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प्रद्युम्न के वकील का कॉलम: अज्ञानता से ज्यादा कुछ नहीं है संविधान बदल देने का बयान

संविधान बदलने को लेकर केंद्र सरकार के एक मंत्री का बयान अज्ञानतावश दिया गया बयान लगता है जो गंभीरता से ज्यादा हास्यास्पद प्रतीत होता है

Updated On: Jan 01, 2018 11:53 AM IST

Sushil K Tekriwal Sushil K Tekriwal

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प्रद्युम्न के वकील का कॉलम: अज्ञानता से ज्यादा कुछ नहीं है संविधान बदल देने का बयान

संविधान बदलने को लेकर केंद्र सरकार के एक मंत्री के बयान और फिर उस पर माफी मांगने की घटना ने संविधान की मूलता और मौलिकता पर सवालिया निशान लगाने की बजाए इसे और मजबूत किया है.

संविधान देश में कानून का शासन स्थापित रखने की वह सर्वोच्च समादेशिक दस्तावेजी व्यवस्था है जिसके तहत प्रत्येक नागरिकों की सक्षमता और समर्थता न सिर्फ सुनिश्चित की गई है बल्कि इनके लिए न्याय, स्वतंत्रता और समानता की सुरक्षा और संरक्षा भी तय की गई है. वास्तव में संविधान एक ऐसा मौलिक दस्तावेज है जो देश की सर्वोच्च विधि है. संविधान एक ऐसा दस्तावेज भी है जो एक शासन व्यवस्था के विभिन्न संस्थानों-– विधायिका (Legislature), कार्यपालिका (Executive) तथा न्यायपालिका (Judiciary) के बीच परस्पर संबंधों की व्याख्या करता है तथा देश के नागरिकों के इन संस्थानों से संबंधों पर भी चर्चा करता है.

15 अगस्‍त 1947 को आजादी की घोषणा होने के बाद भी भारत में 26 जनवरी 1950 से पहले तक अंग्रेजों द्वारा बनाया गया संविधान ही लागू था और 200 सालों की लंबी गुलामी के बाद इसी दिन भारत वास्‍तव में पूर्ण रूप से आजाद हुआ था क्‍योंकि इसी दिन देश में भारत का अपना स्वलिखित संविधान लागू हुआ था जो कि एक ऐसा संविधान था, जिसे भारत के लोगों द्वारा, भारत के लोगों पर न्‍यायपूर्ण तरीके से शासन करते हुए देश का विकास करने के लिए ही बनाया गया था और इसीलिए इसे गणतंत्र (जनता का शासन) दिवस के नाम से जाना जाता है.

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भारतीय संविधान में वर्तमान समय में 465 अनुच्छेद तथा 12 अनुसूचियां हैं और ये 22 भागों में विभाजित है. लेकिन जब संविधान को अंगीकार किया गया तब इसके मूल स्वरूप में कुल 395 अनुच्छेद तथा 8 अनुसूचियां थीं. समय दर समय संविधान में कई संशोधन किए गए. पिछले 67 सालों में इसमें 70 अतिरिक्त अनुच्छेदों के साथ साथ 4 अनुसूचियां भी जोड़ी गईं.

प्रस्तावना है संविधान की आत्मा

इसके बावजूद भारतीय संविधान की प्रस्तावना इसकी मूल आत्मा है. संविधान की प्रस्तावना का वजूद भारत को एक संप्रभु, समाजवादी, धर्मनिरपेक्ष और लोकतांत्रिक गणराज्य बनाता है. संविधान की प्रस्तावना को मौलिक ढांचा माना गया है.

संविधान के ‘मौलिक ढांचे’ के सिद्धांत का जन्म संपत्ति के अधिकार को लेकर सर्वोच्च न्यायालय और संसद के बीच चले टकराव की पृष्ठभूमि में सामने आया. 24 अप्रैल 1973 को केशवानंद भारती बनाम केरल राज्य के वाद में सर्वोच्च न्यायालय के 13 जजों की संवैधानिक खंडपीठ ने 7:6 के बहुमत से निर्णय दिया कि संविधान के अनुच्छेद 368 के तहत संसद संविधान के किसी भी भाग में संशोधन कर सकती है लेकिन यह संशोधन ऐसा नहीं होना चाहिए कि यह संविधान के मौलिक ढांचे या मौलिक संरचना को ही बदल दे और संविधान की आत्मा नष्ट हो जाए.

Parliament

केशवानंद केस में सर्वोच्च न्यायालय का फैसला और इसके द्वारा ‘मौलिक ढांचा’ का सिद्धांत का प्रतिपादन दरअसल संसद की अनियंत्रित शक्ति पर एक अंकुश मात्र है जो उस समय की तात्कालीन परिस्थितियों का परिणाम था. संसद के द्वारा संविधान संशोधन की शक्ति पर मौलिक ढांचे का निर्बंधन लगाने के पीछे यह भय था कि यदि संसद को संविधान में संशोधन की अनियंत्रित शक्ति दे दी जाएगी तो एक तानाशाही शासन की स्थापना हो सकती है. यह भय 1975 के आपातकाल और उसके दौरान घटी घटनाओं से यकीन में भी बदलता दिखाई दिया.

बाद में 1975 में राजनारायण के केस में इलाहाबाद उच्च न्यायालय का निर्णय आने के बाद जिस तरह से इंदिरा गांधी ने इसे सर्वोच्च न्यायालय में चुनौती दी और सर्वोच्च न्यायालय के अधीन मामला रहने के दौरान ही संविधान में 39वां संशोधन कर राष्ट्रपति, उपराष्ट्रपति, प्रधानमंत्री और लोकसभाध्यक्ष के चुनाव को न्यायिक समीक्षा की परिधि से बाहर कर अपने पद को बचाने की कोशिश की, उसने 'मौलिक ढांचे' के सिद्धांत के तहत सर्वोच्च न्यायालय को एक बार फिर संसद के दो-तिहाई बहुमत की असीमित शक्ति पर सोचने के लिए विवश कर दिया.

सुप्रीम कोर्ट को किसी भी संशोधन पर समीक्षा का हक

इसी कारण मिनर्वा मिल्स केस में मौलिक ढांचे की तरफदारी के तहत सर्वोच्च न्याया ने फिर से एक ऐतिहासिक फैसला दिया और न्यायालय की संविधान समीक्षा (judicial review) की शक्ति और संशोधन की नियंत्रित शक्ति (limited amending power) को संविधान का मौलिक ढांचा बतलाया जिसमें संशोधन नहीं किया जा सकता. इस प्रकार संविधान में संशोधन करने की प्रक्रिया और इसके तहत की गई किसी भी पहल जिसमें संविधान की आत्मा और इसके मौलिक ढांचे को प्रभावित किया जाता है तो इसके संवैधानिक समीक्षा का सर्वोच्च न्यायालय को पूरा हक है. संसद के इस तरह के विकृत प्रयासों और कृत्यों को उलटने का सर्वाधिकार सर्वोच्च न्यायालय के पास सुरक्षित है.

Supreme Court of India

इसी तरह सर्वोच्च न्यायालय ने एस.आर. बोम्मई केस में सेक्युलरिज्म को संविधान का मौलिक ढांचा बताया. एक अन्य महत्वपूर्ण मुकदमे में सर्वोच्च न्यायालय ने समाजवाद को भी संविधान का मौलिक ढांचा माना है.

इसके बाद 2007 में न्यायाधीश वाई.के. सब्बरवाल के नेतृत्व में 9 न्यायाधीशों की संवैधानिक खंडपीठ ने निर्णय देते हुए यह व्यवस्था दी है कि 24 अप्रैल 1973 के बाद हुए किसी भी संविधान संशोधन का चाहे वो नौवीं अनुसूची में ही क्यों न हो, सर्वोच्च न्यायालय पुनर्विलोकन कर सकता है. इस तरह से मौलिक ढांचे के प्रावधान के द्वारा सर्वोच्च न्यायालय ने अपनी पुनर्विलोकन की शक्ति को काफी विस्तृत कर लिया है.

केशवानंद भारती केस और इसके बाद कई महत्वपूर्ण मुकदमों में मौलिक ढांचे के निर्णय के द्वारा सर्वोच्च न्यायालय ने भविष्य के लिए भारत के एक नवीन संविधान की रचना की है. दसअसल मौलिक ढांचे के प्रतिपादन के पीछे मंशा यह है कि सरकार की तानाशाही पर अंकुश लगाने का प्रयास हो. अत: निश्चित रूप से यह लोकतांत्रिक व्यवस्था के साथ-साथ जनता के हित में ही दिया गया एक महत्वपूर्ण निर्णय प्रतीत होता है.

संविधान बदलने और इसके मौलिक ढांचे को तोड़ने-मरोड़ने को लेकर किसी भी तरह के विवादास्पद बयान से पहले सर्वोच्च न्यायालय द्वारा की गई संवैधानिक-व्यवस्था की व्याख्या को जानना जरूरी है. संविधान के मुख्य संरक्षक के रूप में सर्वोच्च न्यायालय की भूमिका को भी कानूनसंगत रूप में समझने की जरूरत है.

निश्चित रूप से, संविधान बदलने को लेकर केंद्र सरकार के एक मंत्री का बयान अज्ञानतावश दिया गया बयान लगता है जो गंभीरता से ज्यादा हास्यास्पद प्रतीत होता है. कानून निर्माताओं को संविधान पर इस तरह की टिप्पणियों से बचना चाहिए और कुछ भी कहने से पहले सर्वोच्च न्यायालय द्वारा इस संबंध में दिए गए कई फैसलों का कम से कम अध्ययन जरूर कर लेना चाहिए वरना उनकी गरिमा हाशिए पर होगी.

(लेखक सुप्रीम कोर्ट के वकील हैं और रायन स्कूल मामले में प्रद्युम्न पक्ष से मुकदमा लड़ रहे हैं.)

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