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कितना सही है पेप्सी और कोका-कोला का विरोध?

क्षेत्रीय संरक्षणवाद की एक कमजोर कोशिश और मुक्त व्यापार की भावना के विपरीत है.

Updated On: Mar 03, 2017 08:51 AM IST

Sulekha Nair

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कितना सही है पेप्सी और कोका-कोला का विरोध?

तमिलानाडु में पेप्सी और कोका कोला का बहिष्कार करने का व्यापार संघों का फरमान शर्मनाक है. बहिष्कार की दलील यह है कि ये दोनों कंपनियां भूजल को दूषित कर रही हैं. दरअसल यह क्षेत्रीय संरक्षणवाद की एक कमजोर कोशिश है और मुक्त व्यापार अर्थव्यवस्थाओं की भावना के विपरीत है.

तमिलनाडु ट्रैडर्स फेडरेशन (टीएनटीएफ) और कंसोर्टियम ऑफ तमिलनाडु ट्रैडर्स एसोसिएशन (सीटीएनटीए) ने राज्य के व्यापारियों से कहा है कि वे एक मार्च से कोका कोला और पेप्सी बेचना छोड़ दें और उनकी जगह कालीमार्क, बोवोंटो और टोरिनो जैसे क्षेत्रीय ब्रैंड्स को आगे बढ़ाएं, जबकि ये ब्रैंड्स भी ‘हल्के से कार्बोनेटिड’ हैं.

मीडिया रिपोर्टों के अनुसार व्यापार संघों के लोग मुख्यमंत्री से मिलने की भी कोशिश में है ताकि बहुराष्ट्रीय ब्रैंड्स पर प्रतिबंध लगाने के लिए दबाव बना सकें. इन लोगों का दावा है कि इनका यह कदम जल्लीकट्टू विरोध प्रदर्शनों से भी प्रेरित है, जिन्हें राज्य की सांस्कृतिक आजादी के उभार के तौर पर देखा गया.

नुकसानदायक

बोवोंटो अब पूरे राज्य में उपलब्ध है जबकि टोरिनो तमिलनाडु के दक्षिणी इलाकों तक ही सीमित है.

सीटीएनटीए के अध्यक्ष एएम विक्रमा राजा कहते हैं, 'जब मांग होगी तो ब्रैंड के मालिक उसकी सप्लाई चेन को और मजबूत करेंगे और खुदरा व्यापारी उनसे माल लेंगे.'

व्यापार संघों की कोशिश है कि वे अपने साथ जुड़ी 20 लाख से ज्यादा दुकानों को इस बहिष्कार पर अमल करने के लिए मजबूर करें. और इसके लिए वे सेहत और पर्यावरण को कारण बता रहे हैं.

हालांकि व्यापारिक संघों के दावे सवालों के दायरे में हैं.

पर्यावरण के लिए काम करने वाले इस बात से सहमत है कि अगर कोई भी इस मुद्दे को उठाता है कि बहुराष्ट्रीय कंपनियां भूजल संसाधनों को नुकसान पहुंचा रही हैं, तो यह स्वागतयोग्य है और इसे सराहा जाना चाहिए. चेन्नई में रहने वाले पर्यावरण कार्यकर्ता नित्यानंद जयरमन कहते हैं, 'ये उद्योग हैं जो अपने काम के लिए भूजल इस्तेमाल करते हैं. यहां बात नैतिकता की है क्योंकि कोक और पेप्सी सेहत के लिए हानिकारक है.'

पर्यावरण कार्यकर्ताओं का कहना है कि पानी के बेतहाशा इस्तेमाल और उसके व्यावसायीकरण की बात होती है तो इस मामले में कोक और पेप्सी सबसे ऊपर मिलती हैं. ये कंपनियां अपने उत्पादों में मुख्य रूप से दो चीजें इस्तेमाल करती हैं- पानी और चीनी यानी शुगर.

भूजल संसाधनों का अत्यधिक इस्तेमाल और जहरीले कचरे को भूजल में डालना, यह फैक्ट्रियों के आसपास रहने वाले लोगों के लिए बहुत खतरनाक होता है. दूसरा, शुगर इस तरह के ड्रिंक्स में खूब इस्तेमाल होती है. सब जानते हैं कि यह खामोश हत्यारी है. सेहत पर पड़ने वाले इसके बुरे असर को लेकर खूब शोध और बहसें होती हैं.

फिर कैसे बदलेंगे हालात?

इस संदर्भ में देखें तो यह विडंबना है कि तमिलनाडु के व्यापारी संघ एक तरफ तो पेप्सी और कोक जैसे बड़े वैश्विक अंतरराष्ट्रीय ब्रैड्स का बहिष्कार कर रहे हैं, लेकिन दूसरी तरफ इनकी जगह देश में बने ऐसे ही ब्रैंड्स को लाने की बात हो रही हैं.

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जयरमन कहते हैं कि पेप्सी और कोक की जगह ‘हल्के से कार्बोनेडिट’ स्थानीय ब्रैड्स को लाने से भूजल संसाधनों के बेतहाशा इस्तेमाल का मुद्दा हल नहीं होगा. वह पूछते हैं, 'बहुराष्ट्रीय कंपनियों की जगह एक स्थानीय लुटेरे को लाने से भला कैसे स्थिति सुधरेगी.' वह कहते हैं कि यह सिर्फ बहुराष्ट्रीय कंपनी का स्थान स्थानीय कंपनियों को देना है जबकि वे भी भूजल का अंधाधुंध इस्तेमाल करेंगी.

वह याद दिलाते हैं कि तमिलनाडु कई बरसों से पानी की किल्लत झेल रहा है. उनके मुताबिक, 'पानी की किल्लत इतनी ज्यादा हो गई है कि हम पड़ोसी राज्यों को मारने के लिए भी तैयार बैठे हैं. दरअसल यह अजीब है कि ऐसे हालात में भी स्थानीय व्यापारी ऐसे स्थानीय विकल्प को आगे बढ़ा रहा है, जो खुद एक फिजी (बुदबुदाने वाला) ड्रिंक है.'

सेहत और अर्थव्यवस्था

सेहत के नजरिए से भी देखा जाए तो भी उनकी दलील नहीं टिकती. एक अन्य पर्यावरण कार्यकर्ता सीआर नीलाकंदन कहते हैं कि अगर व्यापारी कोक और पेप्सी की जगह नारियल पानी या छाछ को लाने को कहते तो उनकी बात कुछ सही लगती. नीलाकंदन ने केरल में हुए कई आंदोलनों में हिस्सा लिया है.

जैसा कि पर्यावरण कार्यकर्ताओं को संदेह है, अगर स्वास्थ्य और पर्यावरण को ढाल बनाकर शायद कोक और पेप्सी जितने ही खतरनाक स्थानीय ब्रैंड्स को प्रोत्साहित करने की कोशिश हो रही है तो यह क्षेत्रीय संरक्षणवाद की मिसाल होगी. एड गुरु पीयूष पांडे को इस कोशिश के नाकाम होने में कोई संदेह नहीं है. वह कहते हैं, “जोर जबरदस्ती आप कुछ हासिल नहीं कर सकते.”

पीयूष पांडे ओगिल्वी एंड माथर इंडिया के क्रिएटिव डायरेक्टर और ओ एंड एम एशिया पेसेफिक के वाइस चेयरमैन हैं. अभी तक तो उनकी कही बात सही साबित हो रही है क्योंकि सिर्फ 50 फीसदी व्यापारियों ने ही व्यापार संघों की बहिष्कार को माना है.

पांडे कहते हैं कि बहुराष्ट्रीय कंपनियां तभी आई हैं जब सरकार ने उन्हें एफडीआई नियमों के तहत यहां काम करने के लिए आने दिया है. वह पूछते हैं, 'फिर व्यापारी किस बात की शिकायत कर रहे हैं.'

इस तरह के कदम अर्थव्यवस्था को नुकसान पहुंचा सकते हैं, खास कर तब जब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी दुनिया भर को भारत में कारोबार करने के लिए आमंत्रित कर कर रहे हैं.

वह कहते हैं, 'यह सही नहीं है कि व्यापारी पक्षपाती तरीके से किसी को सामान बेचने से रोकें, जबकि दुकानदारों को उससे कोई दिक्कत नहीं है, खासकर तब तक, जब तब उससे किसी कानून का उल्लंघन न होता हो.'

लेकिन व्यापारी अपनी इस बात पर अड़े हैं कि ‘विदेशी ब्रैंड्स’ ज्यादा नुकसानदेह होते हैं.

डीएनए की एक रिपोर्ट के मुताबिक सीटीएनटीए के विक्रमा राजा कहते हैं, 'हम इनका विरोध सिर्फ इसलिए नहीं कर रहे हैं कि इन्हें बहुराष्ट्रीय कंपनियों ने बनाया है. बल्कि इसलिए कर रहे हैं क्योंकि इनसे शरीर को फायदे से ज्यादा नुकसान होते हैं. हमने इनमें मौजूद नुकसानदायक तत्वों के कारण इनका विरोध करने का फैसला लिया है.'

केरल का अनुभव

चेन्नई मे इस बायकॉट ने 2000 में केरल में हुए घटनाक्रम की याद दिला दी जब कोका कोला (इसकी भारतीय सहायक कंपनी हिंदुस्तान कोका-कोला बेवरेजिज के तहत) और पेप्सी के बोटलिंग प्लांट्स को भूजल संसाधनों को दूषित करने के लिए भारी आलोचना झेलनी पड़ी थी.

कोक का बोटलिंग प्लांट प्लाचीमाडा तालुका की पेरिमत्ती पंचायत में है जबकि पेप्सी का प्लांट कांजीकोड के पुदुसेरी पंचायत में है. दोनों प्लांटों पर भूजल का हद से ज्यादा इस्तेमाल करने और उसे दूषित करने के आरोप लगे. और यह भी कहा गया कि इससे इलाके के लोगों की रोजीरोटी पर असर पड़ा.

प्लाचीमाडा में स्थानीय लोगों ने कोका कोला के प्लांट के खिलाफ लंबा आंदोलना चलाया जिसके बाद सरकार ने 2006 में इस प्लांट को बंद करवा दिया. प्लांट पर यह भी आरोप लगे कि उसने अपने औद्योगिक कचरे को खाद बताकर किसानों को बेचा, जिसका इस्तेमाल उन्होंने नारियल और केले के पेड़ों की जड़ों में किया. वहां से यह कचरा कुओं में पहुंचा गया और वहां के पानी को इसने दूषित कर दिया. साथ ही इलाके के अन्य जलाशय भी दूषित हुए.

लेकिन पुदुसेरी में पेप्सी का प्लांट चलता रहा. नीलाकंदन के अनुसार, सरकार ने पेप्सी का प्लांट और इलाके में बीयर बनाने वाली यूनिटों को काम करते रहने दिया. वह बताते हैं कि प्लाचीमाडा में मिली जीत का कारण था पानी की गंभीर किल्लत के खिलाफ लोगों की एकजुटता जबकि औद्योगिक शहर पुदुसेरी में ऐसा नहीं हो पाया. वह बताते हैं कि वहां स्थानीय लोग एकजुट नहीं रह पाए.

खासकर प्लाचीमाडा तालुका और पलक्कड जिले में भूजल का स्तर बहुत ही नीचे चला गया है. इस इलाके में बहुत कम बारिश होती है और जलवायु परिवर्तन के कारण हालात और खराब होते जा रह हैं. नीलाकंदन कहते हैं कि मालमपुजा बांध का जो पानी बुनियादी तौर पर सिंचाई के लिए है, उसका इस्तेमाल पुदुसेरी में पेप्सी का प्लांट और बीयर बनाने वाली यूनिटें कर रही हैं. वह कहते हैं कि प्लाचीमाडा में भूजल संसाधनों को टिकाऊ बनाने में दो दशक या उससे भी ज्यादा समय लग सकता है, लेकिन इन्हें पहले वाले स्तर पर कभी नहीं लाया जा सकता.

प्लाचीमाडा के आंदोलन ने सेहत पर पड़ने वाले फिजी ड्रिंक्स के नुकसानों की तरफ सबका ध्यान दिलाया था. इसके बाद आने वाली सरकारों ने राज्य में नारियल पानी और नीरा को एक विकल्प के तौर पर आगे बढ़ाने के लिए अपने सुझाव दिए. लेकिन नीलाकंदन कहते हैं कि इनमें से किसी सुझाव पर कभी अमल नहीं हुआ.

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