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CBI डायरेक्टर की तलाश: किसको मिलेगी अहमियत, अनुभव की चलेगी या फिर पसंद-नापसंद के बीच मामला फंस जाएगा?

देश की सबसे बड़ी जांच एजेंसी सेंट्रल ब्यूरो ऑफ इन्वेस्टीगेशन (सीबीआई) में नए निदेशक की खोज शुरू हो गई है

Updated On: Jan 15, 2019 08:10 AM IST

Ravishankar Singh Ravishankar Singh

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CBI डायरेक्टर की तलाश: किसको मिलेगी अहमियत, अनुभव की चलेगी या फिर पसंद-नापसंद के बीच मामला फंस जाएगा?

देश की सबसे बड़ी जांच एजेंसी सेंट्रल ब्यूरो ऑफ इन्वेस्टीगेशन (सीबीआई) में नए निदेशक की खोज शुरू हो गई है. केंद्रीय गृह मंत्रालय ने पिछले सप्ताह ही लगभग 20 आईपीएस अधिकारियों की एक सूची कार्मिक एवं प्रशिक्षण विभाग (डीओपीटी) भेजी थी. भेजे गए सभी अधिकारी भ्रष्टाचार से निपटने के लिए ईमानदारी, वरिष्ठता और अनुभव के आधार पर काफी मंझे हैं.

कार्मिक विभाग (डीओपीटी) बहुत जल्द ही डीजी रैंक के इन 20 अधिकारियों में से 2-3 नामों को फाइनल कर सेलेक्ट कमेटी के पास भेजने वाली है. सेलेक्ट कमेटी में अगर इन दो-तीन नामों पर सहमति बन जाती है या फिर किसी एक नाम पर 2-1 से फैसला आता आ जाता है तो वही अधिकारी देश का अगला सीबीआई निदेशक होगा.

सीबीआई डायरेक्टर के लिए जिन नामों को प्रमुखता से लिया जा रहा है उनमें एनआईए के डीजी और असम-मेघालय कैडर के 1984 बैच के आईपीएस अधिकारी वाईसी मोदी, 1984 बैच के यूपी कैडर के आईपीएस अधिकारी और बीएसएफ के डीजी रजनीकांत मिश्रा, गुजरात के डीजीपी और 1983 बैच के आईपीएस अधिकारी शिवानंद झा और 1984 बैच के आईपीएस अधिकारी और सीआईएसएफ के डीजी राजेश रंजन के साथ 1983 बैच की आईपीएस अधिकारी और वर्तमान में गृह मंत्रालय में विशेष सचिव (आंतरिक सुरक्षा) रीना मित्रा, केंद्रीय रिजर्व पुलिस बल के महानिदेशक राजीव राय भटनागर और रॉ के विशेष सचिव विवेक जौहरी का नाम भी प्रमुखता से लिया जा रहा है.

मुंबई पुलिस कमिश्नर और 1985 बैच के आईपीएस अधिकारी सुबोध जायसवाल भी संभावित दावेदारों के रूप में चर्चा में हैं, लेकिन यूपी के डीजीपी ओपी सिंह और जायसवाल ने पहले कभी भी सीबीआई में काम नहीं किया, इससे नियुक्ति में बाधा पड़ सकती है.

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मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक यूपी के पांच आईपीएस अफसरों की दावेदारी सामने आ रही है. यूपी के डीजीपी ओपी सिंह के अलावा डीजी रैंक के तीन आईपीएस अधिकारी इस समय केंद्रीय प्रतिनियुक्ति पर हैं, जबकि एक अधिकारी यूपी में ही सेवाएं दे रहे हैं. बीएसएफ के डीजी रजनीकांत मिश्रा, एनआईसीएसएफ के डीजी जावीद अहमद, आरपीएफ के डीजी अरुण कुमार और यूपी में निदेशक सतर्कता हितेश चंद्र अवस्थी भी रेस में शामिल बताए जाते हैं.

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बता दें कि हितेश चंद्र अवस्थी और जावीद अहमद के पास सीबीआई में काम करने का लंबा अनुभव है. जावीद अहमद तो यूपी के डीजीपी भी रह चुके हैं. अखिलेश यादव के मुख्यमंत्रित्व काल के अंतिम दिनों में जावीद अहमद यूपी के डीजीपी बने थे. पिछला यूपी विधानसभा का चुनाव जावीद अहमद के नेतृत्व में ही संपन्न हुआ था. बाद में योगी आदित्यनाथ की सरकार बनने के कुछ महीनों के बाद अहमद का ट्रांसफर कर दिया गया. अवस्थी और जावीद अहमद का सीबीआई में 15-15 सालों का काम करने का तजूर्बा है. ये दोनों अधिकारी सीबीआई में एसपी से लेकर ज्वाइंट डायरेक्टर लेवल जैसे पदों पर काम कर चुके हैं.

बता दें कि सीबीआई निदेशक की नियुक्ति एक सेलेक्शन कमेटी करती है. इस सेलेक्शन कमेटी में देश के प्रधानमंत्री, सुप्रीम कोर्ट के प्रधान न्यायाधीश और नेता प्रतिपक्ष शामिल होते हैं. सीबीआई डायरेक्टर को बनाने और हटाने का निर्णय सेलेक्शन पैनल ही करता है. सीबीआई निदेशक को बनाने और हटाने की प्रक्रिया में केंद्रीय सतर्कता आयोग (सीवीसी), गृह विभाग और कार्मिक विभाग की भागीदारी काफी अहम होती है.

पिछले हफ्ते ही आलोक वर्मा को डायरेक्टर पद से हटाने के बाद कार्मिक विभाग ने कई नामों को शॉर्टलिस्ट किया है. सीबीआई निदेशक का कार्यकाल दो साल का होता है. सीबीआई की नियुक्ति और हटाने में सेलेक्शन कमेटी की मंजूरी अनिवार्य है. 1997 से पहले सीबीआई निदेशक को केंद्र सरकार अपनी मर्जी से कभी भी हटा सकती थी, लेकिन 1997 में विनीत नारायण मामले के बाद सुप्रीम कोर्ट सीबीआई निदेशक की नियुक्ति कम से कम दो साल के लिए अनिवार्य कर दिया था.

सीबीआई डायरेक्टर का कार्यकाल कम से कम दो साल करने की पीछे सुप्रीम कर्ट की मंशा थी कि सीबीआई डायरेक्टर केंद्र सरकार के वर्चस्व से दूर और बिना डरे हुए काम कर सके. सुप्रीम कोर्ट ने सीबीआई निदेशक का तबादला भी असधारण स्थिति में करने की बात कही थी. डायरेक्टर के तबादले की प्रक्रिया में चयन समिति, सीवीसी, होम सेक्रेटरी, और सेक्रेटरी (कार्मिक) की राय बेहद जरूरी है.

दिलचस्प बात यह है कि 23 अक्टूबर को आलोक वर्मा को छुट्टी पर भेजे जाने के समय चयन समिति का फैसला नहीं लेने दिया गया. आलोक वर्मा और राकेश अस्थाना को छुट्टी पर भेजने का निर्णय और एम नागेश्वर राव को सीबीआई का अंतरिम चीफ बनाने का फैसला कैबिनेट नियुक्ति समिति का फैसला था, जिसको बाद में सुप्रीम कोर्ट ने खारिज कर दिया था.

सीबीआई के इतिहास में आलोक वर्मा सीबीआई के पहले ऐसे निदेशक बने जिनको दो साल का टर्म पूरा होने से पहले ही सेलेक्शन कमेटी ने हटा दिया. आलोक वर्मा का कार्यकाल 31 जनवरी 2019 को खत्म हो रहा था, लेकिन सरकार ने 10 जनवरी को उनका ट्रासंफर कर दिया.

In fight in CBI

बता दें कि जब किसी सीनियर आईपीएस अधिकारी को सीबीआई प्रमुख के लिए सेलेक्शन कमेटी विचार करती है तो वर्तमान प्रमुख के मत को भी महत्व दिया जाता है. सीबीआई प्रमुख को नियुक्त करने वाली कोलेजियम का गठन साल 2013 में किया गया था. साल 2013 से पहले केंद्रीय सतर्कता आयुक्त के पास सीवीसी कानून के तहत सीबीआई प्रमुख की नियुक्ति का अधिकार था.

मुख्य तौर पर कार्मिक एवं प्रशिक्षण विभाग (डीओपीटी) नए निदेशक की नियुक्ति में मुख्य भूमिका निभाता है. भारतीय पुलिस सेवा (आईपीएस) के डीजी रैंक के अधिकारियों में से कुछ नामों की एक सूची तैयार की जाती है. यह सूची 10, 20 या उससे ज्यादा अधिकारियों की भी हो सकती है. सूची में वरिष्ठता के लिहाज से तीन-चार बैच के आईपीएस अधिकारियों की लिस्ट होती है.

इस बार नए निदेशक की खोज 1983, 1984 और 1985 बैच के आईपीएस अधिकारियों में से होगी. डीओपीटी शॉर्टलिस्टेड अधिकारियों में से तीन-चार नाम सेलेक्ट कमेटी को भेजता है. भारत के मुख्य न्यायाधीश, देश के प्रधानमंत्री और नेता प्रति पक्ष वाली तीन सदस्यीय चयन समिति डीओपीटी द्वारा भेजे गए नामों से एक नाम पर अपनी सहमति देती है, जिसके बाद वह अधिकारी सीबीआई निदेशक बनता है और उसका टर्म दो साल लिए फिक्स रहता है.

बता दें कि तीन सदस्यीय चयन समिति चाहे तो किसी एक नाम पर सर्वसम्मति से फैसला कर निदेशक तय कर सकती है. अगर तीन सदस्यीय समिति में आम राय नहीं बन पाती है और तीनों की राय अलग-अलग होती है तो डीओपीटी से कहा जाता है कि कुछ और अधिकारियों के नामों को भेजे. साथ ही अगर दो सदस्यों की किसी एक नाम पर सहमति बन जाती है और तीसरा सदस्य दोनों सदस्यों की राय से इत्तेफाक नहीं रखता है तब भी यह फैसला 2-1 से माना जाता है. यानी किसी को हटाने और बनाने में दो सदस्यों की राय अहम होती है.

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आलोक वर्मा के जाने के बद डीओपीटी कुछ अधिकारियों की लिस्ट शॉर्टलिस्ट करने में लगा हुआ है. डीओपीटी अधिकारियों के नामों को शॉर्टलिस्ट करने के दौरान अधिकारियों का अनुभव और खासककर सीबीआई में काम करने का अनुभव, कैडर में सतर्कता से मामलों का निष्पादन और अधिकारियों की निष्ठा को तरजीह देता है. हालांकि, पिछले कुछ सालों के अनुभव को देखते हुए कहा जा सकता है कि केंद्र सरकार की इच्छा ही किसी को निदेशक बनाने में कारगर साबित होती है.

अगर पात्रता और अनुभव की बात करें तो पिछले निदेशक आलोक वर्मा के चयन में भी इन बातों का ख्याल नहीं रखा गया था. डायरेक्टर बनने से पहले आलोक वर्मा का सीबीआई में काम करने का कोई अनुभव नहीं था, जिसका नतीजा यह हुआ कि सीबीआई के अंदर ही घमासान शुरू हो गया. उसके बाद सीबीआई में जो हालात पैदा हुए वह सब के सामने हैं.

सुप्रीम कोर्ट के साल 2004 में तय दिशानिर्देशों के मुताबिक कहा गया है कि आईपीएस के चार सबसे पुराने बैच के सेवारत अधिकारी सीबीआई डायरेक्टर पद के लिए उपयुक्त हैं. खासतौर पर वरीयता सूची और भ्रष्टाचार के आरोप से मुक्त अधिकारियों को प्रमुखता से स्थान दिया जाता है.

CBI HQ

बता दें कि सीबीआई भारत सरकार की प्रमुख जांच एजेंसी है. यह भिन्न-भिन्न प्रकार के अंतरराष्ट्रीय, राष्ट्रीय और आपराधिक मामलों की जांच के लिए बनाई गई है. यह भारत सरकार के कार्मिक एवं प्रशिक्षण विभाग के अधीन कार्य करती है. इसका संगठन फेडरल ब्यूरो ऑफ इन्वेस्टिगेशन से मिलता-जुलता है, लेकिन इसके अधिकार एवं कार्य-क्षेत्र एफबीआई की तुलना में बहुत सीमित हैं. इसके अधिकार एवं कार्य दिल्ली विशेष पुलिस संस्थापन अधिनियम (Delhi Special Police Establishment Act), 1946 में परिभाषित है. सीबीआई भारत के लिए इंटरपोल की एक आधिकारिक इकाई भी है.

केन्‍द्र सरकार के कर्मचारियों द्वारा घूसखोरी और भ्रष्‍टाचार के मामलों की जांच करने के उद्देश्य से एक केन्‍द्रीय सरकारी एजेंसी की जरूरत महसूस की गई. इसलिए 1946 में दिल्‍ली विशेष पुलिस प्रतिष्‍ठान अधिनियम लागू किया गया. इस अधिनियम के द्वारा विशेष पुलिस प्रतिष्‍ठान का अधीक्षण गृह विभाग को हस्‍तांतरित हो गया और इसके कामकाज को विस्‍तार देकर भारत सरकार के सभी विभागों को कवर कर लिया गया.

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