प्रेशर पड़ता है और गलती करने से दुर्घटना हो जाती है.

कई बार वे लोग शार्ट-कट करते हैं. ज्यादातर शार्ट-कट सफल हो जाते हैं पर कुछ शार्ट-कट में असफल हो जाते हैं. उस समय एक्सीडेंट हो जाते हैं.

दो-तीन सख्त कदम उठाने की है जरूरत 

पहला गाड़ियों को तब तक उस रेलवे लाइन पर नहीं बढ़ाया जाना चाहिए जब तक उस लाइन की कैपेसिटी नहीं बढ़ा दी जाती.

भारतीय रेल के कई सेक्शन ऐसे हैं जहां नियम के तहत 100 गाड़ियां चलनी चाहिए वहां 150 गाड़ियां चलाई जा रही हैं. मंत्री और सांसदों के ऐसे डिमांड पर लगाम लगाया जाना चाहिए.

दूसरा इंफ्रास्ट्रक्चर पर और खर्चा करना चाहिए. कुछ कदम तो सरकार ने सही उठाए हैं. एलआईसी से जो एक लाख करोड़ रुपए का लोन लिया है. उसको डबलिंग के कामों और सिग्नलिंग सिस्टम पर किए जा रहे हैं.

लेकिन, अभी भी रेलवे को ठीक करने के लिए जितने पैसे की जरूरत है, वह अभी भी अपर्याप्त हैं. रेलवे को दुरुस्त करने के लिए और पैसे चाहिए.

तीसरा भारत के लोगों को कायदे और कानून माननी आनी चाहिए. हम आपको बता दें कि शहर की ट्रैफिक से लेकर रेलवे के नियम कायदों को भी लोग नहीं मानते हैं.

ट्रेन के साथ-साथ गाड़ियां चलाना, रेलवे फाटक को पार करना. जब तक इनडिसिप्लिन को ठीक नहीं किए जाएगा, इस तरह की घटनाएं होती रहेंगी. भारत के लोगों को डिसिप्लिन में रहना पड़ेगा.

राजनीतिक नफा नुकसान छोड़, रेलवे के बारे में सोचना होगा 

रेलवे के पुराने पाट-पूर्जों और पटरियों को बदलना होगा. रेलवे को अपने स्टाफ के लिए प्रेशर घटाने की जरूरत है. इन सब चीजों के लिए एडिशनल पैसा चाहिए. अब जब देश में हर साल कहीं न कहीं चुनाव होते हैं. राजनीतिक नफा-नुकसान की वजह से पैसेंजर्स के किराए बढ़ाए नहीं जाते. इसलिए रेलवे अपना सरप्लस पैसा बना नहीं पाता है.

हिंदुस्तान में पैसेंजर्स का जो किराया है वह दुनिया के सारे देशों में से सबसे कम किराएं में से एक है. भारत में पर किलोमीटर पैसेंजर्स का जो किराया है वह दुनिया के 200 देशों में से एक दो देश में ही है. इतने कम किराये होने से रेलवे का कोई लाभ नहीं होता है.

भारत में अब जब पैसेंजर्स किराया नहीं बढ़ाया जाता है तो माल भाड़ा थोड़ा-थोड़ा बढ़ता-बढ़ता इतना बढ़ गया है कि यह दुनिया के सबसे महंगे किरायों में से एक हो गया है. जो कि भारत की अर्थव्यवस्था के लिए गलत निर्णय है.

माल भाड़ा ज्यादा होने से हमारी इकॉनमी पर उल्टा असर पड़ता है. माल भाड़ा इतना ज्यादा होता है कि वस्तुओं के दाम बढ़ाने पड़ते हैं.

भारत में माल भाड़ा को लेकर एक बार जनरल मैनेजर रहते हमने डाटा निकाला था. कच्चा आयरन को ब्राजील से हिंदुस्तान लाने में जितना खर्चा पड़ता है. उससे कहीं ज्यादा खर्चा हमारे हिंदुस्तान में जो आयरन और मांइस के सेंटर हैं वहां से फैक्ट्री तक ले जाने में पड़ता है.

जब तक इस प्रकार के विसंगतियों को सुधारा नहीं जाएगा. रेलवे में किसी भी तरह की आमूलचूल परिवर्तन की बात करना बेईमानी होगी. ये रेलवे की इकॉनमी और देश की इकॉनमी दोनो को खराब कर रही है.

साल 2002 में दस साल के बाद बढ़ा था पैसेंजर किराया 

हम आपको बता दें कि साल 2002 में रेल बजट के दौरान दो ऐसे निर्णय लिए गए थे, जो उससे पहले रेलवे में कभी नहीं लिए गए.

पहला, रेल बजट में लगभग 10 सालों के बाद पैसेंजर्स किराया बढ़ाया गया था. जिन वस्तुओं पर माल भाड़ा बहुत ज्यादा लगा था, जो कि भारत की अर्थव्यवस्था को प्रभावित कर रहे थे. उसका किराया घटाया गया था.

कुछ चीजों के मालभाड़े जो काफी कम थे, उसको बढ़ाया गया था. जैसे, नमक का किराया न के बराबर हुआ करता था. जबकि नमक की एक टन की कीमत बाजार में बेचे जाने वाले एक टन स्टील के बराबर थी.

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