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राफेल डील: जॉइंट वेंचर में ऑफसेट का सिर्फ 10% हिस्सा अनिल अंबानी के रिलायंस ग्रुप के पास- दसॉ सीईओ

दसॉ एविएशन के सीईओ एरिक ट्रेपियर ने कहा है कि हम करीब 100 भारतीय कंपनियों के साथ बातचीत कर रहे हैं जिनमें करीब 30 ऐसी हैं जिनके साथ हमने पहले ही साझेदारी की पुष्टि कर दी है

Updated On: Oct 25, 2018 04:19 PM IST

FP Staff

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राफेल डील: जॉइंट वेंचर में ऑफसेट का सिर्फ 10% हिस्सा अनिल अंबानी के रिलायंस ग्रुप के पास- दसॉ सीईओ

भारत में राफेल सौदे को लेकर राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप का दौर जारी है. इसी बीच दसॉ कंपनी के सीईओ एरिक ट्रेपियर ने एक इंटरव्यू में कहा है कि रिलायंस के साथ दसॉ एविएशन का जॉइंट वेंचर राफेल लड़ाकू विमान करार के तहत करीब 10 फीसदी ऑफसेट निवेश का ही प्रतिनिधित्व करता है. ट्रेपियर ने यह भी कहा, हम करीब 100 भारतीय कंपनियों के साथ बातचीत कर रहे हैं जिनमें करीब 30 ऐसी हैं, जिनके साथ हमने पहले ही साझेदारी की पुष्टि कर दी है.

जब ऑफसेट के बारे में पूछा गया तो ट्रेपियर ने कहा कि भारतीय कानून (रक्षा खरीद प्रक्रिया) के अनुसार ऑफसेट कॉन्ट्रैक्ट करना अनिवार्य है. उन्होंने कहा कि भारतीय रेगुलेशन के अनुसार ऑफसेट का चुनाव करना हमारा काम है.

जब ट्रेपियर से यह पूछा गया कि आपने ऑफसेट पार्टनर के लिए हिंदुस्तान एयरोनॉटिक्स लिमिटेड (एचएएल) की बजाय अनिल अंबानी के रिलायंस ग्रुप को क्यों चुना? इस पर उन्होंने कहा कि दसॉ एविएशन, डीआरएएल के माध्यम से भारत में लंबे समय के लिए रहने का फैसला किया. यह एक ऐसा जॉइंट वेंचर है, जिसमें प्रशासनिक कार्य के लिए एक भारतीय और एक फ्रांसिसी चीफ ऑपरेटिंग ऑफिसर मौजूद रहेंगे.

देश में इस मुद्दे पर हो रही भारी राजनीतिक के बीच रक्षा मंत्री फ्रांस के दौरे पर हैं. गुरुवार को पेरिस में निर्मला सीतारमण ने मोदी सरकार के इस दावे को दोहराया कि उसे कोई भनक नहीं थी कि दसॉ एविएशन अनिल अंबानी की अगुवाई वाले रिलायंस ग्रुप के साथ गठजोड़ करेगा.

मीडिया में आई कई खबरों में कहा गया है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने दसॉ को मजबूर किया था कि वह रिलायंस को अपने साझेदार के तौर पर चुने जबकि रिलायंस के पास उड्डयन क्षेत्र में कोई अनुभव नहीं था.

सौदे के लिए ऑफसेट दायित्व अनिवार्य, कंपनियों के नाम नहीं

बुधवार को फ्रांस की मीडियापार्ट ने खबर दी थी कि राफेल विनिर्माता दसॉ एविएशन को यह सौदा करने के लिए भारत में अपने ऑफसेट साझेदार के तौर पर अंबानी की कंपनी रिलायंस डिफेंस को चुनना पड़ा. जब इन आरोपों के बारे में पूछा गया तो सीतारमण ने कहा कि सौदे के लिए ऑफसेट दायित्व अनिवार्य था, न कि कंपनियों के नाम.

मीडियापार्ट का यह खुलासा ऐसे समय में आया है जब उससे पहले पूर्व फ्रांसीसी राष्ट्रपति फ्रांस्वा ओलांद ने पिछले महीने कहा था कि फ्रांस को दसॉ के लिए भारतीय साझेदार के चयन के लिए कोई विकल्प नहीं दिया गया था और भारत सरकार ने इसी भारतीय कंपनी का नाम प्रस्तावित किया था. ओलांद जब फ्रांस के राष्ट्रपति थे तभी यह सौदा हुआ था.

कांग्रेस इस सौदे में में भारी अनियमितताओं का आरोप लगा रही है और कह रही है कि सरकार 1670 करोड़ रुपए प्रति विमान की दर से राफेल खरीद रही है जबकि यूपीए सरकार के समय इस सौदे पर बातचीत के दौरान इस विमान की कीमत 526 करोड़ रुपए प्रति राफेल तय हुई थी. कांग्रेस दसॉ के ऑफसेट पार्टनर के तौर पर रिलायंस डिफेंस के चयन को लेकर भी सरकार को निशाना बना रही है.

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