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यूपी: दिव्यांग ने खुद ठेला चलाकर अपने पिता के शव को ढोया

इस मामले की जानकारी मिलने के बाद बाराबंकी के डीएम अखिलेश तिवारी ने घटना की जांच के आदेश दिए हैं

FP Staff Updated On: Mar 27, 2018 03:25 PM IST

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यूपी: दिव्यांग ने खुद ठेला चलाकर अपने पिता के शव को ढोया

गरीबी और सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र के पास शववाहन न होने की वजह से यूपी के बाराबंकी जिले के त्रिवेणीगंज के एक दिव्यांग को अपने पिता का शव ठेले पर ले जाना पड़ा. राजकुमार अपनी बहन मंजू के साथ अपने बीमार मंशाराम को त्रिवेणीगंज के सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र में किसी तरह इलाज करवाने के लिए ले गया था.

अस्पताल पहुंचने पर डॉक्टरों ने मंशाराम को मृत घोषित कर दिया और राजकुमार से अपने पिता के शव को वापस ले जाने को कहा. राजकुमार और मंजू के पास पैसे नहीं थे, उन्होंने पिता के शव को प्राइवेट गाड़ी से वापस ले जाने के लिए कुछ पैसों का इंतजाम करने की भी कोशिश की. कुछ घंटों के बाद राजकुमार ने किसी तरह अपने पिता के शव को ले जाने के लिए एक हाथ से चलने वाले ठेले का इंतजाम किया.

स्थानीय लोगों की मदद से राजकुमार ने अपने पिता का अंतिम संस्कार किया. इस मामले की जानकारी मिलने के बाद बाराबंकी के डीएम अखिलेश तिवारी ने घटना की जांच के आदेश दिए हैं और रेवेन्यू डिपार्टमेंट की टीम को तथ्यों की जांच करने को कहा है.

सबने झाड़ा पल्ला

न्यूज 18 से बात करते हुए सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र के डॉक्टर प्रदीप कुमार ने कहा कि मरीज की मौत रास्ते में ही हो गई थी और सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र के पास मृतक के शव को भेजने का को इंतजाम नहीं था. गांव के प्रधान के प्रतिनिधि सत्यदेव साहू ने कहा कि प्रधान बाहर गए हुए थे इस वजह से मदद करने नहीं पहुंच पाए.

सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र के सुपरिडेंटेंट मुकुल पांडेय ने कहा कि मैं डीएम के साथ मीटिंग में था, अगर मैं वहां मौजूद होता तो शव को वापस भेजने का कोई न कोई इंतजाम जरूर कर देता, अगर जेब से पैसे खर्च करने की जरूरत होती तो वो भी कर देता.

चीफ मेडिकल अफसर रामचंद्र ने कहा कि किसी ने 108 नबंर के इमरजेंसी सर्विस पर फोन नहीं किया, अगर किया होता तो एंबुलेंस से रोगी को अस्पताल लाया जा सकता था. एंबुलेंस का प्रयोग शव को भेजने में नहीं किया जाता है. उन्होंने यह भी कहा कि जिले में दो शव वाहन हैं और यह सुविधा सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र के लिए उपलब्ध नहीं है.

(न्यूज18 के लिए काजी अहमद फराज की रिपोर्ट)

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