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बैंक घोटाला पार्ट-2 : आठ साल पहले बजी थी बैंकों में घोटाले के खतरे की घंटी

24 नवंबर 2010 को सीबीआई ने एक बड़ा एलान करने के लिए मुंबई में प्रेस कांफ्रेंस बुलाई थी. जब मीडिया प्रेस कांफ्रेंस शुरू होने का इंतजार कर रहा था, तभी सीबीआई ने 8 बैंक अधिकारियों की गिरफ्तारी की घोषणा की.

Updated On: Feb 21, 2018 07:16 PM IST

Dinesh Unnikrishnan

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बैंक घोटाला पार्ट-2 : आठ साल पहले बजी थी बैंकों में घोटाले के खतरे की घंटी

24 नवंबर 2010 को सीबीआई ने एक बड़ा एलान करने के लिए मुंबई में प्रेस कांफ्रेंस बुलाई थी. जब मीडिया प्रेस कांफ्रेंस शुरू होने का इंतजार कर रहा था, तभी सीबीआई ने 8 बैंक अधिकारियों की गिरफ्तारी की घोषणा की. इनमें एलआईसी हाउसिंग फाइनेंस लिमिटेड के सीईओ, एलआईसी का ही एक और बड़ा अधिकारी, बैंक ऑफ इंडिया, सेंट्रल बैंक ऑफ इडिया और पंजाब नेशनल बैंक के अधिकारी शामिल थे.

प्रेस कांफ्रेंस के दौरान सीबीआई ने दावा किया कि उसने एक बड़े कॉरपोरेट लोन रैकेट का भंडाफोड़ किया है. इस रैकेट में शामिल लोग दलालों के जरिए कारोबारियों से पैसे लेकर उनके लिए लोन का इंतजाम करते थे. इन कारोबारियों को आम तौर पर नियम के तहत कर्ज नहीं मिलना चाहिए था. जैसे-जैसे लोन के लिए रिश्वत के इस घोटाले की जानकारियां सामने आईं, वैसे ही उस वक्त के वित्त मंत्री प्रणब मुखर्जी ने बैंकों को चेतावनी दी कि वो ऐसे भ्रष्ट अधिकारियों के खिलाफ कार्रवाई करें. वित्त मंत्री ने कहा कि बैंक ऐसी व्यवस्था बनाएं कि ऐसे घोटाले और फर्जीवाड़े दोबारा न हों.

ये और बात है कि सीबीआई ने इस केस की कड़ाई से जांच नहीं की. न ही जांच एजेंसी ने कोर्ट में इस केस को मजबूती से रखा.  लेकिन, बड़ी बात ये है कि बैंकों ने इस फर्जीवाड़े से कोई सबक नहीं लिया.

सारा खेल दलालों का है

इस घोटाले के बाद भी बैंकों में फर्जीवाड़ों और कर्ज के लेन-देन में घोटालों की खबरें आती रहीं. इनमें बैंक के अधिकारियों के शामिल होने की बातें भी सामने आती रहीं. छोटे और बड़े हर तरह के फर्जीवाड़े सामने आए. सिटीबैंक फर्जीवाड़ा, बैंक ऑफ बड़ौदा में विदेशी मुद्रा की जालसाजी, सिंडीकेट बैंक में घोटाले जैसे अनगिनत फर्जीवाड़े बैंको में होते हुए देखे गए. कर्ज के ये ज्यादातर घोटाले बीच के लोगों की मदद से हुए.

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करीब तीन दशक का तजुर्बा रखने वाले एक सीनियर बैंकर का कहना है, ' कई सलाहकार फर्म हैं, जो बैंक के अधिकारियों को रिश्वत देकर कंपनियों के लिए लोन का इंतजाम करती हैं. बड़ी कंपनियों को ऐसे दलालों की जरूरत नहीं होती. मगर, मंझोली और छोटी कंपनियों को ऐसे दलालों के बिना कर्ज मिलने में दिक्कत होती है'.

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हर बार बैंक अधिकारियों को रिश्वत में रकम ही मिले ये जरूरी नहीं. उन्हें दूसरे तरीकों से भी फायदा पहुंचाया जाता है. कई बार ऐसी रिश्वत का पता लगाना जांच एजेंसियों के लिए बहुत मुश्किल होता है. कई बार बैंक के अधिकारी घड़ियां या सोने के गहने जैसे छोटे तोहफे लेते भी पकड़े गए हैं.

इस सीनियर बैंक अधिकारी का कहना है कि कुछ लोग तो ये काम पैसे के लिए करते हैं. वहीं कई बैंक अधिकारी अपने संबंधों के लिए. कुछ तो चमचागीरी कराने के लिए भी कर्ज के फर्जीवाड़े करते देखे गए हैं. कई बार तो बैंक के अफसर ऐसी चीजों के लिए घोटाले करते देखे गए हैं, जो सुनकर ही हंसी आ जाए. कुछ बैंक अधिकारियों का कहना है कि सरकारी बैंकों में प्राइवेट बैंकों के मुकाबले सैलरी कम होती है. इस वजह से भी कई बैंक अधिकारी घोटाले और जालसाजी शुरू कर देते हैं.

नियम हैं, मगर कोई परवाह नहीं करता

पीएनबी घोटाले को देखकर लोग ये भले सोचते हों कि बैंकों में ऐसे फर्जीवाड़े रोकने की व्यवस्था नहीं है. मगर हकीकत इसके उलट है. कई नियम-कायदे ऐसे हैं, जिन्हें कड़ाई से लागू किया जाए तो ऐसी जालसाजियां रोकी जा सकती हैं. अब जैसे कि पीएनबी घोटाले में जारी किए गए लेटर ऑफ अंडरस्टैंडिंग या एलओयू को ही लीजिए. अगर किसी शाखा का अधिकारी सात साल तक ये फर्जीवाड़ा करता रहा है, तो किसी न किसी जांच में तो उसे पकड़ा जाना चाहिए था.

पीएनबी घोटाले के लिए जिस स्विफ्ट सिस्टम का इस्तेमाल हुआ, उसमें हर ब्रांच मैनेजर को रोजाना इसका हिसाब लेना होता है. मान लीजिए कि भ्रष्ट लोगों ने इस नियम को धता बता दी, तो भी ब्रांच मैनेजर को रोजाना अपनी शाखा की आमदनी और खर्चों का हिसाब तो लेना चाहिए था. ऐसे में ये फर्जीवाड़ा पकड़ में आ जाता. इसके अलावा बैंकों में सालाना ऑडिट के साथ-साथ अचानक भी खातों की पड़ताल होती रहती है. इन पड़तालों में ये फर्जीवाड़ा पकड़ में आना चाहिए था. इसके अलावा हर बड़े बैंक के बोर्ड में सरकार और रिजर्व बैंक के नुमाइंदे होते हैं. इनकी जिम्मेदारी यही होती है कि वो बैंकों के ऐसे लेन-देन की कड़ी निगरानी करें, ताकि कोई गड़बड़ न हो. लेकिन, जब भी कोई घोटाला सामने आता है, तो लगता है कि जांच-परख का पूरा सिस्टम ही सोया हुआ था. अक्सर बैंकों पर कारोबार बढ़ाने का दबाव होता है. ऐसे में कई बड़े अधिकारी अवैध लेन-देन की तरफ से आंखें फेर लेते हैं.

कार्रवाई में बहुत देर हो जाती है

बैंकों की परेशानी सिर्फ फर्जीवाड़ा ही नहीं है. कई बार कर्ज देने में गलतियां होती हैं. फिर कार्रवाई में भी देरी होती है. बैंकों ने किंगफिशर एयरलाइन की हालत खराब होने के बावजूद उसे कर्ज देना जारी रखा. मार्च 2012 में किंगफिशर ने यूरोप और एशिया की अपनी अंतरराष्ट्रीय उड़ानें बंद कर दी थीं. इसके अलावा कंपनी ने स्थानीय उड़ानों की तादाद भी रोजाना 340 से घटाकर 110-125 कर दी थीं. जबकि किंगफिशर के पास 20 विमान थे.

अक्टूबर 2012 में किंगफिशर ने आखिरी उड़ान भरी. इसके बाद से इसके विमान अब तक वैसे ही खड़े हैं. एक वक्त में किंगफिशर भारत की दूसरी सबसे बड़ी एयरलाइन थी. अक्टूबर 2012 के बाद से किंगफिशर को दोबारा उड़ान की इजाजत मिलने की गुंजाइश बेहद कम रह गई थी. क्योंकि इसके खाते खाली थे. मार्च 2013 तक इसका सालाना घाटा 2142 करोड़ हो गया था. जबकि एक साल पहले यही नुकसान 1150 करोड़ रुपए का था. मार्च 2013 तक आते-आते कंपनी का कुल घाटा 16,023 करोड़ रुपए हो चुका था.

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2011 की शुरुआत में एसबीआई की अगुवाई में बैंकों ने किंगफिशर को दिए 1400 करोड़ रुपए के कर्ज को 60 फीसद के प्रीमियम पर शेयर में तब्दील कर दिया. शेयर बाजार के आंकड़ों के मुताबिक, 31 मार्च तक एसबीआई और आईसीआईसीआई बैंक को तरजीह देते हुए एक शेयर की कीमत 64.48 रुपए तय के हिसाब से शेयर दिए गए. जबकि उस दिन किंगफिशर के शेयर 39.90 रुपए पर बंद हुए थे. कुछ ही महीनों के भीतर किंगफिशर के शेयरों की हालत इतनी बुरी हो गई, कि बैंकों के लिए नई मुसीबत आन खड़ी हुई.

किंगफिशर के शेयरों का आखिरी बार कारोबार 22 जून 2015 को हुआ था. उस वक्त एक शेयर की कीमत 1.36 रुपए थी. बैंक अभी भी अपना पैसे वापस लेने के लिए अदालत में लड़ाई लड़ रहे हैं. वही किंगफिशर के मालिक विजय माल्या लंदन जाकर बैंकों के खिलाफ कानूनी लड़ाई छेड़े हुए है. इस बात की उम्मीद कम ही है कि बैंकों को उनका पैसा मिलेगा.

माल्या का मामला तो सिर्फ एक है. ऐसे ही कर्ज वापस न करने के कई केस हैं. इनमें से कम से कम एक दर्जन मामले एनसीएलटी में दिवालिया घोषित होने का इंतजार कर रहे हैं. हर केस में बैंक को लापरवाही की कीमत चुकानी पड़ी है. ताजा मामला रोटोमैक को दिए गए लोन का है. मोटे अनुमान के मुताबिक इस फर्जीवाड़े में बैंकों ने 3700 करोड़ रुपए गंवाए हैं. रोटोमैक के मामले में भी बैंकों ने कार्रवाई में देर की. रोटोमैक के मालिक विक्रम कोठारी को दिए कर्ज को बैंक ऑफ बड़ौदा ने अक्टूबर 2015 में ही एनपीए घोषित कर दिया था. इस कर्ज में फर्जीवाड़ा हुआ है, ये बात भी बैंक ऑफ बड़ौदा ने दिसंबर 2017 में मानी थी. लेकिन बैंक ने इस घोटाले की शिकायत जांच एजेंसियों से तब की, जब नीरव मोदी का घोटाला सामने आया.

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नीरव मोदी के केस में भी चेतावनी के संकेत काफी समय से आ रहे थे. मगर किसी ने उन्हें गंभीरता से नहीं लिया. संडे गार्जियन की रिपोर्ट के मुताबिक मुंबई के हीरा कारोबारियों को मालूम था कि मेहुल और नीरव का कारोबार चौपट हो रहा है. लेकिन बैंक के अधिकारियों को ही खबर नहीं थी.

भारत के बैंकों में इतने घोटाले हो रहे हैं कि इन्हें रोकने और निगरानी का सिस्टम पूरी तरह से नाकाम हो गया लगता है. 1 जनवरी 2015 से 31 मार्च 2017 के बीच सरकारी बैंकों के 5200 अधिकारियों के खिलाफ फर्जीवाड़े करने को लेकर कार्रवाई की गई . टाइम्स ऑफ इंडिया की ये रिपोर्ट रिजर्व बैंक के आंकड़ों पर आधारित है. पंजाब नेशनल बैंक में ही इस दौरान 184 अधिकारियों को फर्जीवाड़े के लिए गिरफ्तार किया गया.

Nirav Modi-PNB fraud case

चौंकाने वाली बात ये है कि भारत के बैंकों में भी ऐसे फर्जीवाड़ों की रोकथाम के लिए वही नियम-कायदे हैं जो किसी भी दूसरे देश में हैं. फिर चाहे निगरानी का सिस्टम हो, ऑडिट हो या अंदरूनी जांच पड़ताल. लेकिन, बैंकों में हो रहे घोटालों से साफ है कि ये सारा सिस्टम नाकाम हो गया है. कोई भी निगरानी बैंकों में घोटाले रोक नहीं सकी है. साफ है कि बैंकों में इंकलाबी बदलाव की जरूरत है.

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