S M L

पंजाब में पराली जलने से दम घुटता रहे, बस दिल्ली में धुआं न आए

कार से प्रदूषण पर किसी ने नहीं कहा कि कार चलाने वालों को सजा दीजिए. लेकिन किसानों को जेल में डाला जा रहा है

Updated On: Oct 30, 2017 09:45 AM IST

Anand Dutta
(लेखक स्वतंत्र पत्रकार हैं)

0
पंजाब में पराली जलने से दम घुटता रहे, बस दिल्ली में धुआं न आए

दिवाली क्या बीत गई, दिल्ली के लोगों की प्रदूषण के प्रति हायतौबा भी खत्म हो गई. ऐसा क्यों है कि दिवाली आते ही लोगों को वायु प्रदूषण की चिंता होने लगती है. वायू प्रदूषण की चिंता तो ठीक है, लेकिन केवल वायू प्रदूषण की चिंता क्यों. इस पर चिंता व्यक्त करनेवाले एक 'खास वर्ग' को लगता है कि पानी लाख प्रदूषित हो, खरीद कर पिया जा सकता है. भूमि कितना भी प्रदूषित हो, ऑर्गेनिक फूड खरीद कर खा ही सकते हैं. हवा का क्या करेंगे...सो वायू प्रदूषण की  मार्केटिंग पूरी दुनिया में जमकर हो रही है.

हाल के दिनों में यह बात उठी कि दिल्ली की हवा इसलिए प्रदूषित हो रही है कि यहां पंजाब के खेतों में जलाए जा रहे पराली का धुंआ आता है. नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल भी मानती है कि दिल्ली में वायू प्रदूषण की एक बड़ी वजह पंजाब हरियाणा के खोते में जलाई जा रही पराली है.

यह पिछले कई सालों से जलाई जाती रही है. लेकिन साल 2016 में नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल ने आदेश दिया कि इसे पूरी तरह बंद किया जाना चाहिए. 12 से 60 प्रतिशत तक प्रदूषण के लिए जिम्मेवार पराली के धुएं को माना जाता है.

एनजीटी ने दिसंबर 2015 में पंजाब और हरियाणा सरकार को आदेश दिया था कि वे खेतों में आग लगाने के चलन पर रोक लगाए. कोर्ट ने कहा था कि अगले दो साल में किसानों को सुविधाएं देकर पराली जलाने के चलन को बंद किया जाये. इसमें किसानों को पराली को खेत में मिलाने या उसे अलग करने वाले मशीन उपलब्ध कराये जाने की बात भी थी.

दो एकड़ से कम जमीन वाले किसानों को यह मुफ्त में देनी थी, वहीं 2 से 5 एकड़ जमीन वाले को 5000 तथा पांच से ज्यादा एकड़ जमीन वाले को 15000 रुपये में यह मशीन देनी था. लेकिन अदालत के इस फैसले को जमीन पर लागू नहीं किया जा सका है.

farmer

लाखों मिलियन टन पुआल हर साल केवल पंजाब और हरियाणा में जलाया जाता है. किसान खुद नहीं चाहते हैं कि वह जलाए. क्योंकि इससे उसके खेतों को ही नुकसान होता है. जिस मशीन से फसल काटी जाती है, वह काफी ऊपर से फसल को काटती है. अगर मशीन कटाई के बाद इसे दुबारा काटना पड़े तो फिर से पैसे खर्च होते हैं.

आग नहीं लगाने पर 4 हजार रुपए प्रति एकड़ खर्च करना होता है. जहां 100 रुपए लगाने पर 80 रुपए की आमदनी होती है. भला किसान यह खर्च कहां से सहन कर पाएगा.

पहले किसान पराली हाथ से काटा करते थे. लेकिन जब बड़ी मात्रा में खेती होने लगी तो मशीनों ने इसकी जगह ले ली. यह हाथ से काटने पर यह लगभग जमीन से काट दिया जाता है. हल से भी यह आसानी से निकाल लिया जा सकता है. क्योंकि बैल से अब खेती नहीं होती, इसलिए पराली जलाना मजबूरी बन गई है.

नाम ना छापने की शर्त पर एक किसान ने बताया कि खरीफ और रबी की फसल के बीच 20 दिन का समय होता है. इसी दौरान अगले फसल के लिए खेतों को तैयार करना होता है. किसानों के मुताबिक इसे गलाने के लिए पानी डालेंगे तब तक अगली फसल का टाइम चला जाएगा. यही वजह है कि पराली को जलाना पड़ता है. यह जानते हुए भी कि इससे उनका ही खेत खराब होता है.

संगठन बनाकर जला रहे हैं पराली

पंजाब में संगठन बनाकर किसान पराली जला रहे हैं. एक संगठन में लगभग 500 किसान होते हैं. सब मिलकर एक साथ निकलते हैं जलाने. पुलिस कुछ हद तक ही कंट्रोल कर पाती हैं.

पंजाब के खेतों का दौरा कर हाल ही में लौटे ग्रीनपीस के कार्यकर्ता अविनाश चंचल बताते हैं कि एक भी किसान पूरे इलाके में कैमरा के सामने आकर बात करने के लिए तैयार नहीं हुआ, बहुतों ने नाम बताने से भी इंकार कर दिया. ये दिखाता है कि किस तरह सरकार ने अपने ही किसानों को बिना किसी गलती के डर के कुंए में ढकेल दिया है. पूरे इलाके के किसान डर में जीने को मजबूर हैं.

पराली जलाने वाले किसान की चिंता क्यों नहीं   

सवाल यह उठता है कि जो धुंआ दिल्ली को इतना प्रदूषित करता है, वह पंजाब और हरियाणा को कितना प्रदूषित करता होगा. भला लोगों की नजर इस ओर क्यूं नहीं गई. जब दिल्ली को सांस लेने में परेशानी हुई तभी इस ओर ध्यान क्यों गया? उससे भी इतर ध्यान केवल इतना गया कि दिल्ली में प्रदूषण कम करना है, इसलिए पराली मत जलाओ. भला उस किसान की चिंता क्यों नहीं जिसे पराली जलाने पर मजबूर होना पड़ता है?

ग्रीन रिवॉल्यूशन के आने पर इस इलाके के लोगों को कहा गया कि धान उपजाओ, क्योंकि देश को धान की जरूरत थी. लेकिन दूसरे फसलों की बात करें कि आलू, गन्ना में न्यूनतम खरीद मूल्य नहीं मिल रहा है. इस वजह से यहां के किसानों को बहुत कम पैस मिलते हैं.

गेहूं और धान में न्यूनतम खरीद मूल्य मिल जाता है. यहां तक कि सरकार घर आकर फसल ले जाती है. एक किसान 30 लाख रुपए की मशीन कहां से खरीद पाएगा. किसान 1000 रुपए किराया देकर इसे लेते हैं. कुछ जगहों सरकार की तरफ से मशीन उपलब्ध कराई गई है, वह भी पूरे जिले में मात्र एक.

गुस्से में हैं किसान 

A farm worker looks for dried plants to remove in a paddy field on the outskirts of Ahmedabad, India

पराली जलाने का मसला 15 दिन का होता है. 15 दिन का धूंआ दिख जाता है. लेकिन साल भर जो एसी, थर्मल पावर और गाड़ियों से प्रदूषण फैलता है, उसे रोकने के लिए सरकार क्या कर रही है? वह दिल्ली में जो कर रही है, देशभर में उतनी ही तत्परता के कर रही है क्या? केरल में कोल बेल्ट के प्रदूषण पर चर्चा हो रही है क्या? झारखंड के कोलबेल्ट में हो रहे बेतहाशा प्रदूषण पर बात हो रही है क्या? जवाब है नहीं.

किसान यह मानते हैं कि इस धुंए से अस्थमा जैसी बीमारियों हो रही है. लेकिन अब वह इस मकड़जाल से कैसे निकलें, इसके बारे में कोई बात नहीं करता. उन्हें खुद भी समझ नहीं आता वह क्या करें. वह उसी वक्त जमीन की चिंता करें कि पड़ोसी के घर बन रहे करोड़ों रुपए के बिल्डिंग की.

पंजाब सरकार फंड न होने का दावा कर रही है. पंजाब के वित्त मंत्री मनप्रीत सिंह बादल ने मीडिया में बयान दिया है, ‘हमारे पास पैसे नहीं हैं. हमने तीन साल के लिए 2000 करोड़ प्रति साल के हिसाब से केन्द्र सरकार से मांग की है. भारत सरकार को इस संबंध में फैसला लेना है.

फिलहाल पंजाब सरकार खेत में आग लगाने वाले किसानों पर जुर्माना लगा रही है. मीडिया रिपोर्ट के अनुसार अब तक 500 किसानों पर जुर्माना लगाया गया है. इससे किसानों में डर का माहौल बन गया है.

दिल्ली को दिक्कत है, इसलिए समस्या दिख रही है 

किसानों ने बताया कि भूमिगत जल 500 मीटर नीचे तक चला गया है. यह बहुत ही खतरनाक स्तर पर पहुंच गया है. क्योंकि शायद ही कोई खेत हो जहां पानी पटाने के लिए मोटर ना लगाया गया हो, बिजली ना पहुंची हो. अगर यही हाल रहा तो आनेवाले समय में इन इलाकों में पानी की  स्थिति विदर्भ से भी खराब हो सकती है.

devendra sharma

कृषि विशेषज्ञ देवेंद्र शर्मा कहते हैं कि एक रिपोर्ट के मुताबिक देश में 10 प्रतिशत लोगों के पास कार है. उस कार से प्रदूषण पर किसी ने नहीं कहा कि कार चलाने वालों को सजा दीजिए. लेकिन किसानों को जेल में डाला जा रहा है, उनसे जुर्माना वसूला जा रहा है. समस्या केवल इसलिए है कि समस्या दिल्ली को हो रही है.

उन्होंने कहा कि पराली को लेकर एनजीटी का रवैया गलत है. ना तो वे समझने को तैयार हैं, ना ही कोई सही बात बतानेवाला है. एनजीटी का फैसला दिल्ली की समस्या को केंद्र में रखकर हो रहा है. आज गोवा में कोल बेल्ट का पता चल रहा है. कोई वहां की प्रदूषण पर बात नहीं कर रहा है.

पराली जलानेवाले किसान कई तरह के मशीनों का इस्तेमाल कर पहले ही मशीन तले दबा हुआ है. अब सरकार कह रही है कि उसे काटने के लिए मशीन खरीदो, उस पर सब्सिडी देंगे. जिस किसान की महीने की कमाई 3500 रुपए हो, वह पराली काटने में भला 5000 रुपया कहां से लगा पाएगा.

पराली जलाने की समस्या का साधारण समाधान है, यह कि मनरेगा के तहत क्रॉप कटिंग को लाया जाए. जो पैसा सब्सिडी देने पर खर्च किया जा रहा है, वह इधर लगाया जा सकता है. फायदा यह होगा कि फसल भी कट जाएंगे, मजदूरों को रोजगार भी मिल जाएगा. किसानों को पराली जलाने की नौबत नहीं आएगी. लेकिन सरकार ऐसा करने का सोच नहीं सकती. क्योंकि दिक्कत बुनियादी सोच में है.

0

अन्य बड़ी खबरें

वीडियो
KUMBH: IT's MORE THAN A MELA

क्रिकेट स्कोर्स और भी

Firstpost Hindi