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स्मार्ट सिटी प्लान: क्या पूरा हो पाएगा यह सपना!

आंकड़ों के मुताबिक, स्मार्ट सिटी के लिए आवंटित 80 फीसदी फंड सिर्फ 3 फीसदी एरिया का विकास होगा

Updated On: Jun 15, 2017 07:43 AM IST

Pratima Sharma Pratima Sharma
सीनियर न्यूज एडिटर, फ़र्स्टपोस्ट हिंदी

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स्मार्ट सिटी प्लान: क्या पूरा हो पाएगा यह सपना!

नरेंद्र मोदी की अगुवाई में जब 2014 में एनडीए की सरकार आई तो उसकी सबसे महत्वाकांक्षी योजनाओं में एक स्मार्ट सिटी भी थी. सरकार ने देश भर में 100 स्मार्ट सिटी बनाने का वादा किया था. स्मार्ट सिटी के नाम पर सरकार ने ऐसा सपना दिखाया, जो अब हकीकत के पत्थर से टूट चुका है.

इंडियन एक्सप्रेस में छपी खबर के मुताबिक एक दिलचस्प आंकड़ा सरकार की इस पहल की पोल खोल रहा है. सरकार का 80 फीसदी फंड सिर्फ 2.7 फीसदी एरिया के विकास पर खर्च हो जाएगा. बाकी इलाके का क्या होगा? जाहिर सी बात है कि बाकी इलाके की हालत जस की तस रहेगी या फिर बद्तर हो जाएगी.

आसान शब्दों में कहे तो हर शहर में एक हिस्सा लुटियन जोन होगा और बाकी हिस्सा पूर्वी दिल्ली की तरह होगा. स्मार्ट सिटी की सबसे बड़ी खामी यही होगी कि इसमें पूरे शहर को नहीं बल्कि शहर के एक हिस्से को तरजीह दी जाती है.

शहरी विकास मंत्री वेंकैया नायडू ने कहा था कि इस मिशन के लिए सरकार स्मार्ट सिटी के लिए चुने गए हर शहर को 10 अरब रुपए देगी. सरकार ने हर शहर के लिए 10 अरब रुपए का आवंटन करने का फैसला किया है. इसमें से 5 अरब रुपए केंद्र सरकार और 5 अरब रुपए राज्य सरकार की तरफ से दिए जाएंगे. इसके लिए सरकार ने खासतौर पर कॉम्पिटिशन के आधार पर शहरों का चुनाव किया है.

smart city

स्मार्ट सिटी के नाम पर विकास के झुनझुने का सच

2011 में हुई जनगणना के मुताबिक, देश की 31 फीसदी आबादी शहरों में रहती है. यह 2001 की जनगणना के मुकाबले तीन फीसदा से कुछ ज्यादा है. आंकड़ों के लिहाज से देखें तो देश में 37.7 करोड़ आबादी शहरों में रहती है. इतनी बड़ी आबादी के लिए शहरों में रहने का इंतजाम करना सरकार के लिए बड़ी चुनौती है. ऐसे में स्मार्ट सिटी के नाम पर आवंटित फंड में से 80 फीसदी का इस्तेमाल सिर्फ 2.7 फीसदी एरिया के विकास पर करना वहां के लोगों के साथ वादाखिलाफी है.

शहरी विकास मंत्रालय के आंकड़ों के मुताबिक, सरकार ने 2015 से 2020 के बीच 59 स्मार्ट सिटी पर खर्च करने के लिए 1.31 लाख करोड़ रुपए का प्रस्ताव रखा है. इसमें से 1.05 लाख करोड़ रुपए का इस्तेमाल क्षेत्र आधारित विकास (एरिया बेस्ड डिवेलपमेंट) पर होगा.

इस हिसाब से सरकार स्मार्ट सिटी के नाम पर शहर के कुछ चुनिंदा इलाकों को विकसित करेगी. यानी जो शहर स्मार्ट सिटी होंगे वहां पूरे शहर का विकास नहीं करेगी. वह कुछ ही इलाकों में वाईफाई हॉट्सपॉट्स, सेंसर बेस्ड पब्लिक लाइटिंग, सड़कों का नए सिरे से निर्माण, स्टार्टअप्स को बढ़ावा देने वाले जोन जैसे आईटी एवं इंफ्रास्ट्रक्चर प्रोजेक्ट्स बनाए जाएंगे.

एक हिस्सा तो क्योटो बाकी हिस्से का क्या?

स्मार्ट सिटी की रैंकिंग में दूसरे नंबर पर पुणे है. यहां के लिए 2870 करोड़ रुपए आवंटित है. इसमें से 76 फीसदी यानी 2196 करोड़ रुपए 3.6 किलोमीटर के विकास में खर्च होगा. यह इलाका औंध-बनेर-बलेवाड़ी का है. इसी तरह जबलपुर, विशाखापट्नम और इंदौर जैसे शहरों में 90 फीसदी फंड का इस्तेमाल तीन फीसदी से भी कम इलाके को विकसित करने पर खर्च होगा.

सरकार के इस स्मार्ट सिटी प्लान के हिसाब से बनारस के घाट जापान के क्योटो की तरह खूबसूरत बनेंगे और शहर में गंदगी बरकरार रहेगी. स्मार्ट सिटी प्लान की एक बड़ी खामी यह है कि इसमें लोकल बॉडीज का रोल खत्म हो जाएगा. सरकार इस योजना पर जिस तरह से आगे बढ़ रही है उससे यह साफ है कि इसका नतीजा ढाक के तीन पात ही होना है.

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