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अनिवार्य मिलिट्री ट्रेनिंग दुनियाभर के विकसित देशों में रही है...हम क्यों घबरा रहे हैं?

हमें अनिवार्य मिलिट्री ट्रेनिंग से होने वाले फायदे और नुकसान दोनों का खयाल रखना होगा बजाए इसके कि हम एक बार में इसे खारिज कर दें या अपना लें.

Updated On: Jul 18, 2018 03:09 PM IST

Arun Tiwari Arun Tiwari
सीनियर वेब प्रॉड्यूसर, फ़र्स्टपोस्ट हिंदी

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अनिवार्य मिलिट्री ट्रेनिंग दुनियाभर के विकसित देशों में रही है...हम क्यों घबरा रहे हैं?

भारत में शायद कम ही लोगों को यह मालूम होगा कि द्वितीय विश्वयुद्ध के दौरान भारतीय सैनिक ( जो उस समय ब्रिटिश साम्राज्य के अंतर्गत आते थे ) दुनिया की सबसे बड़ी वॉलंटियर आर्मी के तौर पर काम कर चुके हैं. द्वितीय विश्वयुद्ध के समय हमारे सैनिकों ने दुनियाभर में अलग-अलग मोर्चों पर जंगें लड़ीं और लोगों की सेवाएं भी कीं. ये किसी भी भारतीय के लिए गौरव की बात हो सकती है.

मंगलवार को एक खबर आई कि भारत सरकार अब देश के युवाओं के लिए अनिवार्य मिलिट्री ट्रेनिंग का कार्यक्रम लाने जा रही है. इसमें हर साल दस लाख लड़के-लड़कियों को मिलिट्री ट्रेनिंग दी जाएगी. सरकार इस कदम का उद्देश्य 'अनुशासन' बता रही है. सरकार का मानना है कि इसके जरिए युवाओं को अनुशासित बनाया जाएगा. फिर सरकार की तरफ से इसका खंडन आ गया और कहा गया कि इस तरह का कार्यक्रम चलाने की कोई योजना नहीं है. सरकार ने इसका खंड भले ही कर दिया हो लेकिन अनिवार्य मिलिट्री ट्रेनिंग हमारे समाज के लिए कितनी बुरी है या अच्छी है इस पर हमें विचार तो करना ही होगा.

इससे पहले एनसीसी का मोटो भी 'एकता और अनुशासन' ही रहा है. देश में 90 के दशक या कह सकते हैं 21 वीं सदी के शुरुआती दशक में एनसीसी के लिए एक चार्म हुआ करता था. स्कूलों में एनसीसी की वर्दी पहने हुए लड़के थोड़े रुआब में या कह सकते हैं थोड़ा ज्यादा तन कर खड़े हुए करते थे. लेकिन जैसे-जैसे सरकारी स्कूलों की जगह प्राइवेट स्कूलों की तरफ लोगों का रुझान बढ़ता गया, एनसीसी भी अब गए दिनों की बात लगने लगी है. एनसीसी का 'सी' सर्टिफिकेट युवाओं के लिए गौरव की बात होती थी. लेकिन अब इसकी लोकप्रियता का अंदाजा इस बात से ही लगाया जा सकता है कि हाल ही में एनसीसी के ही एक कार्यक्रम के दौरान जब कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी ने सी सर्टिफिकेट के बारे में अनभिज्ञता जता दी थी!

एनसीसी और स्काउट गाइड्स अब जब बीते दिनों की बात लगने लगे हैं और जमाना फिजिकल ट्रेनिंग से ज्यादा तकनीकी गैजेट्स में डूब जाने का हो तो अनिवार्य मिलिट्री ट्रेनिंग के कॉन्सेप्ट का शुरुआती विरोध होना बेहद लाजिमी है. लेकिन इस बात को सिर्फ यह कहकर उड़ा दिया जाना गैर लाजिमी है कि केंद्र में सत्तारूढ़ बीजेपी ऐसा अपनी विचारधारा लागू करने के लिए करना चाहती है. क्या बीजेपी केंद्र की सत्ता पर दिग-दिगांतर तक कायम रहेगी? क्या राष्ट्रवाद सिर्फ भारतीय जनता पार्टी के हिस्से ही आ गया है?

ऐसा नहीं है. दरअसल भारत में अनिवार्य मिलिट्री ट्रेनिंग कभी भी नहीं रही और शायद यही वजह यहां के लोग किसी भी 'अनिवार्य' को अपने अधिकारों के अतिक्रमण के तौर पर देखते हैं. आप अपनी नजर जरा सी उठाएंगे तो पाएंगे कि जिन देशों के विकास का नाम लेकर आप आहें भरते रहे हैं उन देशों में अनिवार्य मिलिट्री ट्रेनिंग न जाने कब से लागू है. कई देशों में इसे खत्म भी किया जा चुका है. तकरीबन दुनिया के सभी बड़े विकसित देशों ने अनिवार्य मिलिट्री अपने चलाई है या कभी उनके यहां इसका प्रावधान रहा है. लेकिन इसे निजता के अतिक्रमण के तौर पर कभी नहीं देखा गया है.

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प्रतीकात्मक तस्वीर

दुनियाभर में जिन स्कैंडिविनियाई देशों ( स्वीडन, डेनमार्क, बेल्जियम, फिनलैंड ) के विकास की मिसालें दी जाती है तकरीबन सभी में अनिवार्य मिलिट्री ट्रेनिंग या तो है या कभी रही है. हां, ये भी कोई तथ्य नहीं हो सकता कि ये देश इसीलिए विकसित हो गए क्योंकि मिलिट्री ट्रेनिंग यहां लागू रही है. विकास के लिए जरूरी शिक्षा, स्वास्थ्य, औद्योगिकी, खेल, जनसंख्या नियंत्रण में भी इन देशों ने कमाल किया है. लेकिन यह तथ्य बताना सिर्फ इसलिए आवश्यक है हर निर्णय को निजता के अतिक्रमण के तौर पर न देखा जाए.

फायदे

जैसे-जैसे तकनीक की हमारे जीवन प्रधानता होती जा रही है आने वाले सालों में ये युवा पीढ़ी के लिए एक चैलेंज के रूप में होगा कि वो कैसे फिजिकल एक्सरसाइज में अपना समय दे पाए. शहरी जीवन में ये परेशानियां युवाओं के साथ आना शुरू भी हो चुकी हैं. टाइम मैनेजमेंज एक बहुत बड़ी समस्या है लेकिन ऐसी ही समस्या आप अपने परिवारों में किसी सेना के सदस्य के साथ नहीं देखते होंगे. वक्त का पाबंद होना उन्हें प्रॉपर ट्रेनिंग के जरिए बताया जाता है और यही कारण भी होता है सैनिक आम व्यक्ति की तुलना में ज्यादा फिट भी होते हैं.

हाईस्कूल-इंटर में पढ़ रहे किशोर अपना ज्यादातर समय कंप्यूटर, लैपटॉप और मोबाइल पर ही गुजार रहे हैं. युवावस्था के ऐसे समय में एक साल की मिलिट्री ट्रेनिंग का कोर्स उनके आगे के जीवन को अनुशासित रखने में बड़ा योगदान दे सकता है. समाज जैसे-जैसे आधुनिक हो रहा है सामाजिक और मनोवैज्ञानिक स्तर पर युवाओं के जूझने के खतरे भी ज्यादा बढ़ रहे हैं. अगर इस ट्रेनिंग कोर्स के जरिए युवाओं में अनुशासित रह सकने की आदत को जोड़ा जा सकेगा, तो एक मुल्क के तौर पर भारत के लिए ये बहुत बड़ी कामयाबी होगी. कहा जाता है स्वस्थ शरीर में स्वस्थ मन का वास होता है. तो अगर इस ट्रेनिंग कोर्स के जरिए हमारे देश की युवा पीढ़ी अगर स्वस्थ रहने के तरीके प्रशिक्षित लोगों से सीख सकेगी तो हर्ज ही क्या है!

साल दर साल लाखों की संख्या में जब ऐसी ट्रेनिंग लेकर बाहर निकलेंगे तो हम एक ज्यादा ताकतवर और मानसिक रूप से मजबूत जवान पीढ़ी देश को दे सकेंगे. ट्रेनिंग लेकर निकले युवा सामाजिक सौहार्द्र के लिए भी बेहतर काम कर सकेंगे क्योंकि सेनाओं में जिस तरीके से सैनिकों को ट्रेंड किया जाता है उसमें धार्मिक भेदभाव की कोई जगह नहीं होती. निश्चित रूप से ट्रेनिंग के लिए जो जगहें चिन्हित की जाएंगी उनमें मिलिट्री और पैरामिलिट्री के कैंपस भी होंगे. इन कैंपों के भीतर का माहौल युवाओं के जीवन पर हमेशा अपना असर रखेगा.

नुकसान

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इस प्रोग्राम पर कई वाजिब सवाल भी खड़े हो रहे हैं. जैसे क्या ये ट्रेनिंग सभी सैन्यबलों को दी जाने वाली ट्रेनिंग के समान होगा? 10वीं और 12वीं के बच्चों को क्यों इसके लिए चुना गया है. क्या यह डिफेंस ज्वाइन करने का शुरुआती स्तर है? अगर 10वीं के बाद कोई स्टूडेंट यह ट्रेनिंग प्रोग्राम ज्वाइन करता है तो क्या स्कूल छोड़ना होगा? क्या यह ट्रेनिंग प्रोग्राम पूरा करने के बाद डिफेंस में नौकरी मिलने की गारंटी होगी. क्या इसका यह मतलब है कि डिफेंस में एंट्री सिर्फ इस रास्ते से होगी और बाकी रास्ते बंद हो जाएंगे. इस तरह के ट्रेनिंग कार्यक्रम को क्यों नहीं स्कूल और कॉलेज में शामिल कर दिया जाए बिना इसे 'अनिवार्य' बनाए?

ये कई सारे सवाल भी इस ट्रेनिंग प्रोग्राम के साथ जुड़ रहे हैं. हालांकि सरकार की तरफ से अभी इसका खंडन कर दिया गया है लेकिन अगर भविष्य में इसे लागू भी करना होगा. सरकार को ये प्रोग्राम किसी जल्दबाजी में लागू करने की बजाय और विचार भी करना चाहिए जिससे एक ऐसा प्रोग्राम लाया जा सके जो लंबे समय के लिए कारगर हो. हमें मिलिट्री ट्रेनिंग से होने वाले फायदे और नुकसान दोनों का खयाल रखना होगा बजाए इसके कि हम एक बार में इसे खारिज कर दें या अपना लें.

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