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बॉम्बे हाउस से लखनऊ तक एक जैसी कहानी

टाटा ग्रुप और समाजवादी पार्टी, दोनों में करीब एक ही समय पर शासन की जिम्मेदारी नई पीढ़ी को सौंपी गई थी

Updated On: Nov 17, 2016 10:44 AM IST

Shankkar Aiyer

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बॉम्बे हाउस से लखनऊ तक एक जैसी कहानी

दोनों ही मामलो में पेंच उत्तराधिकार को लेकर फंसा. टाटा ने अपने चेयरमैन को निकाल बाहर किया जबकि समाजवादी पार्टी अब तक पसोपेश में है. दोनों ही मामलों में दिलचस्प समानताएं हैं.

उत्तर प्रदेश देश का सबसे बड़ा राज्य है. 2.4 लाख किलोमीटर में फैले इस राज्य में करीब 21.70 करोड़ लोग रहते हैं. यहां 80 लोकसभा और 403 विधानसभा सीटें हैं.

टाटा ग्रुप देश का सबसे बड़ा औद्योगिक समूह है. दुनिया के छह महादेशों में इसकी 100 से ज्यादा कंपनियां फैली हुई हैं.

ग्रुप में करीब 6.6 लाख लोग काम करते हैं. इसकी सालाना आमदनी 6.65 लाख करोड़ रुपये और मार्केट कैप 8.36 लाख करोड़ रुपये है.

टाटा ग्रुप और समाजवादी पार्टी, दोनों में करीब एक ही समय पर शासन की जिम्मेदारी नई पीढ़ी को सौंपी गई थी.

यादव कुल के वारिस अखिलेश यादव मार्च 2012 में 39 साल की उम्र में उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री बने थे. वो राज्य के सबसे युवा सीएम हैं.

वहीं, दिसंबर 2012 में शापूरजी पालोनजी परिवार के वारिस साइरस पालोनजी मिस्त्री को 44 साल में टाटा ग्रुप का चेयरमैन बनाया गया.

इसमें कोई शक नहीं है कि अखिलेश और साइरस, दोनों को बड़ी जिम्मेदारी मिली थी.

एक जैसी विरासत की परंपरा

साइरस ने रतन एन टाटा की जगह ली थी. 1991 से 2012 के बीच रतन टाटा ने अपनी कंपनी को दुनिया भर में पहुंचाया.

अखिलेश को मुलायम सिंह से शासन की कमान मिली थी. राजनीति की नब्ज और मौकों की बेहतरीन समझ रखने वाले मुलायम सिंह तीन बार राज्य के सीएम रह चुके हैं.

रतन टाटा ने जेआरडी टाटा की जगह ली थी. टाटा ग्रुप के चेयरमैन बनने की दौड़ में रतन टाटा ने कई लोगों को पीछे छोड़ा था.

इनमें 16 अंडों के ऑमलेट का नाश्ता करने के लिए लोकप्रिय रूसी मोदी, मशहूर दरबारी सेठ और चालाक अजीत केरकर शामिल हैं.

रतन टाटा 1991 में जब ग्रुप के चेयरमैन बने तब बॉम्बे हाउस को ‘विक्ट्री ऑफिस’ माना जाता था. उस वक्त ग्रुप का टर्नओवर बमुश्किल 10,600 करोड़ रुपये था.

जवानी में पहलवानी करने वाले मुलायम सिंह यादव ने हर दांव-पेंच लगाकर समाजवादी पार्टी का गठन किया था.

पहलवानी से लेकर राजनीति के अखाड़े में उन्होंने अपने विरोधियों को पस्त किया. अपने राजनीतिक गुरु वीपी सिंह से अलग होकर, चार बार यहां-वहां से समर्थकों को इकट्ठा करके, आखिर में उन्होंने समाजवादी पार्टी की नींव रखी.

सोमवार को टाटा ग्रुप और समाजवादी पार्टी, दोनों जगह उठापटक मची थी. एक तरफ पारिवारिक-राजनीतिक पार्टी में मारकाट मची है, तो दूसरी तरफ फैमिली ट्रस्ट की कंपनी में उथलपुथल है.

बॉम्बे हाउस के निजी फैसले में पब्लिक की जबरदस्त दिलचस्पी है. वहीं, लखनऊ के राजनीतिक परिवार में सियासी दांवपेंच जबरदस्त सस्पेंस पैदा कर रहे हैं.

लखनऊ से मुंबई तक एक एकजैसी उठापटक

साइरस मिस्त्री को हटा दिया गया लेकिन अखिलेश यादव इस झटके से अभी बचे हुए हैं.

पुराने धुरंधर एक बार फिर मैदान में हैं. एक तरफ रतन टाटा ने चेयरमैन की कमान संभाली, तो दूसरी तरफ मुलायम सिंह यादव को पार्टी से लेकर सरकार तक को अपने हाथ में लेने के लिए मनाया जा रहा है.

दिलचस्प है कि अखिलेश और साइरस दोनों पर पावर की मार पड़ी है. दोनों की चुनौतियां एकसमान हैं. भारत के राजनीतिक और कारोबारी जगत में उत्तराधिकार का मैकेनिज्म बनाने की जरूरत है.

यह मसला सिर्फ किसी राजनीतिक पार्टी या कॉरपोरेट हाउस का नहीं है. मामला मूल्यों को बचाए रखने का है. विचारों में अलगाव हमेशा रहता है. कॉरपोरेट्स और राजनीतिक पार्टियों की चुनौती है मैनेजमेंट के साथ ओनरशिप को बरकरार रखना.

जैसा कि सब कहते हैं, राजनीति संभावनाओं का खेल है और पुरानी उपलब्धियों को मैनेज करके भविष्य की हिस्सेदारी को सुरक्षित रखने की कला मैनेजमेंट कहलाती है.

( लेखक राजनीतिक आर्थिक विश्लेषक हैं )

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