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दिल्ली-एनसीआर की हवा फिर हुई जानलेवा और कितने सालों तक दम घुटेगा?

इस मौसम में पहले से ही लोग डेंगू-मलेरिया और चिकनगुनिया से परेशान रहते हैं ऊपर से अब प्रदूषण ने भी रुलाना शुरू कर दिया है.

Updated On: Oct 29, 2018 08:32 PM IST

Ravishankar Singh Ravishankar Singh

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दिल्ली-एनसीआर की हवा फिर हुई जानलेवा और कितने सालों तक दम घुटेगा?
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दिल्ली-एनसीआर के लोगों को पिछले कुछ सालों से कई मोर्चों पर लड़ाई लड़नी पड़ रही हैं. घर से निकलते ही लोगों का परेशानियों से सामना शुरू हो जाता है. इस मौसम में पहले से ही लोग डेंगू-मलेरिया और चिकनगुनिया से परेशान रहते हैं ऊपर से अब प्रदूषण ने भी रुलाना शुरू कर दिया है. दिल्ली के आनंद विहार, पंजाबी बाग, आरके पुरम और ईस्ट दिल्ली में रहने वाले लोगों का तो बहुत बुरा हाल है. सरकार और कोर्ट की तमाम कोशिशों के बावजूद प्रदूषण के स्तर में कोई कमी नहीं आ रही है. प्रदूषण की वजह से स्कूल, कॉलेज और दफ्तरों को बंद करने की नौबत आ गई है. मौसम विभाग का कहना है कि अगले तीन-चार दिनों में प्रदूषण का स्तर और बढ़ सकता है.

दिल्ली के बाबा खड़ग सिंह मार्ग पर रह रहे एक वरिष्ठ अधिकारी का परिवार पिछले कुछ दिनों से काफी परेशान चल रहा है. परिवार की परेशानी का कारण है दिल्ली में धुंध. अधिकारी का परिवार पिछले साल ही बाबा खड़ग सिंह मार्ग पर शिफ्ट हुआ है. बड़े ही दुखी मन से दंपत्ति फ़र्स्टपोस्ट हिंदी से बात करते हुए कहते हैं, सोचा था कि 4-5 साल बच्चे की पढ़ाई को लेकर दिल्ली में ही रहें, बुजुर्ग माता-पिता को भी ठंड के मौसम में अपने साथ ही रखें. पर, अब लगता है कि दिल्ली रहने लायक जगह नहीं बची है. नौकरी ऐसी है कि छोड़ कर कर जा भी नहीं सकते.

ये अकेले ऐसे अधिकारी नहीं है, जिन्हें दिल्ली में काम करने का मजा प्रदूषण ने फीका कर दिया है. इनके जैसे कई ऐसे अधिकारी हैं, जो दिल्ली को रहने लायक जगह नहीं मानते पर फिर भी दिल्ली में रहे हैं.  इनमें से कुछ अधिकारियों ने तो परिवार के सेहत की चिंता को लेकर या तो दिल्ली छोड़ दिया है या फिर बचने के लिए घर पर कुछ ठोस उपाय कर लिया है. क्योंकि उनके पास पैसा और पावर है. पर आम लोगों के लिए कोई फिक्रमंद नहीं है.

प्रतीकात्मक तस्वीर

प्रतीकात्मक तस्वीर

सवाल है इसका जिम्मेदार कौन है? आज के इस माहौल में हम जिम्मदारी की बात अगर किसी से पूछते हैं तो आम लोगों पर इसका ठीकरा फोड़ दिया जाता है. दिल्ली के सबसे पॉश इलाकों में से एक बाबा खड़ग सिंह रोड, पंडारा रोड और लुटियन जोन में रहनेवाले लोग अगर इस तरह की बात कर रहे हैं तो आम दिल्लीवालों का क्या हाल हो रहा होगा?

बता दें कि धुंध की वजह से लोगों को सांस की बीमारी, आंख से पानी निकलना, दिल का दौरा और फेफेड़े की बीमारी हो सकती है. प्रदूषण के स्तर को कम करने के बजाय केंद्र और दिल्ली सरकार पिछले एक-दो सालों से एक-दूसरे पर आरोप मढ़ने में लगे हुए हैं. नेशनल ग्रीन ट्रब्यूनल(एनजीटी), केंद्रीय प्रदूषण कंट्रोल बोर्ड (सीपीसीबी) की केंद्र और दिल्ली सरकार की फटकार का भी कोई असर नहीं दिख रहा है.

पिछले साल ईस्टर्न पेरिफेरल एक्सप्रेसवे के चालू होने पर केंद्र सरकार ने कहा था कि इस एक्सप्रेसवे के चालू होने के बाद दिल्ली में 40 प्रतिशत बाहरी वाहनों का बोझ कम जाएगा, जिससे प्रदूषण में भारी गिरावट आएगी. लेकिन, एक साल बाद आज भी दिल्ली-एनसीआर में पिछले साल वाली ही स्थिति पैदा हो गई है. केंद्र सरकार की तरफ से बड़े-बड़े दावे जो किए गए थे वह दावे टांय-टांय फिस्स साबित हुए हैं. केंद्र सरकार ने पिछले साल एक सप्ताह की मॉनिटरिंग करने के बाद कहा था कि ईस्टर्न पेरिफेरल एक्सप्रेसवे के चालू हो जाने से हवा की गुणवत्ता में काफी सुधार आ गया है, लेकिन हकीकत में ऐसा कुछ नहीं दिखा.

प्रदूषण के स्तर में लगातार बढ़ोतरी पर पर्यावरण के जानकारों का नजरिया भी अलग-अलग है. पर्यावरण के कुछ जानकार मानते हैं कि इस समय हवा की रफ्तार कम और बारिश नहीं होने के कारण पीएम- 2.5 और पीएम- 10 में बढ़ोतरी हुई है.

पिछले साल भी नवंबर और दिसंबर महीने में वायु की गुणवत्ता सूचकांक लगातार 400 के आसपास रहा था. पिछले कुछ सालों से अक्टूबर से लेकर दिसंबर महीने तक दिल्ली में प्रदूषण के कारण आपातकाल की स्थिति पैदा हो जाती है. इन दो-तीन महीनों में लोगों का बुरा हाल हो जाता है. इस साल भी पिछले कुछ दिनों से दिल्ली में एयर क्वालिटी इंडेक्स का लेवल 400 के पार रह रहा है.

दिल्ली में लगातार बढ़ती आबादी और गाड़ियों की बढ़ती संख्या ने भी ट्रैफिक जाम की समस्या को और बढ़ा दिया है. हाल फिलहाल में इससे निजात पाना बेहद मुश्किल लग रहा है. एनजीटी, केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड, दिल्ली सरकार और केंद्र सरकार के पर्यावरण मंत्रालय के लाख प्रयास के बावजूद कुछ नतीजा नहीं दिख रहा है.

दिल्ली में बढ़ते प्रदूषण की सबसे बड़ी वजहों में से एक है ट्रैफिक और ट्रैफिक जाम. देश भर की गाड़ियां जो हरियाणा, पंजाब, जम्मू-कश्मीर, हिमाचल, उत्तर प्रदेश, राजस्थान की ओर आती-जाती रही हैं उनसे अब दिल्ली बची रह रही है, इसके बावजूद दिल्ली में प्रदूषण का स्तर रिकॉर्ड तोड़ रहा है. पहले कहा जाता था कि बाहर की गाड़ियां दिल्ली में प्रवेश करती हैं इसलिए प्रदूषण का स्तर बढ़ जाता है. लेकिन, पेरिफेरल एक्सप्रेसवे के जरिए ये गाड़ियां अब दिल्ली को बख्शते हुए बाहर निकल रही हैं.

ऐसा अनुमान लगाया जा रहा था कि ईस्टर्न पेरिफेरल एक्सप्रेसवे के शुरू होने से दिल्ली में 40 फीसदी ट्रैफिक जाम कम हो जाएंगे. साथ ही दिल्ली-एनसीआर में प्रदूषण के स्तर में भारी गिरावट आएगी, लेकिन ऐसा कुछ नहीं दिखाई नहीं दे रहा है. वहीं दिल्ली-एनसीआर की आबादी पिछले 20 वर्षों में लगभग 50 फीसदी की बढ़ी है. वहीं वाहनों की संख्या में भी लगभग 180 प्रतिशत की तेजी आई है. सड़कों के चौड़ीकरण की बात करें तो यह महज 15 से 20 प्रतिशत ही हो पाई है. भारत जैसे देशों में लगभग हर साल लाखों लोगों की मौत प्रदूषण के कारण होती है.

पर्यावरण पर काम करने वाली कई संस्थाओं और अनुसंधानकर्ताओं का भी मानना है कि ताप विद्युत संयंत्रों से उत्सर्जन में कटौती और घरों में ठोस ईंधन के इस्तेमाल से वायु प्रदूषण में और कमी लाई जा सकती है. पिछले साल ही अमेरिका की लुसियाना स्टेट यूनिवर्सिटी (एलएसयू) की रिपोर्ट में ऐसे 13 तरीकों के बारे में बताया गया है जिन्हें अमल में लाकर भारत में वायु प्रदूषण की समस्या को 40% तक घटाया जा सकता है. इस रिपोर्ट में दावा किया गया है कि इन तरीकों को अगर इस्तेमाल में लाया जाए तो दिल्ली समेत पूरे उत्तर भारत के पीएम 2.5 स्तर को 50 से 60 फीसदी तक कम किया जा सकता है.

इस रिपोर्ट में प्रदूषण के विभिन्न कारणों से निपटने के लिये बनी नीतियों का विश्लेषण किया गया है जिसमें थर्मल पावर प्लांट (चालू, निर्माणाधीन और नए पावर प्लांट), मैन्यूफैक्चरिंग उद्योग, ईंट भट्ठी, घरों में इस्तेमाल होने वाले ठोस ईंधन, परिवहन, पराली को जलाना, कचरा जलाना, भवन-निर्माण और डीजल जनरेटर का इस्तेमाल जैसी बातें शामिल हैं.

पर्यावरण पर काम करने वाली कई संस्थाओं मानना है कि हवा की गुणवत्ता भारत में एक विकराल समस्या बनती जा रही है. भारत के कई शहरों में प्रदूषण का स्तर काफी खतरनाक स्तर पर पहुंच गया है. दिल्ली के अंदर भी इतनी गाड़ियां हो गई हैं, जिससे प्रदूषण फैल रहा है. भारत में पर्यावरण को लेकर सरकार के पास विस्तृत और व्यावहारिक नीतियों का अभाव है. पर्यावरण मंत्रालय को चाहिए कि पर्यावरण को राष्ट्रीय कार्ययोजना में शामिल करे और पावर प्लांट के लिए अधिसूचित उत्सर्जन मानकों का कठोरता से पालन करे. साथ ही अधिक प्रदूषण फैलाने वाले उद्योगों पर कठोर मानकों को लागू करके प्रदूषण नियंत्रित करे.

लेकिन, कुछ पर्यावरणविदों का मानना है कि पिछले कुछ सालों से प्रदूषण को लेकर सरकारें और आम जनता का रवैये में भी काफी बदलाव नजर आया है. पहले देश की सरकारें और खासकर सरकारी अधिकारी प्रदूषण को कोई समस्या ही नहीं मानते थे, लेकिन पिछले साल अप्रैल महीने में पर्यावरण मंत्रालय ने पूरे देश में नेशनल क्लीनर प्लान लागू किया था.

पर्यावरण मंत्रालय ने शायद पहली बार पूरे देश में प्रदूषण के स्तर को कम करने की दिशा में आगे बढ़ी है. वायु प्रदूषण दिल्ली-एनसीआर की समस्या नहीं है, बल्कि यह पूरे देश के लिए समस्या बनती जा रही है. केंद्र सरकार ने इच्छाशक्ति जरूर दिखाई है, लेकिन यह भविष्य के लिए कितनी कारगर है और असरदायक है उस पर अब भी सवाल खड़े किए जा रहे हैं.

अगर हम बात सिर्फ दिल्ली की करें तो विश्व स्वास्थ्य संगठन(डब्ल्यूएचओ) ने दिल्ली को विश्व का चौथा सर्वाधिक प्रदूषित शहर कहा है. दुनिया के 20 सबसे प्रदूषित शहरों में से 14 शहर भारत के शामिल किए गए. दिल्ली में आबादी और प्रदूषण का स्तर साथ-साथ बढ़ता जा रहा है. पिछले कुछ सालों में दिल्ली में प्रदूषण को लेकर स्थाई समाधान की दिशा में कोई ठोस कदम नहीं उठाए गए हैं. जो कदम उठाए भी गए हैं वह सिर्फ सुप्रीम कोर्ट और एनजीटी को दिखाने मात्र के लिए किया गया है.

पर्यावरण पर काम करने वाली कुछ संस्थाओं का साफ कहना है कि दिल्ली में प्रदूषण को लेकर दिल्ली सरकार और केंद्र सरकार के बीच कोई तालमेल नहीं है. समस्या की जड़ तक कोई भी जाने से बचता है. हरियाली की कीमत पर पूरे दिल्ली में कंस्ट्रक्शन, औद्योगिकीकरण और मेट्रो का निर्माण थम नहीं रहा है.

Supreme Court

सुप्रीम कोर्ट ने दिल्ली-एनसीआर मे हवा की गुणवत्ता में सुधार के लिए साल 1990 में पर्यावरण प्रदूषण नियंत्रण प्राधिकरण(ईपीसीए) का गठन किया था. वरिष्ठ आईएएस अधिकारी भूरेलाल यादव को इसका अध्यक्ष भी बनाया गया था. ईपीसीए के गठन के बाद से ही दिल्ली में सार्वजनिक परिवहन के लिए सीएनजी, दिल्ली-एनसीआर में एयर मॉनिटरिंग स्टेशन और ग्रेडड रिस्पांस एक्शन प्लान सहित कई कदम उठाए गए. इसके बावजूद दिल्ली में प्रदूषण के स्तर में लगातार बढ़ोतरी होती रही.

ऐसे में लोगों को इस साल एक बार फिर से उम्मीद जगने लगी है कि पर्यावरण मंत्रालय, एनजीटी और पर्यावरण पर काम करने वाली कई संगठनों के प्रयास शायद कुछ रंग लाएं.

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