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राफेल डील: नरेंद्र मोदी को निशाना बनाने के अभियान में सेना की प्रतिष्ठा को नुकसान

ये दिल दुखाने वाली बात है और ये देखना निराशाजनक है कि सेना के जवानों को अपनी बात कहने के लिए सामने आना पड़ रहा है

Updated On: Sep 14, 2018 08:31 AM IST

Sreemoy Talukdar

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राफेल डील: नरेंद्र मोदी को निशाना बनाने के अभियान में सेना की प्रतिष्ठा को नुकसान

ये दिल दुखाने वाली बात है और ये देखना निराशाजनक है कि सेना के जवानों को अपनी बात कहने के लिए सामने आना पड़ रहा है. वर्दी में जवानों का अपनी मांगों के लिए सामने आना इसलिए परेशानी की बात है क्योंकि आम तौर पर नीतिगत फैसलों पर बोलने से सेना के अधिकारी बचते रहे हैं. यहां बात हो रही भारत और फ्रांस के बीच हुए राफेल डील की.

राफेल डील के बचाव में वायुसेना के कई वर्तमान और पूर्व बड़े अधिकारियों ने अनुरोध किया है कि इस कांट्रेक्ट को किसी भी हालत रद्द नहीं किया जाना चाहिए. ये महत्वपूर्ण घटनाक्रम है क्योंकि पूर्व और कार्यरत वायुसेना प्रमुखों समेत कई बड़े वायुसेना अधिकारी राफेल डील के पक्ष में खुलकर सामने आ गए है. ये इन अनुशासित और निपुण अधिकारियों के लिए आसान नहीं है क्योंकि ये जानते हैं कि इस मुद्दे पर जिस तरह से देश में राजनीतिक लड़ाई चल रहे ही ऐसे में उनपर भी इसको लेकर निशाना साधा जा सकता है.

भारतीय वायुसेना के वाइस चीफ एयर मार्शल एस बी देव ने कुछ ही दिनों पहले ट्वीट करके कहा, 'मुझे इसपर टिप्पणी नहीं करनी चाहिए,लेकिन मैं आप लोगों को ये बताना चाहता हूं कि जिस तरह से राफेल को लेकर चर्चा चल रही है उससे लग रहा है कि लोगों को इसके बारे में जानकारी नहीं है. मैं ऐसा इसलिए कह रहा हूं कि हमलोगों को अच्छी तरह से मालूम है कि इस मसले पर क्या क्या हुआ है. हमलोग एयरक्राफ्ट का इंतजार कर रहे हैं. राफेल बहुत खूबसूरत और उपयुक्त एयरक्राफ्ट है.'

भारतीय राजनीति की दुर्दशा से आहत हो आगे आ रहे हैं सेना के अधिकारी

वायुसेना के इस बड़े अधिकारी समेत अन्य बड़े अधिकारियों का इस मामले पर खुलकर सामने आना ये बताता है कि वो इस मामले में हो रहे विवाद से कितने आहत हैं. उन्हें ऐसा करने के लिए इसलिए मजबूर होना पड़ा क्योंकि हमारी भारतीय राजनीति की ऐसी दुर्दशा और ऐसा निराशाजनक माहौल है कि जिसमें दो सरकारों के बीच हुए डील पर भी केवल राजनीतिक अवसरवादिता की वजह से सवाल उठाए जा रहे हैं.

इस डील में भारतीय वायुसेना की अहम भूमिका रही है और इस डील के लिए वायुसेना के बड़े अधिकारियों ने कड़ी सौदेबाजी की है. और चूंकि इस डील की पूरी प्रक्रिया में इंडियन एयरफोर्स शामिल रहा है और पूरे डील का नेतृत्व उन्होंने ही किया है ऐसे में इस समझौते के खिलाफ किसी भी तरह का नकारात्मक और बदनाम करने वाला अभियान चलाना उनकी ईमानदारी और प्रतिष्ठा पर भी सवाल उठाने जैसा ही है. ये उनके देश के प्रति समर्पण पर भी सवाल खडा करना है.

इस डील को लेकर देश में चल रहे राजनीतिक विवाद का एक और चिंताजनक पहलू ये है कि जिस तरह से इस समझौते को लेकर देशभर में झूठी सूचनाओं के आधार पर अभियान चलाया जा रहा है उससे विमानों को मिलने में देरी और समझौते की प्रक्रियाओं में उलझनों के बढ़ने की भी संभावना बनने लगी है.

इस विवाद से न केवल हमारे सशस्त्र सेनाओं के मनोबल पर नकारात्मक असर पड़ेगा बल्कि हमारे पड़ोसियों की कारगुजारियों को देखते हुए हमारी सैन्य तैयारियों को भी बड़ा झटका लगेगा.

एक अधिकारी के बाद दूसरे, तीसरे और कई अन्य अधिकारियों ने इस विवाद पर नाराजगी जाहिर की है और डील के प्रति अपना विश्वास जताया है. इनमें से कुछ अधिकारी तो महीनों तक चले इस समझौते की पूरी प्रक्रिया में शामिल भी रहे हैं. राफेल पर जिस तरह का माहौल लोगों के बीच बनाया जा रहा है उससे उन पर भी निशाना साधकर उनकी प्रतिष्ठा पर भी चोट पहुंचाने का प्रयास किया जा रहा है. लोगों को ये समझाने की कोशिश की जा रही है कि भारतीय वायुसेना का शीर्ष नेतृत्व किसी दबाव की वजह से झूठ बोल रहा है. ये निराशाजनक है और अस्वीकार्य भी.

राहुल के आरोपों को नकारा जा चुका है

पिछले गुरुवार को डिप्टी चीफ ऑफ एयर स्टाफ, एयर मार्शल रघुनाथ नांबियार ने इन आरोपों को नकार दिया कि एनडीए सरकार के समय फाइनल हुई राफेल डील में किसी भी तरह के मूल्य में बढ़ोत्तरी हुई है. यही मुख्य आरोप है जो कि मुख्य विपक्षी दल कांग्रेस समेत अन्य विपक्षी पार्टियां नरेंद्र मोदी के नेतृत्व वाली एनडीए सरकार पर लगा रही है. कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी ने आरोप लगाया है कि राफेल फाइटर एयरक्राफ्ट का मूल्य एनडीए शासनकाल में जादुई तरीके से बढ़ गया है. जिस एयरक्राफ्ट की कीमत उनकी यूपीए सरकार में 540 करोड़ रुपए प्रति एयरक्राफ्ट तय हुई थी वही जहाज एनडीए सरकार 1600 करोड़ रुपए प्रति जहाज खरीद रही है.

rahul gandhi

गांधी खानदान के वारिस राहुल गांधी ने अपने आरोप के समर्थन में राफेल की पांच महीनों में चार अलग अलग कीमतों के बारे में जानकारी दी है. 29 अप्रैल को नई दिल्ली के जनआक्रोश रैली में राहुल गांधी ने कहा कि मनमोहन सरकार के समय राफेल की कीमत 700 करोड़ रुपए तय की गयी थी. 20 जुलाई को संसद में सरकार के खिलाफ विश्वासमत प्रस्ताव पर बोलते हुए राहुल ने राफेल की कीमत अपने यूपीए सरकार के समय और घटा दी और नए आंकड़े देते हुए प्रति एयरक्राफ्ट की कीमत 520 करोड़ रुपए बताया.

कुछ ही दिनों के बाद रायपुर में अपने पार्टी के प्रचार के लिए गए राहुल ने फिर से यूपीए के शासनकाल में राफेल की कीमत का आंकड़ा बदल दिया. इस बार उन्होंने इसकी कीमत बताई 540 करोड़ रुपए प्रति एयरक्राफ्ट.

11 अगस्त को तो उन्होंने कमाल ही कर दिया. दो मिनट में ही उन्होंने दो अलग अलग कीमतें, 520 करोड़ और 540 करोड़ रुपए बता दीं. दो दिन बाद ही हैदराबाद में राहुल ने फिर से राफेल की कीमतों को लेकर एक नया बयान दिया जिसमें उन्होंने प्रति एयरक्राफ्ट की कीमत 526 करोड़ रुपए बताई. इंडिया टुडे ने अपनी फैक्ट चेकिंग रिपोर्ट में इसे प्रकाशित भी किया है.

एयर मार्शल ने दी है ये जानकारी

नई दिल्ली में एक सेमिनार में शामिल होने आए एयर मार्शल नांबियार ने कार्यक्रम के बाद संवाददाताओं से बातचीत करने के दौरान कहा, 'जो इस तरह के आंकड़े पेश कर रहे हैं, मुझे लगता है कि उन्हें गलत जानकारी दी गयी है या वो उन तथ्यों से अवगत नहीं है जैसा कि एयरफोर्स में हम जानते हैं. हम लोग फ्रांस सरकार के साथ की जा रही इस डील की प्रकिया में पूरी तरह से शामिल थे और हमें अच्छी तरह से मालूम है कि इस सौदे में क्या-क्या हुआ है.'

उन्होंने इस बात की भी जानकारी दी, 'जिस राफेल की कीमत 2008 में हमारे सामने रखी गयी थी उससे कहीं कम कीमत में हमें अभी ये एयरक्राफ्ट मिल रहा है.' उन्होंने इन आरोपों से भी इंकार किया कि कॉन्ट्रैक्ट की प्रक्रिया में किसी भी तरह की कोई अनियमितता बरती गयी है. उनका कहना था, 'इन आरोपों में कोई सच्चाई नहीं है.'

बुधवार को एयर चीफ मार्शल एसबीपी सिन्हा ने, जो आईएएफ के सेंट्रल कमांड के चीफ भी हैं, ने भी दोहराया कि भारत को अत्याधुनिक और जबरदस्त मारक क्षमता से सुसज्जित जहाज बेहतरीन कीमतों में मिल रहा है. सिन्हा डिप्टी चीफ ऑफ एयर स्टाफ की हैसियत से इस डील को पक्का करने वाली टीम में शामिल थे. उन्होंने ये भी कहा कि डील की शर्तों में हमें डसॉल्ट से नवीनतम और अत्याधुनिक हथियार,सेंसर्स, और समय पर विमानों की डिलेवरी का वादा मिला है. सिन्हा ने कहा कि ये विमान हमारी सुरक्षा जरुरतों को पूरा करने में सक्षम है और इस एयरक्राफ्ट में हमारे शत्रुओं को पराजित करने की पूरी क्षमता है.

शिव अरूर ने लाइवफिस्ट में लिखा है कि एयर मार्शल सिन्हा ने बुधवार को अपने औपचारिक प्रेजेंटेशन में दस कारण गिनाए कि क्यों ये डील पिछली डील से ज्यादा साफ सुथरी, बेहतर और कम कीमत वाली है. रिपोर्ट में ये भी बताया गया कि संयोगवश एयर मार्शल सिन्हा टूट गई पिछली डील के समय भी एयरफोर्स हेडक्वार्टर की तरफ से सौदे में शामिल थे.

भारत सरकार पर वायुसेना को मजबूत करने का दावा

बुधवार को भारतीय वायुसेना के प्रमुख वीएस धनोवा ने भी याद दिलाया कि भारत को अपने दुश्मनों की तरफ से गंभीर खतरे की चुनौती मिल रही है. धनोवा ने भारत सरकार के द्वारा इस संबंध में किए जा रहे प्रयासों का समर्थन किया. भारतीय वायुसेना के एक सेमिनार में शामिल होने के लिए पहुंचे धनोवा ने संवाददाताओं से बातचीत में कहा, 'भारतीय वायुसेना को राफेल और एस-400 (जमीन से हवा में मार करने वाले रशियन डिफेंस सिस्टम) सौंपने का फैसला करके भारत सरकार भारतीय वायुसेना को मजबूत करने की कोशिश कर रही है. इससे आइएएफ को अपनी कमियों को दूर करने और घटती संख्या को सुधारने में मदद मिलेगी.'

एयर चीफ मार्शल धनोवा ने विपक्ष के इन आरोपों से भी इंकार किया कि सरकार ने सशस्त्र सेनाओं को गलत जानकारी देकर पहले की योजना के अनुसार 126 एयरक्राफ्ट्स (यूपीए सरकार के डील के मुताबिक जो कि अटकी पड़ी है) की जगह पर केवल 36 एयरक्राफ्ट्स को देने का फैसला किया है. धनोवा ने इस बात की जानकारी देते हुए बताया, 'जब भी दो देशों के बीच समझौता (इंटर गवर्नमेंट एग्रीमेंट) होता है तो हमेशा दो स्वाक्ड्रन खरीदे जाते हैं.' उन्होंने बताया कि इमरजेंसी के समय एयरक्राफ्ट को खरीदने के लिए इंटर गवर्नमेंट एग्रीमेंट का सहारा लेकर संकट को कम करने का प्रयास किया जाता है.

उन्होंने कहा कि जनवरी 1983 में पाकिस्तान ने अमेरिका से एफ-16 विमान खरीदे थे वहीं हमने रुस से मिग-21 के दो स्वाक्ड्रन खरीदे थे. फ्रांस से भी हमने मिराज 2000 के दो स्वाड्रन खरीदे हैं.

वर्तमान में कार्यरत एयरफोर्स के वरिष्ठ अधिकारियों के अलावा रिटायर्ड वायुसेना प्रमुखों ने इस मुद्दे पर अपने विचार रखे हैं. उन्होंने इस मसले पर हो रही राजनीति पर चिंता जताते हुए कहा कि भारत में केवल राजनीतिक लाभ लेने के लिए देश की रक्षा की जरूरतों के लिए की जा रही खरीददारी को निशाना नहीं बनाया जा सकता. ये देश की सुरक्षा को नुकसान पहुंचा सकता है

हाल ही में इंडियन एक्सप्रेस अखबार में ‘डोंट ग्राउंड दी रफाल’ शीर्षक से लिखे एक लेख ने पूर्व चीफ ऑफ एयर स्टाफ एस कृष्णमूर्ति ने लिखा है, 'विपक्ष सरकार को इस बात के लिए बाध्य कर रहा है कि वो इस मसले पर पब्लिक स्टेटमेंट दे, जबकि उसे अच्छी तरह से मालूम है कि इंटर गवर्नमेंट एग्रीमेंट्स में सीक्रेसी क्लॉज होता है जो कि जनता में इस तरफ के खुलासे की अनुमति नहीं देता है. सरकार इस तरह का कोई भी खुलासा जनता में करके विवाद उत्पन्न नहीं कर सकती जिस सूचना को उसने गोपनीय रखने का वादा किया है.'

rafale

प्रतीकात्मक तस्वीर

कृष्णमूर्ति सलाह देते हुए कहते हैं कि विपक्षी दलों के द्वारा इस सौदे की कीमतों की जानकारी देने की मांग की जा रही है ऐसे में उनकी मांगों को पूरा करने के लिए सरकार चाहे तो लोकसभा का गोपनीय सत्र बुला सकती है. लोकसभा के गोपनीय सत्र के बारे में कार्यवाही के नियमों के मुताबिक क्लास 245-252 में इसका वर्णन किया गया है. इससे सरकार की शर्त भी नहीं टूटेगी और जनता को इसकी जानकारी भी नहीं मिलेगी.

पूर्व वायुसेना प्रमुख इस बात को भी स्पष्ट करते हैं, 'यूपीए सरकार ने डील पर हस्ताक्षर नहीं किए थे. डसॉल्ट एविएशन ने एचएएल के साथ काम की साझेदारी लेने की जिम्मेदारी से इंकार कर दिया था. इस वजह से डील में विलंब हुआ और वायुसेना को इसका खामियाजा भुगतना पड़ा. इससे वायुसेना की ऑपरेशन क्षमता को नुकसान पहुंचा.'

कांग्रेस-बीजेपी के असंतुष्ट नेता राष्ट्रीय सुरक्षा को ताक पर रख रहे हैं

रिटायर्ड एयरचीफ कृष्णमूर्ति स्पष्ट करते हुए कहते हैं कि इन परिस्थितियों की वजह से भारतीय वायुसेना ने सरकार के सामने तत्काल दो स्वाक्ड्रन अत्याधुनिक फाइटर एयरक्राफ्ट्स खरीदने की मांग रखी. सरकार ने उनकी मांगों को देखते हुए ही जितनी जल्दी संभव हो सका उन्होंने कार्रवाई की.

पूर्व एयर चीफ इस चेतावनी के साथ अपनी बात समाप्त करते हैं, 'बिना तथ्यों के आधार पर बहस करने से हमारी विश्वसनीयता पर प्रतिकूल असर पड़ता है. लेकिन कांग्रेस, बीजेपी के ही कुछ असंतुष्ट, पुराने हो चुके नेताओं और जिनका इसमें निजी स्वार्थ जुड़ा हुआ है, उनके लिए राष्ट्रीय सुरक्षा और देश की विश्वसनीयता का मामला मोलभाव करने वाला है वो भी इसलिए जिससे कि पीएम मोदी को निशाना बनाया जा सके.

इतना ही नहीं इस मामले में दूसरे देश के सर्वोच्च नेता को भी नहीं बख्शा गया. फ्रांस के राष्ट्रपति इमेनुएल मैक्रों का नाम भी इस विवाद में घसीटा गया जबकि फ्रांस सरकार ने आधिकारिक रूप से ये बयान जारी किया था कि राफेल डील के सीक्रेसी क्लास के नहीं जुड़े होने की बात गलत है.

कांग्रेस की बैचेनी समझी जा सकती है. लगातार कोशिश के बाद भी मोदी के खिलाफ भ्रष्टाचार का कोई भी आरोप साबित नहीं कर पाने से कांग्रेस के खेमे में निराशा थी. कांग्रेस के लाख प्रयासों के बावजूद देश के सामने उनकी छवि भ्रष्ट नेता की नहीं बन सकी है, हां मोदी ने इस संबंध में कुछ कड़े कदम उठा कर उल्टा ये संदेश दे दिया है कि वो भ्रष्टाचार किसी भी कीमत पर बर्दाश्त नहीं कर सकते हैं. हो सकता है कि मोदी की लोकप्रियता पहले से कम हुई हो लेकिन आज भी वो अपने प्रतिद्वंदियों से लोकप्रियता के मामले में कहीं आगे हैं.

ये कांग्रेस के लिए असुविधाजनक है क्योंकि यूपीए सरकार के आखिरी कुछ सालों में केवल भ्रष्टाचार को लेकर चर्चा होती थी. भ्रष्टाचार के अनगिनत मामलों ने ही पार्टी की नैया चुनावों में डुबोयी और उसकी बुरी तरह से हार हुई. पार्टी अभी भी उन घोटालों की याद से पीड़ित है और ये संभव है कि उन घोटालों की वजह से वो भविष्य में कभी भी भ्रष्टाचार के मुद्दे पर तो कम से कम नैतिकता की दुहाई तो नहीं दे सकती.

इस वजह से कांग्रेस को लगता है कि मोदी सरकार पर भ्रष्टाचार का आरोप लगाकर वो एक तरह से अपने जैसी भ्रष्ट सरकार से इसकी तुलना कर सकेंगे. इसी कारण से कांग्रेस किसी भी तरह से भ्रष्टाचार के मामले मोदी को घसीटकर उनकी सरकार पर धब्बा लगाने का प्रयास कर रही है.

राफेल एयरक्राफ्ट डील को ‘राफेल घोटाला’ कहना इसी मंशा का परिणाम है. लेकिन समस्या ये कि कांग्रेस के आरोपों में दम नहीं है और इसमें विश्वसनीयता की कमी की वजह से इसे पर्याप्त जनसमर्थन नहीं मिल रहा. यहां तक कि खुद उसके सहयोगी दल भी इस कथित घोटाले को लेकर राजनीतिक रूप से ज्यादा उत्साहित नहीं हैं.

हाल ही मे केंद्रीय वित्त मंत्री अरुण जेटली ने समाचार एजेंसी एएनआई को दिए एक इंटरव्यू में कहा, 'जहां तक किसी तरह के भ्रष्टाचार और गलत कार्यों की बात है वहां उनके पास इससे संबंधित किसी भी तरह का एक भी आरोप नहीं है जिसका उनके पास सुबूत और तथ्य का एक मामूली टुकड़ा तक मौजूद हो. ऐसे में वो लोग भ्रष्टाचार की झूठी कहानी गढ़ रहे हैं. अगर आपके पास किसी तरह का कोई तथ्य न हो तो आप उस झूठ को दोहराते रहिए.

बहरहाल राफेल डील के इस राजनीतिक खेल से अगर किसी की प्रतिष्ठा को सबसे ज्यादा आघात लगा है तो वो है सशस्त्र सेनाएं.

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