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संसदीय पैनल क्यों दे रही है देश में यूरेनियम का आयात बढ़ाने का सुझाव

वरिष्ठ बीजेपी नेता मुरली मनोहर जोशी के नेतृत्व में गठित एक संसदीय पैनल ने केंद्र सरकार को ये मशविरा दिया है कि वो परमाणु ऊर्जा के क्षेत्र में आगे बढ़ने के लिए कूटनीति का रास्ता अख्तियार करे.

Updated On: Dec 14, 2018 08:38 AM IST

Yatish Yadav

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संसदीय पैनल क्यों दे रही है देश में यूरेनियम का आयात बढ़ाने का सुझाव

वरिष्ठ बीजेपी नेता मुरली मनोहर जोशी के नेतृत्व में गठित एक संसदीय पैनल ने केंद्र सरकार को ये मशविरा दिया है कि वो परमाणु ऊर्जा के क्षेत्र में आगे बढ़ने के लिए कूटनीति का रास्ता अख्तियार करे. ऐसा करते हुए उसे देश में यूरेनियम, उससे जुड़े औजारों और तकनीक के आयात में इजाफा करना चाहिए, जिससे हमारे देश की परमाणु शक्ति और मजबूत हो सके.

न्यूक्लियर प्लांट के लिए यूरेनियम के आयात पर दी गई इस रिपोर्ट में इस संसदीय कमिटी ने चिंता जाहिर करते हुए कहा है कि 15 से भी ज्यादा देशों के साथ आईजीए यानि ‘इंटर गर्वमेंटल एग्रीमेंट’ के बावजूद, असल में हो ये रहा है कि यूरेनियम का आयात इनमें से कुछ ही देशों से किया जाता है. जिन देशों से यूरेनियम हमें मिल रहा है उसमें रूस, कनाडा और कजाखिस्तान शामिल हैं. फ़र्स्टपोस्ट को ये जानकारी एक ऐसे सूत्र से मिली है जिसे इस रिपोर्ट में दिए गए सुझावों के बारे में पूरी जानकारी है.

चूंकि, उजबेकिस्तान और नामिबिया जैसे यूरेनिम के प्रमुख उत्पादक देशों से, हमारे यहां यूरेनियम का कोई आयात नहीं हो रहा है, ऐसे में इस कमेटी का मानना है कि अब हमें अपनी यूरेनियम की जरूरतों के लिए किसी एक स्रोत पर निर्भर नहीं रहना चाहिए और ज्यादा से ज़्यादा विकल्पों के साथ आगे बढ़ना चाहिए. ताकि, भविष्य में कभी भी अगर हमारे सामने कोई कठिन या अनिश्चितता की स्थिति हो तो हम उसे संभाल पाएं और बिना नुकसान के आगे बढ़ पाएं.

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क्योंकि, डिपार्टमेंट ऑफ एटॉमिक एनर्जी (डीएई) का ये लक्ष्य है कि वो कम से कम 15 हजार मीट्रिक टन यूरेनिम का स्टॉक अपने पास हर हाल में रखे, जो अगले 15 सालों तक कम से कम 22 रिएक्टरों के लिए काफी होगा. मुमकिन है कि इस रिपोर्ट को आगामी शीतकालीन सत्र में संसद के पटल पर रख दिया जाएगा.

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इसके अलावा सरकार ने कम से कम दस और पानी के भारी रिएक्टर की भी मंजूरी दे दी है, जिसके लिए हमें अलग से 1250 मीट्रीक टन प्राकृतिक यूरेनियम डायोक्साइड फ्यूल (ईंधन) की जरूरत होगी. इस समय हमारे देश में 6780 मेगावॉट की क्षमता वाले जो 22 रिएक्टर काम कर रहे हैं, उनमें से 4380 मेगावॉट की क्षमता वाले 14 रिएक्टर, इंटरनेश्नल एटॉमिक एनर्जी एजेंसी (आईएईए) की संरक्षण में आते हैं और जिन्हें आयातित यूरेनियम के ईंधन से चलाया जाता है. जबकि, अन्य 8 रिएक्टरों, जिनकी कुल क्षमता मात्र 2400 मेगावॉट है उसे देसी यूरेनियम के ईधन से चलाया जाता है.

इस संसदीय पैनल के जानकार सूत्र के अनुसार, ‘सरकार की ये पूरी कोशिश है कि वो देश में नई माइन (खान) और प्रोसेसिंग की सुविधा शुरू करे, जिससे देसी यूरेनियम की सप्लाई में वृद्धि हो.’ झारखंड का जादूगोड़ा माइन देश का सबसे बड़ा यूरेनियम का उत्पादक है, ये अलग बात है कि वो काफी पुराना है और वहां खनन के लिए सबसे ज़्यादा 800 मीटर गहरे तक जाकर खुदाई करनी पड़ती है. डीएई के मुताबिक घरेलू माइन से यूरेनियम निकालने के लिए उन्हें जमीन के 500 मीटर गहरे से भी ज्यादा में जाने की जरूरत पड़ती है.

इससे खर्चा और ज्यादा बढ़ जाता है, जो यूरेनियम के आयात की तुलना में ज्यादा महंगा पड़ता है. सूत्रों के मुताबिक घरेलू यूरेनियम की क्वालिटी भी ऑस्ट्रेलिया और कनाडा जैसे दूसरे देशों से आयात किए गए यूरेनियम से कम या निम्न होती है.

एटॉमिक डायरेक्टोरेट फॉर एक्सप्लोरेशन एंड रिसर्च (एएमडी) ने छह जगहों पर लगातार मल्टी-पैरामिट्रिक एक्सप्लोरेशन एक्टिविटी चालू कर रखा है, इनमें कर्नाटक की भीमा घाटी, मेघालय की महादेक घाटी, आंध्रप्रदेश का कुडापह, झारखंड का सिंहभूम, राजस्थान का नॉर्थ दिल्ली फोल्ड बेल्ट, हरियाणा और तमिलनाडु का धर्मापुरी शियर जोन शामिल है.

इसके अलावा, एएमडी मध्यप्रदेश के सतपुड़ा गोंडवाना घाटी, हिमाचल की शिवालिक घाटी, छत्तीसगढ़ का डोंगरगढ़ के इलाके पर भी काम कर रही है. जहां तक उज़्बेकिस्तान से यूरेनियम के आयात में आ रही देरी का सवाल है तो उसके बारे में डीएई का कहना है, इसका कारण वहां से सामान उठाने और लाने यानि ट्रांसपोर्टेशन की समस्या आड़े आ रही है क्योंकि उज्बेकिस्तान एक बंदरगाह विहीन देश है, और वहां से पानी के रास्ते यात्रा नहीं की जा सकती है.

डीएई ने उज्बेक कंपनी ‘नवोई माइनिंग एंड मेटालर्जिकल कॉम्बिनैट स्टेट कंपनी (एनएमएमसी) के साथ, 2000 मीट्रिक टन कच्चा यूरेनियम, 2014-18 के बीच आयात करने का समझौता भी किया था, लेकिन ट्रांसपोर्ट की दिक्कतों के कारण उसे पूरा नहीं किया सका है. हालांकि, डीएई अभी भी उज्बेकिस्तान के साथ नया समझौता करने को तैयार है.

15 अप्रैल 2015 को कनाडा की कंपनी ‘कैमिको इंक कनाडा’ के साथ भी एक समझौते पर हस्ताक्षर किया गया था, जिसके तहत साल 2015-2020 तक की छह साल की अवधि के दौरान, 3000 मीट्रिक टन कच्चा यूरेनियम खरीदने की बात कही गई थी. कनाडा की इस कंपनी ने पहले भी साल 2015, 2016 और 2017 के दौरान 2471 मीट्रिक टन यूरेनियम भारत को सप्लाई दिया था.

कजाखस्तान की कंपनी है ‘कज़ातोमप्रोम’ जिसके साथ भारत ने 8 जुलाई 2015 को एक संधि की थी. इस डील में ये तय हुआ था कि ये कंपनी अगले पांच सालों तक भारत को 5000 मीट्रिक टन यूरेनियम सप्लाई करेगी. ये कंपनी शुरुआती ही वर्षों 2015, 2016 और 2017 में भारत को 3413 मीट्रिक टन की यूरेनियम सप्लाई कर चुकी है और पूरी उम्मीद है कि इस साल के अंत होते-होते और 1500 मीट्रिक टन की सप्लाई कर देगी.

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आईएईए के संरक्षण में जिन न्यूक्लीयर पॉवर रिएक्टरों को रखा गया है, उन्हें भारत के बाहर यानि अंतरराष्ट्रीय बाज़ारों से भी यूरेनियम की सप्लाई मिल जाती है, हालांकि यूरेनियम का अंतरराष्ट्रीय बाजार भी काफी अस्थिर है. ईंधन और तकनीक का अंतरराष्ट्रीय सिविल न्यूक्लीयर ट्रेड (बाजार) खुलने के बाद भी, भारत को दुनिया के दूसरे देशों से यूरेनियम खरीदने में खासी दिक्कतों का सामना करना पड़ रहा है. हालांकि, इसे सुलझाने के लिए द्विपक्षीय समझौते भी किए जा रहे हैं.

इस पैनर का ये सुझाव है कि डीएई को पर्याप्त बजट आवंटित किया जाए, ताकि परमाणु ऊर्जा पैदा और संचित करने की दिशा में तेजी लाई जा सके. साल 2018-19 में डीएई को 13,971 करोड़ का बजट पास किया गया था, जो पिछली बजट से 5.7% अधिक था. विभाग की कोशिश है कि उसे हर साल कम से कम 15,000 करोड़ का फंड बेरोक-टोक मिलता रहे ताकि उसकी सभी जरूरतों को पूरा किया सके.

प्रतीकात्मक तस्वीर

प्रतीकात्मक तस्वीर

चूंकि दुनिया का सबसे बड़ा थोरियम का संसाधन हमारे देश में पाया जाता है, इसको देखते हुए डीएई एक ऐसी योजना पर काम कर रही है, जिससे वो इसका इस्तेमाल एक दीर्घकालिक परमाणु कार्यक्रम के लिए कर सके. इस संसदीय पैनल की रिपोर्ट में जिस बात पर सबसे ज़्यादा चिंता जताई गई है, वो एटॉमिक एनर्जी रेगुलेटरी बोर्ड (एईआरबी) में मानव संधाधन की कमी है. एईआरबी देश के सभी परमाणु संयंत्रों को सुरक्षा प्रदान करने वाली प्रमुख एजेंसी है.

यहां पर कुल 459 कर्मचारी रखने की मंजूरी मिली हुई है, लेकिन इसके बावजूद सिर्फ 326 लोग ही नियुक्त हैं, जो कि इसकी कुल नियुक्तियों का मात्र 29 % है. इसलिए, पैनल ने डीएई और एईआईबी दोनों से ही कहा है कि वो तुरंत जरूरी कदम उठाते हुए रिक्त पदों पर जल्द से जल्द कर्मचारियों की नियुक्ति करे. फ़र्स्टपोस्ट को ये जानकारी कमेटी द्वारा दिए गए सुझावों की जानकारी रखने वाले एक सूत्र ने दी है.

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