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PNB घोटाला : नीरव मोदी भाग निकला, हमारा सिस्टम मुंह क्यों ताकता रह गया ?

विजय माल्या से नीरव मोदी तक घोटालेबाज आखिर हमारे देश से भाग कैसे निकलते हैं

Updated On: Feb 17, 2018 08:58 PM IST

Sandipan Sharma Sandipan Sharma

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PNB घोटाला : नीरव मोदी भाग निकला, हमारा सिस्टम मुंह क्यों ताकता रह गया ?

पंजाब नेशनल बैंक के कथित घोटाले से जुड़े तीन अहम तथ्य पूरी बैंकिंग व्यवस्था में व्यापक तौर पर फैली सड़ांध की तरफ इशारा करते हैं. बैंक की एक शाखा के सिर्फ दो कर्मचारियों ने ऐसे फर्जीवाड़े को अंजाम दिया, जिसकी पंजाब नेशनल बैंक को अपने सालाना मुनाफे के 10 गुना रकम के तौर पर कीमत चुकानी पड़ी. दूसरा यह कि जांच-पड़ताल के तमाम जरूरी सिस्टम के बावजूद फर्जीवाड़े का तकरीबन 6 साल तक पता नहीं चला. तीसरा, घोटाले की जांच हो उससे हफ्तों पहले इसे अंजाम देने वाले और उनके परिवार के लोग निकल भागने में सफल रहे. ये सभी पहलू एक-दूसरे से जुड़े हैं और विभिन्न एजेंसियों में उच्च स्तर पर मौजूद सिलसिलेवार नाकामी को बयां करते हैं.

बैंक का कामकाज खत्म होने के बाद हर लेनदेन का रोजाना हिसाब-किताब किया जाता है और रिजर्व बैंक हर बैंक के बही-खातों की ऑडिटिंग करता है, ऐसे में यह समझना मुश्किल है कि भारत और विदेश में किस तरह से वर्षों तक ठगी का यह खेल चलता रहा. बही-खाते के मैन्युअल सिस्टम में काम मुश्किल हो सकती है, लेकिन कंप्यूटर और सेंट्रलाइज्ड सर्वर के दौर में इस चूक की कल्पना भी नहीं की जा सकती.

इसके बावजूद पंजाब नेशनल बैंक के सिर्फ दो कर्मचारी कई साल तक इस घोटाले को अंजाम देते रहे. अब यह बात उभरकर सामने आ रही है कि बैंक का एक अंदरूनी तंत्र था, जिसका बेजा फायदा उठाया गया. अंतरराष्ट्रीय सौदों के लिए बैंक का सॉफ्टवेयर उसके कोर बैंकिंग सिस्टम से जुड़ा नहीं था. बैंक के अंतरराष्ट्रीय लेनदेन उसके मेसेजिंग सिस्टम- स्विफ्ट के जरिए किए जाते थे.

इस मैसेजिंग सिस्टम से दुनियाभर में पैसे ट्रांसफर करने की सुविधा मुहैया की जाती थी. इसका मतलब यह था कि बैंक पीएनबी की तरफ से जारी लेटर ऑफ अंडरस्टैंडिंग के आधार पर नीरव मोदी की कंपनियों को यह सोचकर लोन दे रहे थे कि उनके लोन का भुगतान पंजाब नेशनल बैंक द्वारा कर दिया जाएगा, लेकिन भ्रष्ट कर्मचारियों ने यह सुनिश्चित किया कि लेनदेन को रिकॉर्ड नहीं किया जाए.

nirav modi

हालांकि, यह 6 साल तक कैसे चलता रहा? लेटर ऑफ अंडरस्टैंडिंग छोटी अवधि के कर्ज के लिए जारी किए जाते हैं. क्या लेनदारों ने उधार दी गई रकम की वसूली के लिए पंजाब नेशनल बैंक से कभी संपर्क नहीं किया? अगर हां, तो पंजाब नेशनल बैंक के प्रबंधन का घोटाले पर ध्यान क्यों नहीं गया? साथ ही, किस तरह से सिर्फ दो एंप्लॉयीज- एक उप प्रबंधक और एक क्लर्क (पदानुक्रम के लिहाज से दोनों काफी नीचे) फर्जीवाड़े को 5 साल तक अंजाम देते रहे. क्या ज्यादातर बैंक कर्मचारियों की तरह उनका ट्रांसफर या प्रमोशन नहीं हुआ या फिर उन्हें अलग जिम्मेदारी नहीं दी गई?

जैसा कि बैंक से साधारण कर्ज लेने वाला एक शख्स भी आपको बताएगा, कर्ज का भुगतान नहीं करके बचना तकरीबन नामुमकिन है. यहां तक कि अगर आप कुछ किस्त भी मिस करते हैं, तो बैंक नोटिस भेजते हैं और कानूनी कार्यवाही शुरू कर देते हैं; वे कर्ज लेने वाले से डिफॉल्टर की तरह बर्ताव करते हैं. ऐसे में मोदी को किस तरह से तकरीबन 6 साल तक छोटी अवधि के लोन का भुगतान नहीं करने की इजाजत दी जा सकी? नीरव मोदी को किसी तरह का रेहन पेश किए बिना किस तरह से लोन की सहूलियत दी जाती रही? जाहिर तौर पर यह मामला 12,000 करोड़ के घोटाले और सिर्फ दो कर्मचारियों की संलिप्तता से परे का है.

इसके बाद ऑडिट का सवाल है. अगर कई बैंकों (17 और इसकी संख्या अभी बढ़ रही है) को मोदी की कंपनियों द्वारा चूना लगाया जा रहा था, रिजर्व बैंक को इस घोटाले की भनक कैसे नहीं लगी? क्या इसका मतलब यह है कि अलग-अलग बैंक एक-दूसरे से सूचनाएं साझा नहीं कर रहे हैं, लिहाजा इन संस्थानों को फर्जीवाड़े या घोटाले का खतरा ज्यादा है?

घोटाले और ठगी का इतिहास काफी पुराना है. जहां भी कानून है, वहां हमेशा कोई न कोई रहता है, तो इसे तोड़ने के तरीके तलाशने की कोशिश करता रहता है. हालांकि, स्मार्ट सिस्टम और देश इससे दो तरीकों से निपटते हैं. पहला, गलतियों से सीखकर और इसे नहीं दोहराकर. दूसरा, कानून तोड़ने के लिए जल्द और सख्त सजा सुनिश्चित कर.

भारत दुर्भाग्य से फर्जीवाड़ों के इतिहास से नहीं सीख पाया, जो एक-दूसरे जैसे ही रहे हैं. वित्तीय गड़बड़ी को अंजाम देने का मोदी का तरीका बिल्कुल वैसा ही है, जैसा हर्षद मेहता, केतन पारेख, विजय माल्या और कई अन्य के वित्तीय फर्जीवाड़े का था. इन लोगों ने बाजार में गड़बड़ी करने के लिए बैंक से उधार लिया. इसके बावजूद बैंकिंग इंडस्ट्री ने अपनी गड़बड़ियों को नहीं सुधारा है. भारत में कानून का पालन सुनिश्चित कराने वाली एजेंसियां भी अतीत से सबक लेने में नाकाम रही हैं. भारत में अक्सर अपराधी के भागने और सुरक्षित ठिकाने पर पहुंचने के बाद कानूनी डंडा चलता है और एक तरह से ऐसा चलन बन गया है.

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बड़ी शख्सियतों से जुड़े घोटाले के हर मामले में एक अद्भुत समानता है. माल्या, ललित मोदी और नीरव मोदी किस तरह से कार्रवाई और गिरफ्तारी से पहले भागने में सफल रहते हैं? अगर इयान फ्लेमिंग के शब्ध उधार लेकर कहें, तो इस चलन को कुछ इस तरह से बयां किया जा सकता हैः घटना एक बार होती है, दूसरा बार संयोग होता है और तीसरा बार दोस्ताना कार्रवाई होती है.

व्यवस्था में बीमारी की जड़ें काफी गहरी हो चुकी हैं. सिर्फ व्यापक और निष्पक्ष जांच से इस बात का खुलासा हो सकता है कि इस मामले में कितनी एजेंसियों और लोगों ने समझौता किया है.

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