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लालबत्ती हटाने से नहीं दिमाग की बत्ती जलाने से जाएगा वीआईपी कल्चर

हमारे समाज के जहन में कुछ लोगों के खास होने का खयाल गहरे बैठा है

Updated On: May 02, 2017 03:04 PM IST

Akshaya Mishra

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लालबत्ती हटाने से नहीं दिमाग की बत्ती जलाने से जाएगा वीआईपी कल्चर

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने बिल्कुल सही कहा. सिर्फ लालबत्ती पर रोक लगाने से 'वीआईपी कल्चर' खत्म नहीं होगा.

यकीन जानिए, ये 'वीआईपी कल्चर' इतनी आसानी से जाने वाला नहीं. इसकी वजह सिर्फ ये नहीं कि खुद को औरों से एक दर्जा ऊपर मानने वाले लोग अपना स्टेटस दिखाते हुए चलना चाहते हैं. इसकी बड़ी वजह ये है कि हमारे समाज के जहन में कुछ लोगों के खास होने का खयाल गहरे बैठा है. ये खयाल इतनी मजबूती से हमारे दिमाग में डेरा जमाए हुए है कि अगर कोई वीआईपी नहीं होगा, तो हम खुद के लिए वीआईपी गढ़ लेंगे.

ठीक वैसे ही, जैसे हमने कोई भगवान या खुदा हो न हो, उसका तसव्वुर गढ़कर उसकी पूजा शुरू कर दी. जैसे भगवान या खुदा के बगैर हमारा काम नहीं चल सकता. ठीक उसी तरह बगैर वीआईपी के हमारा समाज काम नहीं चला सकता.

प्रधानमंत्री ये बिल्कुल कह सकते हैं कि देश का हर इंसान अहम है. 'वीआईपी कल्चर' कल्चर और लाल बत्ती सिर्फ गाड़ियों से नहीं, लोगों के जहन से भी हटनी चाहिए. मगर हकीकत में ये कैसे होगा. हम इस बात को लागू कैसे करेंगे, ये कहना मुश्किल है. कोई विधायक-सांसद कोई अफसर या पुलिसवाला हमेशा की तरह फिर भी खास बना रहेगा. फिर उसकी गाड़ी में लाल बत्ती लगी हो या नहीं. उनके साथ अलग बर्ताव का होना भी तो एक तरह से लाल बत्ती का लगाना ही है.

ये हमारी परवरिश और माहौल का नतीजा है. हम तमाम ओहदों को, अधिकारियों को सत्ता और ताकत का केंद्र मानते आए हैं. इन्हें हम जनता के सेवक मानते ही नहीं. कोई आदमी किसी ओहदे पर है, तो उसकी अहमियत उसकी काबिलियत से नहीं, बल्कि उसके ओहदे से मापी जाती है. उसे कितनी तनख्वाह मिलती है? उसके पास कौन से अधिकार हैं? किस गाड़ी से चलता है? कितने सुरक्षाकर्मी हैं? इन पैमानों पर कस कर लोगों को ऊंचे या नीचे के दर्जे का माना जाता है.

हम ये नहीं देखते कि वो उस ओहदे पर बैठकर कैसा काम कर रहा है? ये पता नहीं लगाते कि वो ईमानदारी और जिम्मेदारी से काम कर रहा है या नहीं. वो खुलेआम अपनी ताकत का मुजाहिरा करता है, तो वो उतना ही बड़ा साहब बन जाता है.

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यही वजह है कि बाबू लोग फाइलों के साथ तानाशाही रवैया अपनाते हैं. छोटे अधिकारी और कर्मचारी भी जनता से बदसलूकी करते हैं. उनकी इज्जत नहीं करते. कुर्सी पर बैठकर उन्हें लगता है कि वो तो बादशाह हैं, बाकी सब प्रजा. इसी नीयत और बर्ताव से भ्रष्टाचार पनपता है. ताकत और ओहदे का दुरुपयोग होता है. और ये सिर्फ सरकारी संस्थानों में होता हो, ऐसा नहीं है.

निजी कंपनियों में भी ओहदेदारी और 'वीआईपी कल्चर' की भरमार है. किसी खास ओहदे पर बैठे इंसान की चापलूसी की लोग तमाम हदें पार कर देते हैं. वो शख्स भी अपने पद की खुली नुमाइश और बेजा इस्तेमाल करता है.

असल में हमारे समाज में इंसान नहीं, ओहदा ही ऊंचे या नीचे के दर्जे का होने का पैमाना है. आम और खास के बीच ओहदे का ही तो फर्क माना जाता है. किसी ऊंची पायदान पर पहुंचना बहुत बड़ी उपलब्धि माना जाता है. क्योंकि उस खास मुकाम पर पहुंचने पर ढेर सारे अधिकार, बहुत सी सुविधाएं जो मिलती हैं. हम उसके आगे सोच ही नहीं पाते. इसीलिए किसी ओहदे पर बैठे शख्स के काम से उसके बारे में बर्ताव तय नहीं होता. वो बस किसी तरह से ऊंचे पद पर पहुंच जाए. बस फिर तो उसकी बल्ले-बल्ले. फिर वो काम करे न करे, फर्क नहीं पड़ता.

तभी तो खास लोग ये चाहने लगते हैं कि वो जहां से गुजरें, लोग उन्हें जानें-पहचानें. उनकी अहमियत को सलाम करें. ऐसा जाहिर करने के लिए लाल बत्ती तो सिर्फ एक जरिया है.

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एक आम हिंदुस्तानी, खास है और उसे ऐसा महसूस करने का पूरा अधिकार है. लेकिन हम अपने समाज की सोच कैसे बदलें? ये आसान नहीं है. प्रधानमंत्री अगर वाकई ऐसा चाहते हैं, तो उन्हें खुद को खास समझने वाले लोगों को मिलने वाली कुछ सुविधाएं वापस ले लेनी चाहिए.

शुरुआत अधिकारियों के घरों पर मातहतों की तैनाती खत्म करने से होनी चाहिए. आखिर इन अफसरों को घर पर इतनी सुविधाएं क्यों चाहिए? कुछ स्तरों पर तो ये हो रहा है. मगर बड़े अफसरों के घर पर सरकारी कर्मचारियों की तैनाती पूरी तरह से खत्म होनी चाहिए. निजी काम के लिए सरकारी गाड़ी के इस्तेमाल पर भी रोक लगनी चाहिए. अफसरों को मिलने वाले बड़े-बड़े सरकारी आवास की सुविधा भी खत्म होनी चाहिए. जब वो निजी तौर पर किसी समारोह में जाएं, तो उनके लिए खास इंतजाम का चलन भी खत्म होना चाहिए.

ऐसे लोगों को सुरक्षा देने का चलन बंद होना चाहिए, जो इसके हकदार नहीं. सुरक्षाकर्मी भी स्टेटस सिंबल बन गए हैं. बहुत से लोगों को इसकी जरूरत नहीं होती. वो खाली अपने खास दर्जे को दिखाने के लिए सुरक्षाकर्मी चाहते हैं. उनकी नुमाइश करते चलते हैं.

प्रधानमंत्रीजी, आप बस ये कुछ सुविधाएं वापस ले लीजिए. 'वीआईपी कल्चर' का गुरूर हवा में उड़ जाएगा. इससे आम लोग भी इन वीआईपी से नहीं डरेंगे. इनके खास होने का एहसास समाज में कम होगा.

PM-Modi

फिर अगर प्रधानमंत्री आम लोगों को खास महसूस कराना चाहते हैं, तो उन्हें जनता को ये अधिकार देना होगा कि वो अधिकारियों और ऊंचे पदों पर बैठे नेताओं से सवाल कर सकें. उन्हें जवाब देने को मजबूर कर सकें. अधिकारियों और नेताओं को जनता के प्रति जवाबदेह बनाना होगा. इससे इन ओहदेदारों का खुद को खास समझने का घमंड कम होगा. जनता को भी खास होने का एहसास होगा.

यूं तो पूरी की पूरी आधिकारिक प्रक्रिया ही डरावनी होती है. कई बार तो सरकारी दफ्तरों का काम इतना पेचीदा होता है कि आम आदमी वहां जाने से भी घबराता है. इसमें बड़ा योगदान सरकारी कर्मचारियों और ओहदेदारों का है. सरकारी काम-काज को सरल बनाकर प्रधानमंत्री आम लोगों के जहन से सरकार का डर निकाल सकते हैं.

लाल बत्ती हटाना एक अच्छी शुरुआत है. लेकिन इससे होगा कुछ नहीं. 'वीआईपी कल्चर' पर हमला ताकतवर होना चाहिए. इसकी नसें काटनी होंगी. इसकी जड़ पर हमला करना होगा. शुरुआत इसकी मानसिकता पर चोट से होनी चाहिए.

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