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सेना दिवस: कहां गए वो ढोंगी राष्ट्रभक्त?

इन छद्म राष्ट्रवादियों को गौर से देखिए इनकी मीठी बातों और नकली आंसुओं से अलग भी इनका एक चेहरा है.

Updated On: Jan 15, 2017 09:13 AM IST

Sandipan Sharma Sandipan Sharma

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सेना दिवस: कहां गए वो ढोंगी राष्ट्रभक्त?

इस बात को ज्यादा समय नहीं हुआ जब देश में सेना के जवानों को लेकर भावुकता चरम पर थी. ‘राष्ट्रवादियों’ के लिए सेना के ये जवान बिल्कुल वैसे थे, जैसे 80-90 के दशक में हिंदुत्ववादियों के लिए भगवान राम हुआ करते थे.

हिंदुत्व ब्रिगेड नारे लगाती रही जो राम की बात करेगा वही देश की बात करेगा और उनके नेताओं ने समाज को दो हिस्सों में बांट दिया. एक वो जिनके लिए एक मंदिर हिंदू अस्मिता का प्रतीक था और दूसरे जो इस बात से इत्तेफाक नहीं रखते थे और किसी वर्ग विशेष के यूं अपनी ताकत के भद्दे प्रदर्शन पर हैरान थे.

फिर लगभग दो दशक बाद, जब राम नेताओं के चुनावी मुद्दों में फीके पड़ने लगे, तब जय श्री जवान  का नारा सामने आया. इस बार राम की जगह चुनाव जीतने के लिए जवानों को रणनीति का हिस्सा बनाया गया. ऐसी रणनीति जहां तथ्यों की जगह विश्वास को रखा जाता है, तर्क की जगह सिर्फ प्रचार और सोच-समझ की जगह बस जुमलेबाजी और घटिया बहसें. राम के मुद्दे की तरह इस मुद्दे ने भी समाज को दो भागों में बांटने का काम किया, एक स्वयंघोषित देशभक्त और दूसरे तथाकथित देशद्रोही.

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फिर जल्दी ही वफादारी, देशभक्ति और राष्ट्रप्रेम के सर्टिफिकेट भी बंटने लगे. जैसे राम मुद्दे में कहा गया था वैसा ही फिर से कहा गया. ‘जवान की बात करेगा वो ही देश में रहेगा’, जो कोई भी इस बात से जरा भी असहमत होता उसे पाकिस्तान जाने की सलाह दी जाने लगी.

नोटबंदी से परेशानी

क्या आपको नोटबंदी और एटीएम के सामने लगी लंबी कतार से परेशानी है? पैसों के लिए कतार में लगे किसी व्यक्ति की मौत पर आप दुखी हैं? हमारे जवानों के बारे में कभी सोचा है? अब भी जेएनयू में पढ़ रहे हो? जवानों से कुछ सीखो, जिन्होंने देशसेवा के लिए अपनी आगे की पढ़ाई तक दांव पर लगा दी. बहस कोई भी हो, विषय और समस्या चाहे कोई और हो, लेकिन ‘वहां सीमा पर हमारे जवान मर रहे हैं और तुम यहां...... का तर्क सामने वाले का मुंह बंद किया जाने लगा.

ऐसे घड़ियाली आंसू बहाए गए कि खुद घड़ियाल भी आकर इन ‘देशभक्तों’ से आंसू बहाना सीख लें.

tej bahdur yadav with family

बीएसएफ का जवान तेजबहादुर अपनी पत्नी और बेटे के साथ

पिछले कुछ दिनों में सीमा पर तैनात सेना के कई जवान उन्हें दी जा रही कम सुविधाओं के सबूत लेकर सामने आ रहे हैं. चंद रोज हुए कि बीएसएफ के जवान तेजबहादुर यादव का एक वीडियो सामने आया जिसमें तेजबहादुर यादव ने हाई-रिस्क इलाकों में तैनात सैनिकों को दिए जा रहे भोजन के बारे में बता रहे थे. उन्होंने दिखाया कि वहां जवानों को किस तरह का खाना दिया जा रहा है.

उसके बाद से इस तरह की कई शिकायतें सामने आईं, जिसमें जवानों को दिए जा रहे राशन और सप्लाई की गुणवत्ता को लेकर शिकायत थी, सैन्य अधिकारियों द्वारा जवानों से नौकर की तरह व्यवहार करने की शिकायत थी. कई स्वतंत्र जांचों और रिपोर्टों में भी यह बात सामने आई कि जवानों को भेजी जाने वाली सप्लाई बाजार में बिक रही है.

जवानों पर निशाना

जैसे कि इतना काफी नहीं था, ये बहस और बढ़ी. जिन जवानों ने आगे आकर ये परेशानियां सामने रखी थीं, उन्हें ही निशाना बनाया जाने लगा. बीएसएफ का जवान तेजबहादुर यादव जो सेना के कैंप के खाने का वीडियो सामने लेकर आया था उन पर शराबी होने का आरोप लगाया गया.

ऐसा कहा गया कि वे हमेशा से ही ऐसा करते रहे हैं, वे किसी मानसिक परेशानी से जूझ रहे हैं.... जिस पर फर्स्टपोस्ट ने सवाल भी उठाया था कि अगर ऐसा था तो बीएसएफ का उनको सीमा पर तैनात करके उनके हाथ में बन्दूक थमाना कहां तक सही था?

एक और सैनिक, लांसनायक योगेन्द्र प्रताप ने भी शिकायत की है कि अपनी परेशानियों के बारे में सरकार को लिखने के कारण सीनियर्स द्वारा उनका शोषण किया गया.

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बीएसएफ के जवानों को अक्सर हार्ड एरिया में ड्यूटी करनी पड़ती है

आपके एक निर्देश पर जंग के मैदान में पहुंचने वाले जवानों को अच्छा खाना न देने से ज्यादा घिनौनी हरकत भला और क्या होगी? अपने सहकर्मी से गुलाम जैसा व्यवहार करने से ज्यादा शर्मनाक हरकत भला और क्या होगी? क्या यह अमानवीयता नहीं है कि जिस जवान को आप देश की सुरक्षा के लिए सीमा पर भेज रहे हैं, उनको मिलने वाला खाना किसी नाजी कैंप में परोसे गए खाने जैसा है?

यहां साहिर लुधियानवी याद आते हैं, उन्हीं की भाषा में मेरा सवाल है जिन्हें नाज़ है जवान पर वो कहां हैं?

राष्ट्रवादी कहां गए

क्यों सरकार इस विषय को प्राथमिकता नहीं दे रही है? क्यों जांच का आदेश देकर इस भष्ट व्यवस्था को सुधारने की कोशिश नहीं की जा रही है?

कहां गए वे ‘देशभक्त’ जो उठते-बैठते सेना के जवानों की ही कसमें खा रहे थे? क्या जवानों को न्याय दिलाने के लिए वे सामने आयेंगे? क्या इन जवानों को न्याय दिलान के लिए वे ‘जस्टिस टू जवान’ के नाम से कैंडिल मार्च करेंगे?

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कहां हैं (रिटा.) जनरल जीडी बख्शी, जिनकी आंखों में तिरंगे के नाम से ही चमक आ जाती है, जो इसके सम्मान के लिए कुछ भी कर सकते हैं? क्या देश के भूखे सैनिकों के लिए वो आंसू नहीं बहायेंगे?

कहां गए वो ‘राष्ट्रवादी’ टीवी चैनल और उनके एंकर, जो जवानों की जरा-सी बेइज्जती का अंदाजा होने भर से अपने स्टूडियो से ही हमला करने को तैयार रहते थे?

कहां हैं उन ‘राष्ट्रवादी’ पार्टियों के वो प्रवक्ता जो स्टूडियो में ‘जवान’ शब्द सुनने मात्र से ही भावुक हो जाया करते थे?

जब सीमा पर जवान भूखे पेट खड़ा होकर देश की सुरक्षा कर रहा है तब कहां हैं वो नेता जो वोट बटोरने के लिए उनके नाम पर राजनीति करते हैं?

सीमा पर जवानों के साथ हो रहे इस दुर्व्यवहार पर कोई गुस्सा क्यों नहीं दिखाता, उनके शोषण पर कोई क्यों आगे आकर विरोध क्यों नहीं कर रहा है?

दोहरेपन से दिक्कत

हिपोक्रेसी या दोहरेपन के साथ यही परेशानी है कि एक दिन वो उन्हीं लोगों के खिलाफ खड़ी हो जाती है जिन्होंने लंबे समय तक उसका अभ्यास किया और उसे बढ़ावा दिया. लोग झूठे प्रतीक गढ़ते हैं और उनके लिए खड़े भी नहीं हो पाते.

ऐसे में यह देखना दुखद है कि किस तरह सोशल मीडिया पर उन जवानों पर भद्दे कमेंट किए जा रहे हैं. कोई उन्हें गद्दार कह रहा है तो कोई उनके नाम के साथ यादव लिखा होने और उनकी जाति के कारण उन्हें कायर कह रहा है. कोई कहता है कि उन्हें मुंह बंद कर के वापिस घर जाने को कहता है तो कोई कहता है कि वे चुपचाप जो मिल रहा है उसे निगल ले.

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ये सब कुछ इन जवानों को इसलिए कहा जा रहा है क्योंकि ये जवान अपने साथ होने वाले दुर्व्यवहार, सेना में भ्रष्टाचार और रसद में होने वाली हेर-फेर के खिलाफ अपनी आवाज उठा रहे हैं. ये सब सिर्फ हम हिंदुस्तान में ही देख सकते हैं कि जिन जवानों के कंधे पर रखकर बंदूक चलायी गयी, उस बंदूक से फिर उनकी तरफ ही निशाना साध दिया गया.

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तेज बहादुर ने वीडियो में उनको मिलने वाले खाने की खराब क्वालिटी का जिक्र किया था

सच तो यही है कि जो लोग ऐसे भावुक मुद्दों का इस्तेमाल समाज में ध्रुवीकरण लाने, विपक्षियों को तोड़ने, सांस्कृतिक और संस्थागत चिन्हों का राजनीतिकरण करने के लिए प्रयोग करते हैं...उनके लिए भगवान राम, गाय और जवान में कोई फर्क ही नहीं है.

छिपी मंशा

वे उनके प्रति बिना किसी सम्मान के उनका इस्तेमाल बस अपने छिपे इरादे को पूरा करने के लिए करते हैं. उनके लिए ये सब एक हथियार जैसे हैं जिसके जरिए वे अपने विरोधियों और आचोलकों पर दबंगई दिखा कर उनका मुंह बंद करेंगे.

खुद जवानों और गाय के बीच की समानता पहचानिए. दोनों को ही बीते सालों में भावनात्मक मुद्दे के बतौर प्रयोग किया गया. गाय को ‘मां’ या ‘गौमाता’ कहा गया वहीं जवानों को ‘भाई’ और उसके बाद दोनों को ही उनके हाल पर छोड़ दिया गया. दोनों को ही एक तरह से नैतिक और आर्थिक कूड़े से अपना पेट भरने और ख्याल रखने के छोड़ दिया गया.

इन छद्म राष्ट्रवादियों को गौर से देखिए, इनकी मीठी बातों और नकली आंसुओं से अलग भी इनका एक चेहरा है. उनका सिद्दांत है: गौ हमारी माता है, जवान हमारे भाई हैं. लेकिन, जब उनकी देखभाल करने का समय आया तब इन्होंने उनके सामने कुछ बचा-खुचा खाना फेंककर अपने कर्तव्य से मुक्ति पा ली.

अगर इसके बाद भी वे शिकायत करें तो पहले तो उन्हें ठंड में मरने छोड़ दें, या बेहतर विकल्प के तौर पर उन्हें पाकिस्तान भेज दें.

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