S M L

प्रदूषण को लेकर अगर अब नहीं जागे, तो बहुत देर हो जाएगी

जहरीली हवा वाले दुनिया के टॉप 15 शहरों में लगातार भारतीय शहरों का जिक्र आ रहा है, लिहाजा इस सिलसिले में खतरे की घंटी काफी पहले बज जानी चाहिए थी

Updated On: May 02, 2018 05:30 PM IST

Sandipan Sharma Sandipan Sharma

0
प्रदूषण को लेकर अगर अब नहीं जागे, तो बहुत देर हो जाएगी

एयर पॉल्यूशन पर विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ) के हालिया आंकड़े इस बात को साबित करते हैं कि दुनियाभर के बाकी देशों के मुकाबले भारत में समस्या काफी ज्यादा गंभीर और चिंताजनक है. भारत के 14 शहरों के लोग दुनिया की सबसे जहरीली हवा में सांस ले रहे हैं. बहरहाल, ऐसा लगता है कि इसके बावजूद लोग अपने त्रासदीपूर्ण भविष्य को लेकर पूरी से तरह से बेखबर हैं. जिस तरह से मुहावरे में धीरे-धीरे उबलते हुए मेंढक के इस बार में पूरी तरह नावाकिफ होने की बात कही जाती है, प्रदूषण की विकराल समस्या को लेकर हम कुछ ऐसी ही हालत में पहुंच गए हैं.

दुनिया के 15 सबसे प्रदूषित शहरों में 14 भारत के

विश्व स्वास्थ्य संगठन के आंकड़े सावधान करने वाले हैं. दुनिया के 15 सबसे प्रदूषित शहरों में 14 शहर हमारे मुल्क के हैं. प्रदूषण के ये आंकड़े पीएम 2.5 संबंधी मानक के आधार पर जारी किए गए हैं. यह जहरीला तत्व (पीएम 2.5) हमारे सांस लेने के सिस्टम में गहरे तक बैठ जाता है.

विश्व स्वास्थ्य संगठन की रिपोर्ट में उत्तर प्रदेश के प्रमुख शहर कानपुर को दुनिया का सबसे प्रदूषित शहर बताया गया है. उसके बाद फरीदाबाद, वाराणसी और गया का नंबर आता है. उच्च स्तर पर पीएम 2.5 की मौजूदगी वाले अन्य भारतीय शहरों में दिल्ली, पटना, आगरा, मुजफ्फरपुर, श्रीनगर, गुड़गांव, जयपुर, पटियाला और जोधपुर भी शामिल हैं.

हिंदीभाषी शहर ही सबसे ज्यादा प्रभावित

सबसे प्रदूषित शहरों वाली विश्व स्वास्थ्य संगठन की इस सूची से दो चीजें साफ हैं. पहली बात यह कि श्रीनगर और पटियाला को छोड़ दिया जाए तो प्रदूषण का बुरी तरह शिकार ये सभी शहर हिंदीभाषी प्रदेशों के हैं. दूसरी चीज यह कि इस सूची में हर साल भारतीय शहरों की संख्या में तेजी से बढ़ोतरी हो रही है. इन दोनों तथ्यों का विस्तार से विश्लेषण करने की जरूरत है.

देश के प्रमुख हिंदीभाषी क्षेत्र भारत की राजनीति की धुरी है. मुंबई के अलावा यह मीडिया और जन नीतियों के आकर्षण का भी केंद्र है. इसके बावजूद यह भौगोलिक क्षेत्र लगातार काफी प्रदूषित बना हुआ है. और हैरानी की बात यह है कि देश की प्रमुख राजनीतिक पार्टियों के बीच, सरकार और मीडिया में जनता के इस स्वास्थ्य संकट को लेकर किसी तरह की कोई चर्चा या बहस देखने-सुनने को नहीं मिलती है.

ऐसा लगता है कि या तो लोग प्रदूषण के सामाजिक-आर्थिक खतरों से वाकिफ नहीं हैं या उन्होंने सांस लेने के जहरीले माहौल को अपनी किस्मत मानते हुए इस समस्या को लेकर हथियार डाल दिया है.

किसी भी राजनीतिक पार्टी के एजेंडे में नहीं है यह मुद्दा

पिछले दो साल में बिहार, यूपी और पंजाब में चुनाव हुए. हालांकि, किसी भी राजनीतिक पार्टी ने अपने चुनाव प्रचार अभियान के दौरान इस संकट के बारे में बात नहीं की. और इसकी मुख्य वजह इस मामले को लेकर जनता का बेहद उदासीन रवैया है.

देश की जनता भले ही हवा में घुले जहर का प्रकोप झेल रही है, लेकिन वह प्रदूषण के बारे में बिल्कुल बात नहीं करती. भारत के लोग अपने स्वास्थ्य को लेकर इस कदर उदासीन हैं कि वे नेताओं और सरकार से इस बारे में बात करने की बिल्कुल अपेक्षा नहीं करते.

pollution

लिहाजा हमारे यहां के नेता पर्यावरण के मुद्दों पर सिर्फ बातें करके रह जाते हैं, जबकि 'स्वच्छ भारत' पर और नदियों को साफ करने और उन्हें 'मैया' मानने पर चमकदार विज्ञापन पेश कर अपने कर्तव्यों की इतिश्री मान लेते हैं. जमीन पर ज्यादा कुछ नहीं होता और हवा की गुणवत्ता लगातार बद से बदतर होती रहती है.

विश्व स्वास्थ्य संगठन के आंकड़ों में भी इन बातों की झलक मिलती है. साल 2010 में दिल्ली दुनिया का सबसे प्रदूषित शहर था और विश्व के सबसे प्रदूषित शहरों में एक और अन्य भारतीय शहर (आगरा) ही था.

हालांकि, 'टाइम्स ऑफ इंडिया' की खबर के मुताबिक, 2012 के बाद से इस ट्रेंड में बदलाव होने लगा और उस साल दुनिया के 20 सबसे प्रदूषित शहरों में से 14 भारत के रहे. साल 2013, 2014 और 2015 में भी 4 से 7 भारतीय शहर दुनिया के 20 सबसे ज्यादा प्रदूषित शहरों की सूची में शामिल थे. अब दुनिया के 15 सबसे ज्यादा प्रदूषित शहरों में से 14 भारत के हैं.

अगर हम इस सिलसिले में चीन की बात करें, तो वहां की सरकार ने प्रदूषण को तेजी से कम करने के लिए लॉन्ग टर्म प्लान पेश कर उस पर सख्ती से अमल को लेकर काम किया है. इसके अलावा, बड़े पैमाने पर जागरूकता अभियान भी चलाया गया है.

साल 2013 के दौरान दुनिया के 20 सबसे प्रदूषित शहरों की सूची में चीन के 14 शहर शामिल थे. इस साल चीन के सिर्फ 4 शहरों को दुनिया के 20 सबसे प्रदूषित शहरों की सूची में शामिल किया गया है. इनमें पाओटिंग, हेंगशुई, सिंगताई और अंयांग शामिल हैं.

चूंकि जहरीली हवा वाले दुनिया के टॉप 15 शहरों में लगातार भारतीय शहरों का जिक्र आ रहा है, लिहाजा इस सिलसिले में खतरे की घंटी काफी पहले बज जानी चाहिए थी. प्रदूषण को राष्ट्रीय आपदा घोषित कर दिया जाना चाहिए था. राज्य और केंद्र सरकारों को प्रदूषण के खिलाफ युद्ध छेड़ देना चाहिए था. हालांकि, दुर्भाग्य से प्रदूषण से निपटने के मामले में ज्यादातर निर्देश अदालतों की तरफ से आए हैं, जबकि कार्यपालिका इस मुद्दे पर लगातार इनकार की मुद्रा में नजर आ रहा है.

पूरी व्यवस्था में उथल-पुथल मचा देगी यह समस्या

प्रदूषण के खतरों को सिर्फ वैसे नीति निर्माता नजरअंदाज कर सकते हैं, जिनके पास दूरदृष्टि नहीं है. दूरदृष्टि नहीं रखने वाले नीति निर्माता ही इस बात अंदाजा नहीं लगा सकते कि अगर प्रदूषण के कारण शहर रहने लायक नहीं रहा, तो इसके विनाशीकारी परिणाम होंगे. नतीजतन, पूरी अर्थव्यवस्था, जन स्वास्थ्य सेवाएं और मौजूदा इंफ्रास्ट्रक्चर लड़खड़ा जाएगी.

मिसाल के तौर पर दिल्ली की बात करते हैं. यह दुनिया का चौथा सबसे प्रदूषित शहर है. प्रदूषण का स्तर कम करने में भारत के नाकाम रहने के कारण कई हेल्थ एक्सपर्ट पहले ही इस देश को नहीं रहने लायक करार दे चुके हैं. कई दूतावासों ने अपने लोगों और स्टाफ को सर्दियों के मौसम में दिल्ली नहीं आने के लिए एडवाइजरी जारी किया है. गौरतलब है कि सर्दी के मौसम में दिल्ली में कई हफ्तों तक खतरनाक स्मॉग का दौर चलता है.

A thick layer of smog engulfs New Delhi, India, on November 5, 2016. Some 1,800 primary schools in Delhi have been ordered to shut down on Saturday as the capital city grapples with some of the worst pollution in recent years. Data from a pollution monitoring agency has measured the toxic smog to as much as 13 times the safe limit. Locals blame the overdose of bursting crackers and fireworks during Diwali, for the alarming pollution level. (Jyoti Kapoor/SOLARIS IMAGES)

प्रदूषण के कारण सामाजिक-आर्थिक स्तर पर बोझ काफी बढ़ सकता है. कोई भी निवेशक ऐसे शहर में निवेश करने की क्यों सोचेगा, जो गैस चैंबर में बदल गया हो? विदेशी यहां बिजनेस या मजे के लिए क्यों आना चाहेंगे? विदेशी मुल्कों की सरकार क्यों चाहेंगी कि उनका स्टाफ शहर की जहरीली हवा में सांस ले? ऐसे में दिल्ली की हवा पीआर के लिहाज से भी खतरनाक है. यह सामाजिक-आर्थिक विकास में बाधा की तरह है.

प्रदूषण की समस्या हमें बड़ी क्यों नहीं लगती?

भारत के लोगों के लिए इसकी कीमत और बड़ी है. प्रदूषण हार्ट संबंधी बीमारियों, दमा और सांस संबंधी दिक्कतों की प्रमुख वजह है. बच्चों के सांस लेने संबंधी स्वास्थ्य पर इसके असर को लेकर काफी लिखा जा चुका है. इसके अलावा, प्रदूषण कई भारतीय ठिकानों को रिहायश के लिए असुरक्षित बना रहा है. यह समस्या धीरे-धीरे लोगों को बड़ी कीमत चुकाकर दूसरी जगह बसने के लिए मजबूर करेगी और प्रदूषित महानगर भुतहा शहरों में तब्दील हो जाएंगे. इससे महानगरों के आसपास के इलाकों पर जबरदस्त दबाव बनेगा.

भारत को लॉन्ग टर्म प्लान के साथ इस संकट से निपटने की जरूरत है. इस प्लान पर गंभीरता से अमल भी उतना ही जरूरी है. दिल्ली और राज्यों की सरकारों को अपने मतभेद भुलाकर यह सुनिश्चित करने की जरूरत है कि नीतिगत स्तर पर हस्तक्षेप, पर्यावरण नियमों के सख्त पालन और जागरूकता अभियान के जरिये प्रदूषण का स्तर कम किया जाए. खासतौर पर दिल्ली में इस पर तेजी से पहल करने की जरूरत है, जहां ओछी राजनीति के कारण लोग परेशान हैं.

हालांकि, यह सब कुछ तभी मुमकिन है, जब 'परेशान जनता' यह महसूस करे कि उनके आसपास प्रदूषण की आंच बढ़ रही है. इसमें महज थोड़ा ही वक्त लग सकता है (दशकों नहीं बल्कि कुछ साल में ही ऐसी आशंका है) कि हमारे आसपास मौजूद जहरीली हवा हमें आर्थिक, सामाजिक और शारीरिक तौर पर पंगु बना दे. प्रदूषण से परेशान देश की जनता को इस आसन्न खतरे को भांपने और इसके खिलाफ बोलने की जरूरत है. तभी भारत के नेता इस पर कार्रवाई करेंगे.

0

अन्य बड़ी खबरें

वीडियो
Ganesh Chaturthi 2018: आपके कष्टों को मिटाने आ रहे हैं विघ्नहर्ता

क्रिकेट स्कोर्स और भी

Firstpost Hindi