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PNB स्कैम: CBI और ED के अति उत्साह से खौफ में है बैंकिंग सेक्टर

सीबीआई और ईडी की अति सक्रियता का नतीजा ये हुआ है कि आज बैंकिंग और कारोबारी क्षेत्र में डर का माहौल बन गया है

Ajay Singh Ajay Singh Updated On: Mar 06, 2018 11:38 AM IST

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PNB स्कैम: CBI और ED के अति उत्साह से खौफ में है बैंकिंग सेक्टर

1985 में मुझे एक राष्ट्रीय अखबार के लिए लखनऊ में एक कार्यक्रम की रिपोर्टिंग का मौका मिला था. इस कार्यक्रम को एक उद्योग संगठन ने आयोजित किया था, जिसमें कानून के मशहूर जानकार ननी पालखीवाला ने भी भाषण दिया था.

उन दिनों वित्त मंत्री के तौर पर वी पी सिंह काले धन को उजागर करने का बड़ा अभियान छेड़े हुए थे. उन्होंने बड़े कारोबारी घरानों के खिलाफ टैक्स और जांच एजेंसियों को जांच के लिए लगा दिया था. यहां तक कि इनकम टैक्स विभाग, प्रवर्तन निदेशालय, डीआरआई और कस्टम विभाग के अधिकारियों ने देश के सबसे इज्जतदार कारोबारी घरानों और उनके मालिकों तक को नहीं बख्शा था. इन लोगों को कड़ी जांच का सामना करना पड़ा था.

ऐसा लग रहा था कि वित्त मंत्री ऐसे शिकार कर रहे थे, जिसे उनकी सेनाओं ने घेर रखा था. मीडिया भी बिना कोई सवाल उठाए इस बात को जोर-शोर से उछाल रहा था. पागलपन के उस दौर में ननी पालखीवाला एक समझदारी भरी आवाज के तौर पर उभरे थे. जिन्होंने सरकार की कार्रवाई को अनैतिक और बदले की भावना से प्रेरित करार दिया था. पालखीवाला ने कहा था कि सरकार के इस कदम के देश के लिए बुरे और दूरगामी परिणाम होंगे. ननी पालखीवाला ने एस एल किर्लोस्कर जैसे बड़े और रसूखदार उद्योगपतियों के यहां आधी रात के वक्त छापेमारी पर सवाल उठाए थे और पूछा था कि क्या वो छोटे-मोटे अपराधी हैं?

पालखीवाला ने पूछा था कि, 'आखिर आप इससे क्या संदेश देना चाहते हैं' पालखीवाला के तर्क और उनके सवालों से साफ था कि वी पी सिंह बेकार की मुहिम छेड़े हुए थे. लेकिन मुख्यधारा के मीडिया समेत वी पी सिंह के तमाम चापलूसों ने भारतीय उद्योगपतियों का शिकार करना जारी रखा. इससे उद्योगपतियों के बीच डर बैठ गया था. ये सिलसिला तब तक चलता रहा, जब तक राजीव गांधी ने वी पी सिंह के पर न कतर दिए. उनसे वित्त मंत्रालय छीनकर उन्हें रक्षा मंत्री बना दिया गया. लेकिन, तब तक जो नुकसान होना था, वो हो चुका था.

Vishwanath-Pratap-Singh

वीपी सिंह को फायदा मिला देश का नुकसान हुआ

वी पी सिंह ने अपनी छवि 'मिस्टर क्लीन' की बना ली. वी पी सिंह की पहचान एक ऐसे नेता की बन गई जो जुबानी तौर पर सिस्टम को पूरी तरह बदलने से जरा भी कम बात पर राजी नहीं थे. वी पी सिंह एक ऐसे नेता के तौर पर उभरे, जो अमीरों के विरोधी थे. इस छवि का मेहनतकश तबके पर गहरा असर पड़ा. इस छवि का फायदा उठाने के लिए वी पी सिंह ने कांग्रेस छोड़ दी और राजीव गांधी के खिलाफ कई दलों का मोर्चा बना लिया.

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उस वक्त कई रक्षा सौदों में रिश्वत के लेन-देन के आरोपों की वजह से राजीव गांधी सियासी मुश्किल में थे. 1989 के चुनाव में वी पी सिंह की जीत से हमें एक अस्थिर सरकार मिली, क्योंकि वी पी सिंह की राजनैतिक चतुराई अधकचरी साबित हुई. सार्वजनिक जीवन में ईमानदारी की वी पी सिंह की बातें ढकोसला साबित हुईं. जल्द ही वो सियासी सीन से लापता भी हो गए. लेकिन देश ने आर्थिक, सामाजिक और सियासी मोर्चे पर इसकी भारी कीमत चुकाई. वी पी सिंह का प्रधानमंत्री बनना देश के लिए एक असाधारण राजनैतिक घटना थी, जिसने देश को राजनैतिक अस्थिरता, अराजकता और नैतिक पतन के रास्ते पर धकेल दिया था. इससे देश की अर्थव्यवस्था को इतना नुकसान पहुंचा था कि भारत को अपना सोना तक विदेश में गिरवी रखना पड़ा.

ऐसा लग रहा है कि तीन दशक से भी ज्यादा पुराना वो डर का माहौल देश में फिर लौट आया है. टैक्स और प्रवर्तन निदेशालय के अधिकारी कारोबारियों के पीछे लगाए जा रहे हैं. जिस तरह से सीबीआई और प्रवर्तन निदेशालय के अधिकारी बैंकिंग और वित्तीय सेक्टर में फर्जीवाड़े के आरोपों की जांच कर रहे हैं, उससे बैंकिंग और कॉरपोरेट जगत में दहशत तो फैलेगी ही, लोगों के दिलों में उनके प्रति नफरत भी बैठ जाएगी. चूंकि ये सब प्रधानमंत्री मोदी की मौजूदा सरकार के कार्यकाल के आखिरी दिनों में हो रहा है. ऐसे में ये लगना लाजिमी है कि मोदी सरकार भी वी पी सिंह के रेड राज की झलक दिखा रही है.

PNB-Nirav Modi scam case

बैंकिंग सेक्टर का मर्ज दूसरे घोटालों से ज्यादा पेचीदा है

जिस तरह से इन तथाकथित घोटालों की जांच हो रही है, उससे ऐसा लग रहा है कि सिर्फ कुछ खास लोगों को शिकार बनाया जा रहा है. ये वित्तीय क्षेत्र में ऐसी धांधलियों को जन्म देने वाली कमियों को दुरुस्त करने की कोशिश कतई नहीं लगती. इससे गहरा शक पैदा होता है कि कहीं ये सरकार को अस्थिर करने और बैंकिंग सेक्टर को कमजोर करने की साजिश तो नहीं?

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यहां हमें याद रखना चाहिए कि विजय माल्या के कर्ज घोटाले की शुरुआती जांच के वक्त सीबीआई और प्रवर्तन निदेशालय के बीच गहरे मतभेद थे. शुरुआत में सीबीआई इसे घोटाला मानती ही नहीं थी. एजेंसी का मानना था कि विजय माल्या ने कर्ज लिया था, जिसे वो चुका नहीं पाए. ऐसे में ये घोटाला नहीं है. माल्या महज लोन डिफॉल्टर हैं. माल्या के खातों की गहराई से पड़ताल की गई, तो ऐसा कहीं नहीं दिखा कि उन्होंने पैसों को इधर-उधर किया है. सीबीआई के एक अधिकारी ने मुझसे कहा था, 'ये फर्जीवाड़ा नहीं, महज कर्ज न चुकाने का मामला है'. बाद में सीबीआई ने अपने जांच अधिकारियों को बदल दिया और एजेंसी ने भी मामले को फर्जीवाड़ा कहकर जांच शुरू कर दी.

यहां कोई ये नहीं कह रहा है कि विजय माल्या के खिलाफ जांच नहीं होनी चाहिए. मगर, सवाल ये है कि कहीं हम असल बीमारी की पहचान करने में नाकाम तो नहीं रहे हैं? विजय माल्या का केस कुछ बैंकरों, नेताओं और कारोबारी घरानों की हैरान कर देने वाली फिजूलखर्ची का है. असल सवाल ये है कि जिस वक्त उनका हवाई कारोबार नाकाम हो रहा था, उस वक्त उन्होंने इतना कर्ज कैसे हासिल कर लिया? इस सवाल का जवाब उस वक्त के वित्त मंत्री रहे प्रणब मुखर्जी और पी चिदंबरम के काम-काज के तरीके में छुपा है.

हम कुछ मिसालों से समझ सकते हैं कि प्रणब मुखर्जी और पी चिदंबरम के राज में वित्त मंत्रालय किस तरह चलाया जा रहा था. बिहार काडर के एक आईएएस अफसर अमिताभ वर्मा वित्त मंत्रालय में संयुक्त सचिव थे. वो इतने ताकतवर हो गए थे कि एक बार विजय माल्या उनसे मिलने के लिए अपने निजी विमान से बैंगलोर से पटना पहुंचे थे. ये बात यूपीए-1 सरकार के शुरुआती दिनों की है, जब चिदंबरम वित्त मंत्री थे. एक स्थानीय अफसर ने बताया कि, 'हम ने सोचा कि वो मुख्यमंत्री से मिलने आए हैं'. इस अधिकारी को माल्या के पटना में होने की खबर मिली थी. लेकिन विजय माल्या एयरपोर्ट से सीधे अमिताभ वर्मा के घर पहुंचे और उनसे मुलाकात के बाद वापस चले गए.

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कारोबारियों के बीच अपनी औकात से ज्यादा हैसियत रखने वाले अमिताभ वर्मा इकलौते अधिकारी नहीं थे. प्रणब मुखर्जी के दफ्तर में बहुत रसूखदार मानी जाने वाली एक महिला अधिकारी भी मुखर्जी के वित्त मंत्री रहते हुए ऐसी ही पावरफुल थीं. इस बात के पर्याप्त सबूत हैं कि बैंकों को ऐसे कॉरपोरेट घरानों को कर्ज देने के लिए मजबूर किया गया, जो फिजूलखर्च थे और जिनकी माली हालत ठीक नहीं थी. इसके नतीजे तो तय ही थे. कर्ज लेने वाले उसकी भरपाई करने में नाकाम रहे.

सीबीआई और ईडी बैंकिंग सिस्टम की बारीकियों को नहीं समझ सकती

सहारा का मामला इस बात की एक और मिसाल है कि किस तरह अधिकारी और संस्थान (इस मामले में सेबी और सुप्रीम कोर्ट) कारोबारी घरानों को तंग करते हैं. और ऐसा करते हुए कारोबार को ठप कर देते हैं. जबकि हम इंसाफ का इंतजार ही करते रहते हैं. सच्चाई ये है कि आज तक न तो सहारा और न ही इसके प्रमुख के खिलाफ कोई आपराधिक केस बनाया जा सका है. फिर भी, उन्हें जेल भेज दिया गया. इसका नतीजा ये हुआ कि जेल में भी उनकी शाही जिंदगी जारी रही, जिसने तिहाड़ जेल की व्यवस्था को भी नीचा दिखाया.

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कुल मिलाकर कहें तो सीबीआई और ईडी की अति सक्रियता का नतीजा ये हुआ है कि आज बैंकिंग और कारोबारी क्षेत्र में डर का माहौल बन गया है. जबकि मोदी सरकार और देश के लिए ये बेहद अहम दौर है, जब 8 तिमाही से धीमी रफ्तार से बढ़ रही अर्थव्यवस्था में तरक्की की रफ्तार में तेजी आने के संकेत दिखने लगे थे. हां ये बात जरूर है कि इस माहौल से सरकार के लिए चुनावी फायदे का माहौल जरूर बना है. लोगों के बीच ये संदेश गया है कि ताकतवर लोगों को भी बख्शा नहीं जाएगा. लेकिन ये तो अपने चेहरे को बचाने के लिए अपनी नाक काटने जैसा कदम ही है.

पहली नजर में देखें तो विजय माल्या, नीरव मोदी और विक्रम कोठारी के मामले बैंकों के अंदरूनी ऑडिट सिस्टम और बारी नियामक व्यवस्थाओं, खास तौर से रिजर्व बैंक और वित्त मंत्रालय के बैंकिंग और वित्तीय सेवाओं के विभाग की नाकामी की मिसाल हैं. हमें अब तक ये बात सुनने का इंतजार है कि आखिर इन गहरी नींद में सो रही संस्थाओं को नींद से जगाने और उनकी जवाबदेही तय करने के लिए क्या कदम उठाए जा रहे हैं.

Nirav Modi

इसके बजाय हम सीबीआई और प्रवर्तन निदेशालय को जरूरत से ज्यादा तेजी से काम करते हुए देख रहे हैं. जबकि ये संस्थाएं वित्तीय लेन-देन की बारीकी को समझने की काबिलियत से महरूम हैं. ऐसी संस्थाएं अब ये तय कर रही हैं कि कौन वाजिब कर्जदार है और कौन नहीं. एक सीनियर सरकारी कर्मचारी ने मुझसे कहा कि, 'सीबीआई और ईडी ये तो देख सकते हैं कि किसी कर्ज के लेन-देन में क्या आपराधिक साजिश हुई. लेकिन इनसे ये उम्मीद करना बेवकूफी होगी कि वो ये तय करें कि कर्ज लेने का सही हकदार कौन है और कौन नहीं'.

सीबीआई और ईडी के अति उत्साह से बैंकिंग सेक्टर में डर का माहौल है. ये सेक्टर पहले ही बैंकों में बढ़ते एनपीए की चुनौती से जूझ रहा था. सीबीआई के पास ऐसे तमाम कर्जों की जांच की अर्जियों की बाढ़ आ गई है, जो फर्जीवाड़े के बजाय साफ तौर पर अनैतिक और बेहद खराब दर्जे की बैंकिंग का नतीजा हैं.

अगर किसी को प्रशासन की जरा सी भी समझ है तो वो ये जानता होगा कि जांच एजेंसियों के जरिए वित्तीय संस्थानों में काम-काज के अच्छे तरीके लागू करने की सोच ही गलत है. ये काम राजनैतिक व्यवस्था और नियामकों का है. सीबीआई और ईडी को इस तरह के रोल निभाने से रोका जाना चाहिए.

( इस लेख का एक वर्जन Governance Now के 1-15 मार्च के एडिशन में छप चुका है )

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