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रेलवे की मुश्किलों से कैसे लोहा लेंगे अश्विनी लोहानी?

सुरेश प्रभु ने पीएम मोदी से मिल कर हादसों की नैतिक जिम्मेदारी ले ली है

Ravishankar Singh Ravishankar Singh Updated On: Aug 23, 2017 09:37 PM IST

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रेलवे की मुश्किलों से कैसे लोहा लेंगे अश्विनी लोहानी?

रेलवे की बिगड़ती हालात को सुधारने का जिम्मा अब पीएम मोदी ने खुद अपने हाथ में ले लिया है. पिछले एक साल में देश में 24 बड़ी रेल दुर्घटनाएं हुई हैं. पिछले पांच दिनों में लगातार दो रेल दुर्घटनाओं ने सरकार को जगा दिया है. लगातार हो रही दुर्घटनाओं से तंग आकर मोदी सरकार ने कई कड़े फैसले लिए हैं.

कई अधिकारियों पर गाज गिरने लगी है और ये भी कयास लगाए जा रहे हैं कि अगले कुछ दिनों में रेलवे के कई और अधिकारियों पर गाज गिरेगी. भारतीय रेल में अगले कुछ दिनों में कई उलट-फेर देखने को मिल सकते हैं.

रेलवे को दुरुस्त करने के लिए कई स्तर पर कदम उठाए जाने की बात की जा रही है. रेलवे के सिस्टम पर उठ रहे सवाल पर सरकार ने कई सख्त कदम भी उठाए हैं. भारतीय रेल को पटरी पर लाने के लिए सरकार अगले कुछ साल में तकरीबन 2 लाख नौकरी देने की बात कर रही है. फिलहाल रेलवे में सुरक्षा तंत्र से जुड़े तकरीबन 16 फीसदी पोस्ट खाली हैं.

भारतीय रेल इस समय 64 हजार किलोमीटर के ऑपरेशनल नेटवर्क पर दौड़ रही है. इसके निगरानी और मेनटेनेंस के लिए लोग काफी कम पड़ रहे हैं. भारतीय रेल दुनिया के सबसे बड़े रेल नेटवर्क है और फिलहाल उसके पास 13 लाख कर्मचारी हैं.

रेलवे आज भी घिसी-पिटी तकनीक के सहारे

उत्तर प्रदेश में कलिंग उत्कल एक्सप्रेस के पटरी पर से उतरने के बाद रेलवे नेटवर्क के मेंटेनेंस को लेकर सवाल उठ रहे हैं. रही-सही कसर कैफियत एक्सप्रेस ने पूरी कर दी है.

Muzaffarnagar: A mangled coach being hauled off the tracks by a crane on Sunday at the accident site where the Puri-Haridwar Utkal Express train derailed in Khatauli near Muzaffarnagar on Saturday. PTI Photo by Shahbaz Khan (Story DES18) (PTI8_22_2017_000082B)

रेलवे की यह दुर्दशा आज की देन नहीं हैं. इस हालत के लिए कहीं न कहीं रेलवे की घिसी-पिटी पुरानी तकनीक और सिस्टम को भी जिम्मेदार ठहराया जा रहा है. भारतीय रेल में सफर करने वाले आम मुसाफिर पिछले एक-दो सालों से ट्रेन में सफर करने से कतराने लगे हैं. खासकर कानपुर डिविजन की पटरियों पर पिछले कुछ सालों में सबसे ज्यादा ट्रेन दुर्घटनाएं हुई हैं.

रेल मंत्री सुरेश प्रभु के लगभग 3 साल के कार्यकाल में करीब 650 लोग रेल हादसों में मौत को गले लगा चुके हैं. पिछले कुछ सालों में छोटे-बड़े दुर्घटनाओं को मिला दें तो तकरीबन 115 ट्रेन दुर्घटनाएं हुई हैं. रेल सुरक्षा पर बड़े-बड़े दावों के बाद भी मुसाफिरों की जान भारतीय रेल में अब भी सुरक्षित नहीं है.

इससे पहले लालू प्रसाद यादव के रेल मंत्री रहते साल 2004-05 से 2006-07 तक 663 रेल हादसे हुए थे जिनमें 759 लोगों की मौत हुई थी. हर रेल दुर्घटना के बाद रेलवे के द्वारा विशेष इंतजाम करने की बात की जाती है. रेलवे में खाली पड़े पदों को भरने से लेकर सुरक्षा तंत्र और पेट्रोलिंग को भी मजबूत बनाने की बात होने लगती है.

रेलवे बोर्ड के पूर्व चेयरमैन आर एन मल्होत्रा फ़र्स्टपोस्ट हिंदी से बात करते हुए कहते हैं, 'रेलवे में काम करने वाले लोगों के लिए जैसे-जैसे साल बीत रहा है, काम करना कठिन होता जा रहा है. इंफ्रास्ट्रक्चर उतना बढ़ नहीं रहा है. मेनटेनेंस का पूरा टाइम नहीं मिल पाता.'

मेनटेनेंस नहीं होने के कारण हादसे बढ़ रहे हैं. गाड़ियों को ब्लॉक नहीं कर सकते. अगर कर्मचारी कहते हैं कि किसी रूट का रिपेयर करना जरूरी है तो उसको चार्जशीट दे जाती है. अगर ट्रेन को डिले किया जाता है तो कंट्रोलर को चार्जशीट मिल जाती है. लोग जब प्रेशर में जब काम करते हैं तो गलती करते हैं.’

रेलवे बोर्ड के पूर्व चेयरमैन आरएन मल्होत्रा ने आगे कहते हैं, ‘जब नीतीश कुमार रेल मंत्री थे और मैं रेलवे बोर्ड का चेयरमैन था, तो पहली बार हम लोगों ने 17 हजार करोड़ रुपए का सेफ्टी फंड अटल जी से मंजूर करवाया था. इस फंड का इस्तेमाल हम लोग सिग्नल सिस्टम और रेलवे लाइनों को दुरुस्त करने के लिए करते थे. लेकिन, 2007-2008 तक ये पैसा खत्म हो गया.'

A Railway Police personnel peeps out from the door of a special passenger train at a railway station in Chandigarh

रेलवे सेफ्टी फंड 6 महीने तक जारी नहीं हुआ

साल 2016 के रेल बजट में रेलवे सेफ्टी फंड में एक लाख 31 हजार करोड़ रुपए की रकम आवंटित करने की बात कही गई थी जो कि पिछले छह महीने तक जारी नहीं की गई थी.

मोदी सरकार द्वारा आवंटित यह रकम पहले की किसी भी सरकार के आवंटित रकम से ज्यादा है. इसके साथ ही रेलवे आने वाले दिनों में ज्यादातर भर्ती, सेफ्टी और मेनटेनेंस में करेगी. गैंगमैन, पटरियों पर नजर रखने वाले और इसे ठीक करने वाले मैन्युअल लेबर को इंटरनैशनल स्टैंडर्ड्स के हिसाब से प्रशिक्षित किया जाएगा.

रेलवे ट्रैक की निगरानी के लिए 100 से ज्यादा इंस्पेक्शन व्हीकल भी खरीदने पर विचार कर रहा है. पटरियों में दरार के बारे में अडवांस में जानकारी देने वाली सेंसर टेक्नोलॉजी का पायलट रन भी होगा.

रेलवे मामले के जानकार कहते हैं कि रेलवे को पटरी पर लाने के लिए तीन-चार काम प्राथमिकता के तौर पर करनी पड़ेगी. पहला, इंफ्रास्ट्रक्चर को सुधारने की स्पीड बढ़नी चाहिए. रेलवे के खाली पदों को भरा जाए. ये दोनो काम करने के लिए पैसे चाहिए. इसके लिए भाड़े आपको बढ़ाने पड़ेंगे. इसके लिए राजनेताओं को कड़े कदम उठाने पड़ेंगे.

सुरेश प्रभु के कार्यकाल में 20 नवंबर, 2016 को कानपुर के पास एक बड़ा हादसा हुआ जब इंदौर-राजेन्द्र नगर एक्सप्रेस के पटरी से उतर जाने की वजह से 151 मुसाफिरों की जान चली गई.

उसके ठीक एक महीने के बाद 28 दिसंबर को कानपुर के पास ही रुरा में अजमेर-सियालदह एक्सप्रेस के 15 डब्बे पटरी से उतर गए. हालांकि बहुत बड़ा हादसा होने के बाद भी किस्मत से किसी मुसाफिर की जान नहीं गई. इस हादसे के बाद 29 दिसंबर, 2016 को ही रेलमंत्री सुरेश प्रभु ने रेलवे बोर्ड और सभी जोन के महाप्रबंधकों के साथ मीटिंग में साफ तौर पर कहा था, ‘मैं यहां छोटे से संदेश के साथ आया हूं. अगर आपसे हालात नहीं संभल रहे हैं तो हम दूसरे अधिकारियों की तलाश कर लेंगे.’

Kuneru: Rapid action force team performs rescue operations after Hirakhand Express had an accident near Kuneru station in Vizianagaram, Andra Pradesh on Sunday. PTI Photo(PTI1_22_2017_000019B)

लेकिन मंत्री के कड़े संदेश के बाद भी रेलवे में हालात नहीं बदले और उसके बाद भी पटरियों के टूटने के दर्जनों मामले सामने आए. लगातार हो रही रेल दुर्घटनाओं से किरकिरी होते देख रेल मंत्री सुरेश प्रभु ने नैतिक जिम्मेदारी लेते हुए पद से इस्तीफे की पेशकश की है. सुरेश प्रभु के ट्वीट्स से ये अंदाजा लग रहा है कि पीएम मोदी ने उन्हें इंतजार करने को कहा है.

देश में लगातार हो रही ट्रेन दुर्घटनाओं को देखते हुए रेलवे बोर्ड के चेयरमैन एके मित्तल ने अपने पद से इस्तीफा दे दिया है. एके मित्तल की जगह अब एयर इंडिया के सीएमडी अश्विनी लोहानी को बोर्ड का अगला चेयरमैन बनाया गया है. अब भारतीय रेल का भविष्य अश्विनी लोहानी के जिम्मे आ गया है. देखना यह है कि अश्विनी लोहानी किस तरह से रेलवे को इस मुसीबत से निकाल पाते हैं.

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