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पंजाब के युवाओं का पलायन, पार्ट-3: बेरोजगारी धकेल रही है युवाओं को खाड़ी देशों में

खाड़ी के देशों में नौकरी चाह रहे नौजवान इस मौके को हासिल करने के लिए एजेंट को डेढ़ लाख रुपए तक देते हैं. यह रकम वे अक्सर कर्ज लेकर जुटाते हैं

Arjun Sharma Updated On: Mar 31, 2018 02:02 PM IST

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पंजाब के युवाओं का पलायन, पार्ट-3: बेरोजगारी धकेल रही है युवाओं को खाड़ी देशों में

Editor's note: विदेश मंत्री सुषमा स्वराज ने 20 मार्च को संसद में बताया कि इराक के मोसुल से अगवा किए गए 39 भारतीयों को, जिनमें ज्यादातर पंजाब के थे, बीते साल इस्लामिक स्टेट ने मार दिया था. पंजाब में भारी बेरोजगारी की हालत है. ऐसे में सूबे के गरीब और वंचित तबके के हजारों नौजवान बेहतर अवसर की तलाश में जोखिम को नजरअंदाज कर हुए मध्य-पूर्व के देशों में जाते हैं. मध्य-पूर्व में रोजगार के लिए जाने वाले कामगारों के हालात पर जारी ऋंखला के चार हिस्से की रिपोर्ट की श्रृंखला की इस तीसरी कड़ी में आगे पढ़िए:

लुधियाना: उम्र के छत्तीस साल पूरे कर चुके सतनाम सिंह दो साल पहले दुबई गए. मन में था कि इतना कमा सकूं जो अपने दो बच्चों, 11 साल के बेटा और 8 साल की बेटी को पढ़ाने-लिखाने के लिए काफी हो. सतनाम एक कुशल बढ़ई हैं लेकिन पंजाब में गृहजिले पठानकोट में रहते हुए वे अपने परिवार का भरण-पोषण करने लायक कमाई नहीं कर पा रहे थे.

सतनाम अब दुबई के अलबर्शा में एक बहुमंजिली रिहाइशी इमारत में काम करते हैं. इस इमारत के नजदीक ही दड़बेनुमा कमरों का एक शिविर बना हुआ है, जहां सतनाम अपने सैकड़ों सहकर्मियों के साथ रहते हैं. सतनाम ने फोन पर हुई बातचीत में कहा, 'एक कमरे में तीन से पांच जन रहते हैं. उनमें से कोई बांग्लादेश से आया है तो कोई पाकिस्तान से. कोई भारत से हैं तो कोई दक्षिण एशिया के किसी और मुल्क से. ये लोग निर्माण-स्थल पर हर रोज 12-14 घंटे काम करते हैं.'

सतनाम बताते हैं कि वेतन नियमित नहीं मिलता. लेकिन इससे ज्यादा संगीन मुश्किल साफ-सफाई और रहने-ठहरने की दशा की है. सतनाम ने कहा, 'जब आप खाड़ी के देशों में आते हैं तो यहां आपके स्वागत में खड़ी मिलती हैं ऊंची-ऊंची इमारतें और अल्ट्रा-माडर्न तकनीक. लेकिन सच्चाई ये है कि कामगारों को कभी-कभी इन इमारतों को बनाने में अपनी जिंदगी गंवानी होती है.'

खतरनाक हालात में काम कर रहे हैं भारतीय मजदूर

सतनाम की तरह, दुबई और फारस की खाड़ी के अन्य देशों में कामगारों की एक बड़ी तादाद पंजाब से आई है. ये कामगार ज्यादा पढ़े-लिखे नहीं लेकिन हुनरमंद हैं. सो, इन्हें निर्माण-कार्य की खतरनाक जगहों पर काम मिल जाता है.

अंतरराष्ट्रीय स्वयंसेवी संस्था ह्युमन राइटस् वॉच की एक रिपोर्ट मुताबिक दुबई सरकार का यह दावा कि 2004 में काम करते हुए 34 निर्माण मजदूरों की मौत हुई, हकीकत को कम करके आंकने की कोशिश है. रिपोर्ट में कहा गया है कि कार्य-स्थल पर होने वाली मौतों में अकेले भारतीय मजदूरों की मौतों की तादाद ही इससे कहीं ज्यादा है.

ह्युमन राइटस् वॉच की रिपोर्ट में दर्ज है कि, 'मजदूरों की कमी से जूझती मुक्त अर्थव्यवस्था के भीतर ज्यादातर दूसरी जगहों पर होता ये है कि कामकाज के हालात नुकसानदेह हों या मजदूरी का भुगतान ना हो तो मजदूर कोई और काम तलाश लेते हैं. लेकिन संयुक्त अरब अमीरात में अप्रवासी मजदूरों को यह विकल्प हासिल नहीं. इस मुल्क के बाकी अप्रवासी मजदूरों की तरह इन्हें भी अनुबंध के तहत किसी एक नियोक्ता के लिए ही काम करना होता है. कोई मजदूर किसी दूसरे नियोक्ता के लिए तभी काम कर सकता है जब वह मौजूदा नियोक्ता के लिए दो साल तक काम कर ले और उसे मौजूदा नियोक्ता से कहीं और काम करने के लिए मंजूरी मिल जाए.'

A worker checks the valve of an oil pipe at Nahr Bin Umar oil field, north of Basra, Iraq

29 वर्षीय अर्शदीप सिंह सऊदी अरब के अल फैसलिया सिटी में राजमिस्त्री का काम करते हैं. अर्शदीप ने फोन पर हुई बातचीत में बताया कि उन्हें 48 डिग्री सेल्सियस तापमान में भी ऊंची इमारतों पर काम करना होता है. अर्शदीप का कहना है कि 'पंजाब में तो तापमान 42 डिग्री सेल्सियस तक पहुंच जाए तो हम घरों से बाहर तक नहीं निकलते. लेकिन यहां हमें इतनी ज्यादा गर्मी में काम करना होता है. इसका मेरी सेहत पर असर पड़ा है. मुझे त्वचा समेत कई और रोग लग गए हैं और मैं इस साल भारत लौट जाने की योजना बना रहा हूं.'

बंधक का जीवन जीने को मजबूर हैं भारतीय मजदूर

खाड़ी के देशों में नौकरी चाह रहे नौजवान इस मौके को हासिल करने के लिए एजेंट को डेढ़ लाख रुपए तक देते हैं. यह रकम वे अक्सर कर्ज लेकर जुटाते हैं. सो नौकरी मिल जाए और वैसी ना निकले जैसा कि एजेंट ने वादा किया था तब भी ऐसे नौजवानों के लिए कर्ज के चुकाए जाने तक नौकरी जारी रखने के सिवाय और कोई चारा नहीं होता. दरअसल कांट्रैक्टर अक्सर इन कामगारों के पासपोर्ट अपने पास जब्त कर लेता है ताकि वे अनुबंध के खत्म होने तक वापस ना लौट सकें.

यह भी पढ़ें: पंजाब के युवाओं का पलायन पार्ट-1: जिंदगी खतरे में डाल नौकरी ढूंढ रहे युवा

महिला मजदूरों की दशा भी अच्छी नहीं है. लुधियाना की 46 वर्षीया कुलदीप कौर ने पिछले दिसंबर में अपनी बेटी को एक वीडियो मैसेज भेजकर शिकायत की थी कि वह सऊदी अरब में मुश्किल में फंस गई है और उससे जबरन नौकरानी का काम लिया जा रहा है. कुलजीत कौर ने कहा था कि उसके कामकाज की दशा बहुत कठिन है और उसे बहुत लंबे वक्त तक लगातार काम करना होता है.

बीते साल अक्तूबर महीने में एक अन्य वीडियो में एक युवती ने संगरुर जिले के सांसद भगवंत मान से गुहार लगाई थी कि मुझे किसी भी तरह सऊदी अरब के रियाद से निकालो. वीडियो में लड़की बहुत रो रही थी और कह रही थी कि मुझे पिछले एक साल से यातना दी जा रही है.

एक और सांसद डा. कीर्ति पी सोलंकी ने 21 मार्च को कहा कि कतर में काम करने वाले भारतीय कामगारों को मजदूरी का भुगतान नहीं हो रहा. उन्होंने विदेश मंत्री से पूछा कि खाड़ी के देशों में काम करने वाले भारतीय कामगारों की रक्षा और उनके अधिकारों की हिफाजत के लिए कौन से कदम उठाये गए हैं.

उन्होंने बताया कि 162 कामगारों को मजदूरी का भुगतान नहीं मिल पाया है और उन्हें एक्जिट-परमिट भी नहीं दिया जा रहा. उन्होंने कहा 'भारतीय दूतावास ने इंडियन कम्युनिटी वेलफेयर फंड से एयर टिकट का इंतजाम किया और 160 अप्रवासी मजदूरों को स्वदेश वापस बुलाया है जबकि दो अन्य मजदूरों ने कंपनी में काम जारी रखने का विकल्प चुना.'

EDS PLS TAKE NOTE OF THIS PTI PICK OF THE DAY:::::::: New Delhi : External Affairs Minister Sushma Swaraj with MoS for External Affairs VK Singh after a press conference over the death of 39 Indians who were kidnapped in Iraq, in New Delhi on Tuesday. PTI Photo by Subhav Shukla (PTI3_20_2018_000146A)(PTI3_20_2018_000165B)

बढ़ रही है खाड़ी देशों में पलायन करने वालों की संख्या

ह्युमन राइटस् वॉच की रिपोर्ट में लिखा है कि, 'सरसरी निगाह से देखें तो कार्यस्थल से जुड़ी सुरक्षा और सेहत, मुआवजा, बाल-मजदूरी, काम के घंटे और छुट्टी की अवधि से जुड़े संयुक्त अरब अमीरात के कानून बेहतर जान पड़ते हैं लेकिन इस बात के कोई प्रमाण नहीं हैं कि इन कानूनों को मजदूरों के हक की हिफाजत में लागू भी किया जाता है. ह्युमन राइटस् वॉच ने जिन मामलों की तहकीकात की तथा जो मामले समाचारों में आए हैं, उनसे यह तथ्य खुलकर सामने आता है कि सरकार या फिर अदालत से फरियाद करने का तरीका कामगारों के लिए खास कारगर नहीं.'

खाड़ी के देशों में कायम भारतीय दूतावास संकट में फंसे कामगारों को मदद देते हैं और जैसा कि विदेश मंत्री सुषमा स्वराज का कहना है, 'दुबई, शारजाह, रियाद, जेद्दा तथा कुआलांलपुर (मलेशिया) में इंडियन वर्कर्स रिसोर्स सेंटर बनाने गए हैं जो विदेशों में काम कर रहे भारतीय कामगारों से जुड़े सभी मसलों पर राय-सलाह और मदद देते हैं.'

लुधियान के नजदीक के एक गांव दाखा के धरमिन्दर सिंह (33 वर्ष) 2016 में बहरीन से लौटे. बहरीन में उन्होंने 2 साल तक काम किया था. धरमिन्दर का कहना है कि मैं वहां दोबारा जाने की तैयारी में लगा हूं. उनका कहना है, 'वहां मैने बहुत सी मुश्कलें झेलीं. जिस जगह पर मैं निर्माण-मजदूर के तौर पर काम कर रहा था वहां कांट्रैक्टर भी बहुत परेशान करता था. सो मैंने वापस लौटने का फैसला किया. लेकिन यहां पंजाब में तो हमारे लिए रोजगार के अवसर ही नहीं हैं. इसलिए मैंने ट्रैवेल एजेंट के जरिए फिर से बहरीन के लिए वीजा की अर्जी लगाई है.'

धरमिन्दर की तरह सोचने वाले बहुत हैं. साल 2014 से 2016 के बीच भारत से खाड़ी के देशों में पहुंचने वाले कामगारों की तादाद 17.86 लाख पहुंच चुकी थी.

यह भी पढ़ें: पंजाब के युवाओं का पलायन, पार्ट-2: भारतीयों को इराक भेजने वाले एजेंटों की तलाश

(लुधियाना में रहने वाले अर्जुन शर्मा फ्रीलांस लेखक और 101रिपोर्टर.कॉम के सदस्य हैं. 101रिपोर्टर.कॉम जमीनी स्तर की रिपोर्टिंग करने वाले संवाददाताओं का एक अखिल भारतीय नेटवर्क है. यहां पेश आलेख में कपूरथला के जगजीत धंजू से प्राप्त कुछ सूचनाओं का उपयोग हुआ है)

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