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जनऔषधि केंद्रों तक नहीं पहुंच रही दवाइयां, अब ऐप से मिलेगी मदद!

प्रधानमंत्री भारतीय जनऔषधि परियोजना के सीईओ सचिन कुमार सिंह आपूर्ति की समस्या को स्वीकार करते हुए कहते हैं कि इसे अगले दो महीनों में पूरी तरह ठीक कर लिया जाएगा.

Ashutosh Kumar Singh Updated On: Aug 04, 2018 09:35 AM IST

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जनऔषधि केंद्रों तक नहीं पहुंच रही दवाइयां, अब ऐप से मिलेगी मदद!

गरीबों को सस्ती दवा मिले, यही सोच कर प्रधानमंत्री भारतीय जनऔषधि केंद्र बहुत ही तेजी से खोले जा रहे हैं. इस योजना की तारीफ देश के प्रधानमंत्री पिछले कई आयोजनों में कर चुके हैं. ट्विटर और फेसबुक पर इस योजना का प्रचार-प्रसार भी खूब किया जा रहा है. लेकिन सच यह है कि जनऔषधि की दवाइयां इन केंद्रों तक पहुंच ही नहीं पा रही हैं.

मांग 100 प्रकार की दवा की है तो आपूर्ति 30-35 की हो पा रही है. ऐसे में देश भर के जनऔषधि संचालक परेशान और बेबस नजर आ रहे हैं. पिछले महीने ही देश के प्रधानमंत्री उत्तर-प्रदेश में एक साथ 100 से ज्यादा जनऔषधि केंद्रों का उद्घाटन कर के आए हैं. उसी उत्तरप्रदेश में एक जिला है लखीमपुर-खीरी. यहां के जिला अस्पताल में सुमित कुमार राय ने प्रधानमंत्री भारतीय जनऔषधि परियोजना के अंतर्गत अपनी दुकान खोली है.

उनका कहना है कि उनकी दुकान में महज 40 प्रकार की ही जनऔषधि उपलब्ध हैं. कैल्शियम और आयरन जैसी रोजाना प्रयोग में लाई जाने वाली टैबलेट, ऑर्डर देने के बाद भी उपलब्ध नहीं हो पाई है. इस कारण उन्हें अस्पताल के चिकित्सकों से बुरा-भला सुनना पड़ रहा है. उनका कहना है कि जब नींव ही कमजोर पड़ेगी तो आगे की बिल्डिंग का अंदाजा खुद ही लगाया जा सकता है. यूपी के लखनऊ में गोमती नगर इलाके में आलोक कुमार ने जनऔषधि की दुकान खोली है. यहां पर राममनोहर लोहिया जैसे बड़े अस्पताल हैं.

आलोक कहते हैं कि अभी उनके पास 200-250 प्रकार की जनऔषधि उपलब्ध है लेकिन यह पर्याप्त नहीं है. यहां पर प्रत्येक दिन 4000 से ज्यादा ओपीडी मरीज हैं. मांग के हिसाब से आपूर्ति कम है. इसी तरह जम्मू-कश्मीर के लेह में फार्मासिस्ट डोलमा ने भी जनऔषधि की दुकान खोली हैं. उन्होंने 100 दवाइयों का ऑर्डर किया था लेकिन उन्हें महज 32 दवाइयां उपलब्ध कराई जा सकी हैं.

कश्मीर के ही अनंतनाग में नाजीर अहमद भट की अपनी अलग कहानी है. 5 लाख रुपए खर्च कर के जनऔषधि की दुकान उन्होंने खोली है. उनका भी दर्द यही है कि उन्हें समय से दवाई नहीं मिल पा रही है. नाजीर अहमद ने अपनी नाखुशी का इजहार करते हुए अपने यहां आए एक मरीज से भी बात कराई. मरीज का कहना था कि वह एक महीने से आ रहा है लेकिन जो दवाईयां उसे चाहिए वह दुबारा यहां से नहीं मिल पाई हैं.

डॉक्टर नहीं लिखते जनऔषधि, सरकार नहीं कर रही प्रयास 

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पश्चिम बंगाल के भूटान सीमा से लगे अलीपुरद्वार में कृष्णा गिरी हों या नाडिया के सुब्रत कुमार मित्रा, इनकी सबसे बड़ी समस्या यह है कि चिकित्सक जनऔषधि नहीं लिखते हैं और न ही बीपीपीआई का कोई प्रतिनिधि चिकित्सक से मिलता है. कृष्णा गिरी कहते हैं कि अगर सरकार उन्हें प्रचार मैटेरियल भी उपलब्ध करा देती तो वे अपने क्षेत्र में इसका प्रचार-प्रसार करते लेकिन ऐसा भी सरकार की ओर से नहीं किया जा रहा है.

बिहार के सीवान जिला के चैनपुर में अपनी दुकान चला रहे चंदन कुमार दुबे का कहना है कि दो महीने बाद जनऔषधि की दवाई दो दिन पहले आई है. वह भी 42 प्रकार की जगह 17 दवाइयां ही आ पाई हैं. इतना ही नहीं श्री दुबे को पिछले एक साल से इंसेटिव भी नहीं मिला है. इसको लेकर वे पटना से लेकर दिल्ली तक कई मेल कर चुके हैं लेकिन कोई सुनने वाला नहीं है.

इसी तरह बिहार के सारण जिला के इसवापुर प्रखंड में जनऔषधि की दुकान चला रहे राकेश कुमार सिंह का कहना है कि जून 2017 से दुकान चला रहा हूं लेकिन सरकारी चिकित्सकों का सहयोग नहीं मिल पा रहा है. हालांकि गुजरात कच्छ के सुब्रतो दास, अहमदाबाद के सचिन जी भाई और सूरत के महेंद्र एन पटेल की स्थिति संतोषजनक थी. उन्हें सप्लाई चेन में कोई कमी नजर नहीं आई. उन तक जनऔषधि की दवाइयां समय से पहुंच रही हैं.

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प्रधानमंत्री भारतीय जनऔषधि परियोजना के सीईओ सचिन कुमार सिंह आपूर्ति की समस्या को स्वीकार करते हुए कहते हैं कि इसे अगले दो महीनों में पूरी तरह ठीक कर लिया जाएगा. हम अपनी आपूर्ति को बढ़ाने में सबसे ज्यादा फोकस कर रहे हैं. वर्तमान समय में हमारा सिस्टम एसएपी आधारित है.

सप्लाई और ऑर्डर की ऑनलाइन ट्रैकिंग होती है. वेयर हाउस 50 हजार वर्ग फुट में बना है और यह टेंपरेचर कंट्रोल वेयर हाउस है. डब्लूएचओ के मानकों के आधार पर बनाया गया है. यहां पर दवाइयों का संरक्षण और भंडारण विश्व स्वास्थ्य संगठन के मानकों के अनुसार होता है.

ऐप के जरिए नजदीकी स्टोर और  उपलब्ध दवाइयों की मिलेगी जानकारी

प्रतीकात्मक तस्वीर

 

सीईओ ने कहा कि हम जनता के लिए भी एक ऐप लेकर आ रहे हैं, जिससे नजदीकी स्टोर और उसमें उपलब्ध दवाइयों के बारे में जानकारी प्राप्त हो सकेगी. इस तरह के हम बहुत स्टेप ले रहे हैं और हमें उम्मीद ही नहीं पूर्ण विश्वास है कि अगले दो महीनों में बीपीपीआई दवा सप्लाई की समस्या का समाधान करने में सफल रहेगी.

सिंह ने आगे कहा कि, जो स्टोर खुल चुके हैं उन्हें कामर्शियल वायबल बनाना भी हमारी प्राथमिकता है. स्टोर संचालकों की आमदनी इतनी हो सके कि वे अपने स्टोर को सार्थक तरीके से चला सकें. इससे और दोगुने जोश के साथ वे इस परियोजना को सफल बनाने में लगेंगे. इसके लिए हमने अपने सभी मार्केटिंग अधिकारियों को कहा है कि वे स्टोर्स की सेल बढ़ाने में सहयोग करें.

वे चिकित्सकों के पास जाएं. उन्हें जनऔषधि के फायदे के बारे में बताएं. उन्हें यह सुनिश्चित करें कि जनऔषधि की दवाइयां गुणवत्तायुक्त और सस्ती हैं. इतना ही नहीं वे जनता के बीच में भी जाएं, आम लोगों को भी जनऔषधि की उपलब्धता और इसके फायदे के बारे में बताएं. साथ ही स्टोर की कोई भी समस्या हो तो उसे समझें और उसका फौरन समाधान निकालने की कोशिश करें और इसकी जानकारी बीपीपीआई मैनेजमेंट को भी दें.

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सरकार चाहे जितनी बातें कर लें, आश्वासन दे दे, प्रधानमंत्री अलग-अलग मंचों से जनऔषधि की तारीफ कर दें, लेकिन सबसे बड़ा यक्ष प्रश्न जनऔषधि केंद्रों पर दवाई की उपलब्धता का ही है.अगर ऐसा नहीं हो पाता है तो गरीबों को सस्ती दवाइयां उपलब्ध कराने का पीएम का सपना पूरा कैसे होगा?

अगर सच में पीएम और बीजेपी इस योजना को लेकर गंभीर है तो उसे दवाइयों की आपूर्ति की समस्या का समाधान युद्ध स्तर पर ढूंढना चाहिए और जरूरत हो तो मौजूदा सिस्टम को पूरी तरह से री-स्ट्रकचर करना चाहिए, नहीं तो लोगों तक सस्ती दवाइयां पहुंचाने का प्रधानमंत्री का सपना सोशल मीडिया तक ही सिमट कर रह जाएगा.

(लेखक स्वतंत्र पत्रकार हैं)

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