S M L

पंजाब ड्रग्सः कलंक के डर से इलाज नहीं करवातीं नशे की लत में डूबी औरतें

महिलाओं के बारे में यह मानना कि वे नशा नहीं करतीं और ठीक इसी कारण उन्हें नशामुक्ति के उपचार से वंचित करना दूरगामी तौर पर समाज की सेहत के लिए नुकसानदेह साबित हो सकता है

Updated On: Jan 26, 2018 08:44 AM IST

Neha Singhal, Sumathi Chandrashekaran

0
पंजाब ड्रग्सः कलंक के डर से इलाज नहीं करवातीं नशे की लत में डूबी औरतें
Loading...

'पिंजर बनाते कित्ते पुत्त मावां दे, अग्ग दिये भाथिए

किनेयां दी जिंदगी ब्लैक करती, नी तू लाल बत्तीए,'

लालबत्ती: हाल का एक लोकप्रिय पंजाबी गीत जिसमें स्मैक के नशे में गर्क होती नई पीढ़ी का जिक्र है.

पंजाब में किसी महामारी की भांति पसरे नशे की लत के बारे में बीते कुछ दशकों में भारत और भारत के बाहर बहुत कुछ लिखा और कहा गया है. सूबे में मादक पदार्थों के इस्तेमाल का मुद्दा लोगों के ध्यान में एक बार फिर से आया जब राहुल गांधी ने गुरु नानक यूनिवर्सिटी के एक अध्ययन के हवाले से कहा कि पंजाब में 70 फीसद नौजवान आबादी नशे की गिरफ्त में है. साल 2013 में भारत में नारकोटिक्स ड्रग्स एंड सायकोट्रोपिक सब्स्टांसेज (एनडीपीएस) एक्ट के तहत सबसे ज्यादा मामले (42.2 प्रतिशत) पंजाब में दर्ज हुए थे और 2014 में एनडीपीएस एक्ट के तहत पंजाब में दोषी करार दिए गए लोगों की संख्या सबसे ज्यादा (राष्ट्रीय स्तर पर आंकड़ा 8923 व्यक्तियों का रहा, जिसमें पंजाब से 3972 व्यक्ति थे) रही.

सूबे में नशे के चलन की कई वजहें गिनाई जाती हैं जिनमें पंजाब का भारत-पाकिस्तान सीमा से नजदीक होना, गोल्डेन क्रेसेंट कहलाने वाले अफीम के अवैध व्यापार-मार्ग की जद में होना, सियासी उदासीनता, खेती के मशीनीकरण के कारण छुपी हुई बेरोजगारी और अप्रवासी मजदूरों की सूबे में मौजूदगी जैसी बातें शामिल हैं. मादक द्रव्यों की तस्करी और बिक्री धन कमाने का आसान जरिया साबित होती है. माना जाता है कि आधा किलो हिरोइन एक जगह से दूसरे जगह पहुंचा दिया जाय तो इसके 50 हजार से 1 लाख रुपए मिल जाते हैं. अधिकारियों का कहना है कि नशे की चीजें जेलों में भी पहुंचती हैं, जेलों में नशे का चलन कहीं ज्यादा है.

किसी पहेली सरीखी जान पड़ते नशे के इस कथानक के भीतर एक गांव मकबूलपुरा का जिक्र बार-बार आता है. इसे विधवाओं का गांव कहा जाता है. मकबूलपुरा शहर अमृतशहर के बाहरी छोर पर बसा है और कुख्यात है. ऐसा माना जाता है कि इस गांव के हर परिवार में किसी ना किसी पुरुष सदस्य ने नशे के कारण जान गंवाई है.

पंजाब के बाकी इलाकों के हालात भी इससे मिलते-जुलते हैं. नशेड़ी होने के आरोप पुरुषों पर लगते हैं और जो सीधे नशे के गिरफ्त में हैं वे भी अमूमन पुरुष ही हैं. इस पूरे कथानक में पंजाब की औरतों को तकरीबन हमेशा मादक द्रव्यों के व्यापार के ‘शिकार’ के रूप में पेश किया जाता है, उन्हें विधवा या अनाथ कहा जाता है, यह नहीं कहा जाता कि महिलाएं नशा करती हैं.

तो आखिर इस पूरी कहानी में महिलाएं कहां हैं?

पंजाब में नशे की चीजें यूं तो सहज मिल जाती हैं लेकिन मादक द्रव्यों के इस्तेमाल को लेकर मौजूद आंकड़ों का संकेत है कि महिलाएं नशे की गिरफ्त में आने से बचने का प्रयास करती हैं.

drugs india

विधि सेंटर फॉर लीगल स्टडी के एक अध्ययन के मुताबिक 2016 में एनडीपीएस एक्ट के तहत अमृतसर सेंट्रल जेल में 2000 पुरुष कैदी थे लेकिन एनडीपीएस एक्ट के तहत आरोपित महिलाओं की तादाद महज 40 थी. इन 40 महिलाओं में केवल 10 पर मादक द्रव्यों के इस्तेमाल का आरोप था, बाकी पर नशे की चीजों की बिक्री के आरोप थे.

नशे का काम लेने से महिलाओं में लग सकती है इसकी लत

इसके उलट एनडीपीएस एक्ट के अंतर्गत जेल भेजे गए सभी पुरुषों पर मादक द्रव्य के इस्तेमाल के आरोप थे. अमृतसर के स्वामी विवेकानंद नशामुक्ति केंद्र में दाखिल 9462 लोगों में महिलाओं की संख्या केवल 33 थी. नशामुक्ति केंद्र तथा कारागार के आंकड़ों से यह भी संकेत मिलता है कि महिलाओं से मादक-द्रव्य की तस्करी का काम लिया जाय तो उन्हें नशे की लत लग सकती है.

कपूरथला सिविल हॉस्पिटल के डाक्टर संदीप भोला ने फ़र्स्टपोस्ट से बातचीत में कहा कि नशे की चीजों के अवैध धंधे में लिप्त कई लोग खुद नशे की गिरफ्त में आए और उन्होंने स्वेच्छा से कपूरथला के नशामुक्ति केंद्र में दाखिला लिया. नशामुक्ति केंद्र में ठहरने के वक्त तक नशे की चीजों का अपना धंधा चलाने का जिम्मा वे पत्नी को सौंप देते हैं. उनके मन में कभी यह बात आती ही नहीं कि नशे का धंधा संभालने के कारण उनकी पत्नी को भी नशे की लत लग सकती है.

तो आखिर ऐसा क्यों नहीं लगता लोगों को कि महिलाएं भी नशे की लत में पड़ सकती हैं ?

पंजाब में मादक-द्रव्यों के इस्तेमाल के आंकड़ों में महिलाओं की तादाद कम क्यों थी, यह समझने के लिए हमने जज, पुलिसकर्मी, जेल के अधिकारियों, डॉक्टर्स तथा सामाजिक कार्यकर्ताओं से कई साक्षात्कार किए. हमारा सवाल इस बात को लेकर था कि मादक द्रव्य के इस्तेमाल के मामले में महिलाओं और पुरुषों की तादाद में भारी अंतर क्यों दिखाई दे रहा है.

साक्षात्कार में इस सवाल पर ज्यादातर लोगों की प्रतिक्रिया हैरत जताने की होती थी. जो जवाब मिलते थे उनसे कुल मिलाकर अर्थ यही निकल रहा था कि किसी महिला का नशे की लत में पड़ना उन सबके लिए एक अकल्पनीय बात है. वे मानकर चल रहे थे कि महिलाओं के लिए शराब पीने या नशे की अन्य चीजें लेने की सामाजिक मनाही है और इस मनाही के कारण महिलाएं नशे की चीजों का इस्तेमाल नहीं करतीं, सामाजिक मनाही अपने आप में पर्याप्त है.

राज के पर्दाफाश होने के भय से महिलाएं नशे की लत के उपचार से रह जाती हैं वंचित

युनाइटेड नेशन्स ऑफिस ऑन ड्रग्स एंड क्राइम (यूएनओडीसी) के एक अध्ययन के मुताबिक महिलाओं में नशे का चलन हो तो इसे जान पाना बहुत मुश्किल होता है. परंपरागत रूप से कराए जाने वाले ड्रग-सर्वे के तथ्यों से भी यह बात पता चलती है और उपचार की मौजूद सुविधाएं भी इस तथ्य का संकेत करती हैं. महिलाओं में नशे की लत के कम होने के पीछे कुछ वजहों को पहचाना जा सकता है.

मिसाल के लिए, महिलाओं पर परिवार का दायित्व ज्यादा होता है और वे अपनी जरुरतों के ऊपर परिवार की जरुरतों को तरजीह देकर चलती हैं. इस कारण उनकी नशे पर निर्भरता छुपी रह जाती है और उसका उपचार भी नहीं हो पाता. सामाजिक मनाही, राज के फर्दाफाश होने का भय और हासिल सहयोग में कमी जैसे कारणों से भी महिलाएं नशे की लत के उपचार से वंचित रह जाती हैं.

प्रतीकात्मक तस्वीर

प्रतीकात्मक तस्वीर

समाजीकरण और पहुंच, ये दो चीजें महिलाओं में नशे के चलन के कम होने की वजह हो सकती है- ऐसा संकेत हमें अपने साक्षात्कारों के मार्फत मिला. नशे की लत हमजोलियों की संगत और असर में लगा करती है. लेकिन पंजाब के ग्रामीण इलाके में महिलाएं ज्यादातर घरों के बाहर नहीं निकलतीं, इस कारण उनका हमजोलियों से मिलना नहीं होता, वे दोस्तों के असर से बची रहती हैं और इस कारण नशे की चीजों तक उनकी पहुंच भी कम हो पाती है. इसके उलट जहां महिलाएं अपने पारिवारिक परिवेश के नजदीक पड़ने वाले लोगों से मिलती-जुलती हैं वहां नशे की चीजों तक उनकी पहुंच आसान बन जाती है.

साक्षात्कार के दौरान सुनी-सुनाई के आधार पर लोगों ने यह भी कहा कि जो महिलाएं विश्वविद्यालयों में पढ़ती हैं या फिर हॉस्टल अथवा बड़े शहरों में रहती हैं उन्हें गांवों या खेतों में रहने वाली महिलाओं की तुलना में नशे की लत लगने की आशंका ज्यादा है. डॉ. भोला ने कहा कि कॉलेज की छात्राएं चोरी-छुपे नशा करती हैं लेकिन जाहिर तौर पर नशे का चलन पंजाब में महिला-वेश्याओं (फीमेल प्रॉस्टिट्यूट) में ज्यादा है.

इसकी कई वजहें हैं, जैसे- नशे की चीजों तक आसान पहुंच, नशे की चीजों के प्रयोग को लेकर सामाजिक लांछन या बाधा का अभाव (वेश्या होने को लेकर जो सामाजिक लांछन मौजूद है, कम से कम उसकी तुलना में नशे की आदत को लेकर सामाजिक लांछन कम ही कहलाएगा). फिर ऐसी महिलाओं को नशे की आदत के लिए शायद ही किसी पुरुष के सामने जवाबदेह होना पड़ता है. यहां एक अहम बात यह भी है कि ऐसी ज्यादातर महिलाएं नशे को अपने पेशेवर जीवन या कह लें निजी जिंदगी से निजात पाने का एक तरीका समझती हैं.

महिलाएं नशे की लत या इस धंधे जैसी गतिविधियों में कम भागीदार हैं

यह भी सच है कि नशे की लत के कारण फौजदारी के कानूनों के तहत गिरफ्तार की गई महिलाओं की संख्या पुरुषों की तुलना में बहुत कम है. नेशनल क्राइम रिकॉर्ड ब्यूरो के आंकड़ों के मुताबिक 2016 में संज्ञेय श्रेणी में शामिल जितने अपराध हुए उनमें केवल 5.2 फीसद मामलों में महिलाएं आरोपित की गईं.

यह तथ्य इस मनोभावना को पुष्ट करता है कि महिलाएं नशे की लत या नशे के धंधे सरीखी आपराधिक गतिविधियों में कम भागीदार हैं. इस सोच के कारण महिलाओं पर शक की सूई कम घूमती है, मादक द्रव्यों से जुड़े मामलों में उन्हें पूछताछ के घेरे में लेने, गिरफ्तार करने या बंदी बनाने की संभावना कम होती है.

आंकड़ों और साक्षात्कार से जाहिर होता है कि महिलाओं के नशे की लत को लेकर सामाजिक लांछन की भावना बहुत ज्यादा गहरी है. जैसा कि यूएनओडीसी की रिपोर्ट में कहा गया है, नशे की लत अगर किसी महिला को हुई तो फिर समाज उसपर दोहरा लांछन जड़ता है. जो लोग नशा करते हैं उनके बारे में समाज मानता है कि वे पतन की राह पर हैं क्योंकि उन्होंने अपराध का रास्ता अपना लिया है लेकिन नशे की लत किसी महिला को हुई तो माना जाता है कि उसका अपराध और भी ज्यादा बड़ा है क्योंकि पत्नी, मां या फिर परिवार का पालन-पोषण करने वाली अपनी भूमिका को उसने दरकिनार कर दिया है.

जैसा कि बहुत से लोग मानते हैं, शायद यह बात सच है कि अवसर की कमी और सामाजिक लांछन के भय के कारण महिलाएं नशे की चीजों को अपनाने से अपने को रोके रखती हैं. लेकिन इसका उलटा भी सच हो सकता है कि महिलाएं नशे की चीजों का इस्तेमाल तो बखूबी कर रही हैं लेकिन नशामुक्ति केंद्र की मशीनरी या फिर कानून-व्यवस्था इस चलन को पकड़ पाने में सफल नहीं हो रही.

नशे की लत के उपचार के लिए पुर्नवास केंद्रों पर आने वाली महिलाओं की तादाद अगर कम है तो उसकी वजह यह भी हो सकती है कि वे उपचार कराने में संकोच कर रही हों, उन्हें लगता हो कि लोग-बाग जान जाएंगे कि उन्हें नशे की लत है. अगर मामला ऐसा है तो फिर महिलाओं के बारे में यह मानना कि वे नशा नहीं करतीं (और ठीक इसी कारण उन्हें नशामुक्ति के उपचार से वंचित करना) दूरगामी तौर पर समाज की सेहत के लिए नुकसानदेह साबित हो सकता है और समाधान के जिन उपायों में महिलाओं से जुड़ी सच्चाइयों का ख्याल नहीं रखा जाता वे चाहे नाकाम न हों लेकिन अपने लक्ष्य को पूरा करने में उनसे चूक जरूर होती है.

(दोनों लेखक विधि सेंटर फॉर लीगल पॉलिसी में सीनियर रेजिडेन्ट फेलो हैं.)

0
Loading...

अन्य बड़ी खबरें

वीडियो
फिल्म Bazaar और Kaashi का Filmy Postmortem

क्रिकेट स्कोर्स और भी

Firstpost Hindi