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नरेंद्र मोदी के अंदाज में बातें कर के सफल हो रहे हैं राहुल गांधी!

राहुल के बयानों का जवाब अब आरएसएस और बीजेपी को गंभीरता से देना पड़ रहा है

Updated On: Oct 14, 2017 01:37 PM IST

Sandipan Sharma Sandipan Sharma

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नरेंद्र मोदी के अंदाज में बातें कर के सफल हो रहे हैं राहुल गांधी!

एक वक्त ऐसा था जब इस कांग्रेस नेता का सिर्फ और सिर्फ मजाक उड़ाया जाता था और उनको लेकर चुटकुले बनते थे. अब वह बड़ी भीड़ खींच रहे हैं. लोग उनकी हल्के-फुल्के अंदाज में सरकार की आलोचनाओं पर तालियां बजा रहे हैं और उनकी तारीफ कर रहे हैं.

गुजरात में अपने रोड शो के दौरान कांग्रेस वाइस प्रेसिडेंट राहुल गांधी ने न सिर्फ अपनी इमेज को दोबारा गढ़ा है, बल्कि उन्होंने नरेंद्र मोदी सरकार पर ऐसे सटीक हमले भी किए हैं जो कि ऑस्कर वाइल्ड के शब्दों में ‘विद्वानों से निचले स्तर’ के हैं.

बीजेपी चीफ अमित शाह के बेटे की कारोबारी डील्स पर पैदा हुए विवाद पर बोलते हुए राहुल गांधी ने कहा, ‘बेटी बचाओ अब बेटा बचाओ बन गया है.’ इसके बाद उन्होंने बीजेपी के 2014 में उन पर लगाए गए आरोपों का उसी तर्ज पर जवाब दिया. उन्होंने बीजेपी चीफ के पुत्र को शाह-जादा कहकर पुकारा. 2014 के चुनावों में बीजेपी ने राहुल पर शहजादा कहकर हमला किया था. प्रधानमंत्री के जय शाह विवाद पर चुप्पी साधे रहने पर उन्होंने कहा कि चौकीदार अब भागीदार बन गया है. इसके बाद उन्होंने जय शाह को स्टार्ट अप इंडिया के आइकॉन के तौर पर बताया, अब यह जोक सोशल मीडिया पर खूब मशहूर हो रहा है.

अच्छे सिनेमा या थिएटर की तरह से ही एक राजनेता तभी हिट माना जा सकता है जबकि उसके श्रोताओं को मजा आए. गांधी के मामले में भीड़ को उनके वन-लाइनर्स, जोक्स और तंज पसंद आ रहे हैं.

Rahul Gandhi in Dwarka

कई जगहों पर लोगों ने जोश-खरोश के साथ उनके सवाल-जवाब सत्र में भाग लिया. उनकी यह तरकीब मोदी के ही अंदाज से ही चुराई गई लगती है.

किसी राजनेता की सफलता या नाकामी का एक और मानक विरोधियों की ओर से आने वाली प्रतिक्रिया होती है. 2014 के कैंपेन में मोदी ने गांधी के मौखिक हमलों और राजनीति को कोई तवज्जो नहीं दी. उन्होंने इसे आसपास उठने वाली आवाजों की तरह से नजरअंदाज कर दिया या इसे जोक के तौर पर खारिज कर दिया. गांधी उस वक्त ऐसे लाचार के तौर पर करार दिए गए जो कि साउंड-प्रूफ चैंबर में चिल्ला रहा हो.

बदल रहा है संघ और बीजेपी का रवैया

लेकिन, अब इसमें बदलाव दिखाई दे रहा है. बीजेपी और आरएसएस दोनों ही राहुल गांधी को मौखिक रूप से जवाब दे रहे हैं, या फिर उनके गढ़ अमेठी में उन पर हमला कर रहे हैं. निश्चित तौर पर बीजेपी और आरएसएस दोनों ही इस वक्त राहुल गांधी मजाकिया लिहाज में किए जा रहे तीखे हमलों की उपेक्षा करने का जोखिम लेने के लिए तैयार नहीं हैं.

चुटकुलों का केंद्र बन चुके और बिना एक मजबूत श्रोतावर्ग वाले नेता से राहुल गांधी का एकबार फिर से आम लोगों के साथ कनेक्ट होना और इससे भी ज्यादा अहम यह सब हल्के-फुल्के तरीके से करना एक बड़ा बदलाव है.

लेकिन, वह गुजरे कुछ वक्त से इसमें लगे हुए थे. कुछ महीने पहले जब उन्होंने राजस्थान के बारन में किसानों की एक रैली को संबोधित किया तो श्रोताओं को उनका लहजा काफी पसंद आया. श्रोताओं का फैसला टीवी चैनलों पर भी दिखाई दिया जो कि एकमत से यह दिखा रहे थे कि अब आप उन्हें पप्पू नहीं कह सकते. अब वह मैच्योर हो चुके हैं. उसके बाद से अब तक उन्होंने एक वक्ता के तौर पर लगातार सुधार दिखाया है.

बदला है बात करने का तरीका

इस बदलाव का काफी हद तक श्रेय उनके स्पीचराइटर्स को दिया जा सकता है जो कि लंबे-चौड़े भाषणों और ऐस्केप वैलोसिटी जैसे आम लोगों के समझ न आने वाले विचार देने की बजाय अब ऐसी पंचलाइन्स दे रहे हैं जिनका गहरा असर है.

भारत कुल मिलाकर एक ऐसा देश है जहां पीढ़ियां तगड़े डायलॉग और जबरदस्त सीन्स वाली फिल्मों को देखकर तैयार हुई हैं और उन्हें पसंद करती हैं. गांधी के स्पीचराइटर्स ने शायद अब यह समझ लिया है कि भारत में चुनाव लड़ना एक गंभीर काम कम बल्कि तमाशा ज्यादा है. वे जान गए हैं कि तौर-तरीके और डिलीवरी कंटेंट और मकसद से ज्यादा अहमियत रखते हैं.

चतुराई भरे ढंग से अपने संदेश लोगों तक पहुंचाने के लिए उन्होंने इसमें एक और चीज जोड़ी है. वह है अपनी विनम्रता को शामिल करना। खुद को गंभीरता से लेने की बजाय उन्होंने अपनी आलोचना वाली चीजों को मजाक के तौर पर बताने, सीधे-सपाट तरीके से बात कहने को तरजीह दी है.

अब वह इस बात पर लज्जित नहीं होते कि किस तरह से बीजेपी की ट्रोल सेना उन्हें पप्पू कहकर जोक बनाती है. किस तरह से उनके विरोधियों ने उनकी मदद की है. उन्होंने गुजरात में कहा, ‘मेरी पिटाई कर-कर के उन्होंने मेरी आंखें खोल दीं.’ वह इस बात को स्वीकार करने से पीछे नहीं हट रहे कि यूपीए को वोटरों ने इसकी गलतियों और गड़बड़ नीतियों के चलते बाहर का रास्ता दिखाकर सही काम किया.

यह निश्चित तौर पर एक सधी हुई और सतर्कता से तैयार की गई रणनीति का हिस्सा है जिसमें वह नैतिक रूप से दूसरों से ऊपर दिखाई दे रहे हैं. वह खुदको उदार और विनम्र नेता के तौर पर स्थापित कर रहे हैं. उनकी यह इमेज बीजेपी से एकदम उलट है जिसके नेता आक्रामक, कुटिल दिखाई देते हैं, जो पीछे नहीं हटते, अपनी गलतियां स्वीकारते और सत्ता में बने रहने के लिए किसी भी हद तक जाने के लिए तैयार रहते हैं. साफतौर पर गांधी खुद को प्रधानमंत्री के विपरीत विचारधारा के और कद्दावर प्रतिस्पर्धी के तौर पर प्रोजेक्ट कर रहे हैं और वह प्रधानमंत्री के तर्कों के उलट बहस को खड़ा कर रहे हैं.

वह धीरे-धीरे फैसले ले रहे हैं और खुद से पैदा की गई आलोचनाओं और मजाक का टारगेट बनने की गलतियों से बच रहे हैं.

EDS PLS TAKE NOTE OF THIS PTI PICK OF THE DAY:::::::::: Dwarka: Congress vice-president Rahul Gandhi offers prayers at Dwarkadhish Temple, Dwarka in Gujarat on Monday. PTI Photo   (PTI9_25_2017_000070A)(PTI9_25_2017_000213B)

क्या गांधी सफल होंगे?

राजनीति की एक सच्चाई यह है कि यहां नेता अपने करिश्माई व्यक्तित्व और मेहनत के बूते ही सफल होते हैं. हर सफल राजनेता अपने वोटरों के मूड, सामूहिक डर, महत्वाकांक्षाओं और गुस्से के लोकतांत्रिक उद्देश्यों को परिलक्षित करता है. हर जीतने वाला नेता मूलरूप में उस विचार का प्रतिनिधित्व करता है जिसका दौर आ चुका होता है.

गांधी केवल तभी सफल होंगे जबकि इंडिया एक उदार, विनम्र शख्स को स्वीकारने के लिए तैयार हो जाएगा जो कि मौजूदा राजनीतिक दौर की बहस के उलट बिंदु के साथ खुद को प्रोजेक्ट कर रहा है. उनका वक्त तब आगा जबकि लोग मोदी सरकार का आकलन करेंगे और देखेंगे कि जो वादे किए गए थे वे पूरे हुए हैं या नहीं.

गुजरात में अपनी यात्रा के आखिरी दिन गांधी ने जोक किया कि अगला वादा चांद का होगा. उनका वक्त तब आएगा जबकि वोटर्स मोदी को हिंदू हृदय सम्राट की बजाय प्रधान सेवक के तौर पर देखने लगेंगे जो कि लोगों की तकलीफों को दूर कर रहा है.

गांधी के पक्ष में यह बात जाती है कि वह खुद को एक दिग्गज के लड़ाई के खिलाफ खड़ा कर रहे हैं, और उनके पास वक्त भी है. कांग्रेस के लिए अच्छी खबर यह है कि गांधी ने आखिरकार इस यात्रा का आनंद उठाना शुरू कर दिया है.

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