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गरीबों को सबसे ज्यादा भुगतना पड़ रहा है प्रदूषण का खामियाजा

जिन लोगों के सिर पर छत नहीं है, उन गरीबों को बेहद प्रदूषित हवा में ही सांस लेना पड़ रहा है.

Updated On: Dec 02, 2018 05:15 PM IST

Bhasha

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गरीबों को सबसे ज्यादा भुगतना पड़ रहा है प्रदूषण का खामियाजा

भारत में हवा की नुकसानदेह गुणवत्ता का सबसे ज्यादा खामियाजा गरीबों को भुगतना पड़ रहा है. अमीर लोग वायु प्रदूषण से बचाव के लिए 'एयर प्यूरीफायर' (हवा को शुद्ध बनाने वाली मशीन) का इस्तेमाल कर रहे हैं जबकि मध्यम वर्ग के लोग नाक-मुंह को ढकने के लिए 'मास्क' लगा रहे हैं. लेकिन जिन लोगों के सिर पर छत नहीं है, उन गरीबों को बेहद प्रदूषित हवा में ही सांस लेना पड़ रहा है.

वायु गुणवत्ता सूचकांक (एक्यूआई) 'बहुत खराब' से लेकर 'बेहद गंभीर' और बेहतर दिनों में भी 'खराब' होने के कारण दिल्ली-एनसीआर क्षेत्र और भारत के अन्य हिस्सों में जहरीली हवा और धुंधला आसमान अमीर और गरीब के बीच एक और गहरी खाई पैदा करता दिख रहा है. सेंटर फॉर साइंस एंड एन्वायरॉनमेंट (सीएसई) की प्रमुख और सुप्रीम कोर्ट के जरिए गठित पर्यावरण प्रदूषण रोकथाम एवं नियंत्रण प्राधिकरण (ईपीसीए) की सदस्य सुनीता नारायण ने कहा, 'प्रदूषण का स्तर जब भी बढ़ता है, वर्ग पूर्वाग्रह स्पष्ट हो जाता है.'

नारायण ने बताया, 'हम प्रदूषण से तभी लड़ सकते हैं जब अधिकारी अमीर और गरीब दोनों के बारे में सोचें और पर्यावरण संरक्षण की लड़ाई में दोनों हाथ मिलाएं, वरना अमीर तो डीजल से चलने वाली गाड़ियों में घूम सकते हैं, अपने बचाव के लिए प्यूरीफायर इस्तेमाल कर सकते हैं, लेकिन गरीबों को इसका खामियाजा भुगतना पड़ता है. उनके पास तो इलाज के लिए भी पैसे नहीं होते.'

इलाज में पैसे खर्च

रिक्शा चलाने वालों और निर्माण कार्य में लगे श्रमिकों पर इसका सबसे ज्यादा असर पड़ा है. रिक्शा चलाने की खातिर हाल ही में बिहार के दरभंगा जिले से दिल्ली आए 19 साल के श्याम इस बात का सबूत हैं कि प्रदूषण सभी को प्रभावित करता है, लेकिन कुछ लोगों को बहुत अधिक प्रभावित करता है. श्याम ने बताया, 'मैं कंप्यूटर कोर्स करने के लिए पैसे बचा रहा हूं, लेकिन मेरी तबीयत पिछले एक महीने से खराब है.' उसने बताया कि श्वसन-तंत्र में संक्रमण के कारण इलाज कराने में ही उसकी बचत के सारे पैसे खर्च हो गए. श्याम ने कहा, 'हम अपनी सवारियों को महंगा मास्क लगाए देखते हैं, लेकिन हम उसे चाहकर भी नहीं खरीद सकते.' उसने कहा कि आजकल उसे रिक्शा चलाते वक्त अपनी छाती पर जोर महसूस होता है.

New Delhi: Delhi Congress workers wear masks during a protest against Delhi Chief Minister Arvind Kejriwal over the recent air-pollution, at Rajiv Chowk Metro Station in New Delhi on Thursday, June 14, 2018. A thick blanket of haze continued to envelop Delhi and parts of the National Capital Region (NCR) on Thursday with the air quality remaining in 'poor' to 'hazardous' category. (PTI Photo/Arun Sharma) (PTI6_14_2018_000176B) *** Local Caption ***

करीब 30 साल पहले राउरकेला से दिल्ली आए रूपक (49) की भी ऐसी ही स्थिति है. दिल्ली की खराब हवा में सांस लेने के कारण उसकी सेहत को भी काफी नुकसान पहुंचा है. रूपक ने बताया कि सामान्य दिनों में वह रिक्शा काफी तेजी से चलाता है, लेकिन ठंड के दिनों में प्रदूषण बढ़ जाने के कारण उसकी रफ्तार में काफी कमी आ जाती है. उसने कहा, 'यदि मैं तेज रिक्शा चलाता हूं तो सांस लेने में तकलीफ होती है. आंखों में जलन होती है. सामान्य दिनों में मैं हर रोज 500 रुपए कमा लेता हूं. लेकिन जाड़े के दिनों में 300-350 रुपए प्रतिदिन ही कमा पाता हूं.'

काम हो जाता है बंद

एक अनुमान के मुताबिक, दिल्ली की सड़कों पर करीब सात लाख साइकल रिक्शा चलती हैं. पिछले 15 साल से दिल्ली में कई निर्माण स्थलों पर काम कर चुकी राधा (35) मजाकिया लहजे में कहती है कि इस शहर को बनाने में उसका भी योगदान है. उसने कहा, 'किसी-किसी दिन मैं 600 रुपए तक कमा लेती हूं. शहर में प्रदूषण जब-जब बढ़ता है, सबसे पहले हमारा ही काम बंद होता है. इस साल नवंबर में हमें 12 दिन काम नहीं करने दिया गया, जिससे खर्च चलाना मुश्किल हो गया.'

पटपड़गंज मोहल्ला क्लीनिक के डॉक्टर शाहिद खान ने बताया कि प्रदूषण का स्तर बढ़ने पर कई लोग सांस लेने में तकलीफ और आंखों में जलन होने की शिकायत लेकर आते हैं. खान ने कहा, 'खासकर ऐसे निर्माण कामगारों, रिक्शा चलाने वालों और फेरीवालों की संख्या बढ़ रही है जिन्हें विषैली हवा का सामना करने के कारण समस्याएं हो रही हैं.' सफदरजंग अस्पताल के डॉक्टर एस. चक्रवर्ती ने बताया कि ज्यादा समय तक खराब हवा में सांस लेने के कारण क्रोनिक ब्रोंकाइटिस, दमा, श्वसन-तंत्र में संक्रमण और क्रोनिक ऑब्सट्रक्टिव पल्मोनरी डिजीज (सीओपीडी) जैसे रोगों का सामना करना पड़ता है.

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