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यहां आरोपी को अपराधी साबित करना भाग्य भरोसे है!

साइबर अपराध मामलों में तो बच निकलने की संभावना 99 प्रतिशत तक है

Piyush Pandey Updated On: Dec 23, 2017 12:50 PM IST

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यहां आरोपी को अपराधी साबित करना भाग्य भरोसे है!

देश की सत्ता तक को पलट देने वाले टूजी घोटाले में कोई दोषी साबित नहीं हुआ और सभी 17 आरोपी बाइज्जत बरी हो गए. ऐसा इसलिए हुआ क्योंकि सीबीआई की 8000 पन्नों की चार्जशीट जरुर दाखिल की लेकिन सबूत एक भी कायदे का नहीं दिया.

आदर्श घोटाले में महाराष्ट्र के पूर्व मुख्यमंत्री अशोक चव्हाण के खिलाफ राज्यपाल ने सीबीआई को केस चलाने तक की इजाजत नहीं दी. हालांकि, फरवरी 2016 में राज्यपाल ने ही मंजूरी दी थी लेकिन अब उसे रद्द कर दिया. तो क्या माना जाए कि बीते डेढ़ साल में सीबीआई इतने सबूत इकट्ठे नहीं कर पाई कि राज्यपाल को आश्वस्त कर पाती कि अशोक चव्हाण के खिलाफ केस चलाया जा सके. यानी अशोक चव्हाण भी अब हर आरोप से मुक्त हैं.

लेकिन सवाल टूजी के 17 आरोपियों या अशोक चव्हाण का नहीं है. सवाल है कि इस देश में क्या आरोपित को अपराधी साबित करना भी भाग्य भरोसे है,क्योंकि देश का सिस्टम इतना लचर है कि आरोपियों को पकड़ा जरुर जाता है लेकिन दोषसिद्धी नहीं हो पाती. एनसीआरबी के आंकड़े कहते हैं कि देश में 2016 में अपराधियों को सजा की दर यानी कन्विक्शन रेट 48 फीसदी है लेकिन अलग अलग अपराधों के आइने में इस आंकड़े को पढ़ने की कोशिश करें तो दिखता है कि कई अपराधों में तो अपराधी सिर्फ छुट्टे घूमते हैं.

अपराध    सज़ा होने की दर

हत्या             38.5

हत्या की कोशिश    26.2

दहेज मौत          30.5

अपरहण            20.8

बलात्कार           25.5

दंगा               16.1

चोरी               35.5

फिरौती             18.5

लूट                31.3

डकैती              19.7

धोखाधड़ी            20.0

आगजनी            16.1

महिलाओं से अभद्रता  20.3

मसलन दंगा और आगजनी के मामलों में तो सिर्फ 16.1 फीसदी लोगों को ही सजा हो पाती है. हत्या जैसे संगीन मामले में भी सिर्फ 38.5 फीसदी लोगों को सजा हो पाती है. हत्या की कोशिश में सिर्फ 26.2 फीसदी लोगों को सजा हो पाती है. इन आंकड़ों को थोड़ा पलटकर देखें तो हत्या की कोशिश के मामले में करीब 75 फीसदी आरोपी छूट जाते हैं. दहेज मौत के मामलों में करीब 70 फीसदी आरोपी छूट जाते हैं. यही हाल अपहरण के मामलों में है.

इतना ही नहीं, जिस डिजिटल इंडिया के रथ पर सवार होकर देश आगे बढ़ रहा है, उस डिजिटल इंडिया में साइबर अपराध बीते पांच साल में लगभग दोगुने हो गए लेकिन 99 फीसदी साइबर क्रिमिनल छूट जाते हैं. साइबर क्राइम के मामलों में कन्विक्शन रेट 1 फीसदी से भी कम है. इतना ही नहीं, राजधानी दिल्ली तक में साइबर मामलों को सुने जाने की व्यवस्था नहीं है. कुछ दिनों पहले तक साइबर अपीलेट ट्रिब्यूनल में मामले सुने जाते थे, जिसे बाद में टेलीकॉम ट्रिब्यूनल के साथ विलय कर दिया गया. इस ट्रिब्यूनल का दफ्तर दिल्ली के पांच सितारा होटल सम्राट में है, जहां आम आदमी पहुंच नहीं सकता और इस दफ्तर में बीते छह महीने से किसी साइबर अपराध की सुनवाई नहीं हुई क्योंकि ट्रिब्यूनल के पास कोई साइबर एक्सपर्ट ही नहीं है.

तो क्या पुलिस अपराधियों को बिना प्राथमिक सबूतों के गिरफ्तार करती है या सिस्टम इतना लचर है कि अपराध साबित करने की उसकी कुव्वत ही नहीं है या देश के सिस्टम में घूसखोरी इस कदर घुस गई है कि हर अपराधी मामले की जांच के बीच खुद को निर्दोष साबित करने की व्यवस्था कर लेता है.

दरअसल, आरोपी को आपराधी साबित करने के बीच वर्षों की जांच, भ्रष्टाचार, नाकाबिल अधिकारी और सिस्टम के अपने पेच इतने गड्डमड्ड हो गए हैं कि अपराधी को सजा भाग्य के जरिए ही होती है. उदाहरण के लिए भ्रष्टाचार के मामलों में 81 फीसदी आरोपियों को सजा ही नहीं होती और वे फिर भ्रष्टाचार करने के लिए आजाद घूमते हैं. और सिस्टम काम कैसे करता है, इस जापान के उदाहरण से समझा जा सकता है, जहां कन्विक्शन रेट 99.48 फीसदी है.

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