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परेश रावल बधाई हो! हिंदुस्तान में रहकर लीजिए पाकिस्तान का मजा

परेश रावल जैसे सांसद का भीड़ को उकसाना अपराध नहीं देशभक्ति है.

Rakesh Kayasth Updated On: May 22, 2017 08:29 PM IST

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परेश रावल बधाई हो! हिंदुस्तान में रहकर लीजिए पाकिस्तान का मजा

बहुत जल्द वह वक्त आनेवाला है, जब देश में रहने के लिए दिमाग के किसी डॉक्टर से सर्टिफिकेट लेना होगा. डॉक्टर सरकारी होगा और जाहिर है, नागपुर से ट्रेंड होगा. डॉक्टर आपके सामने कुछ शब्द बोलेगा जैसे- कश्मीर, देशद्रोह और सेक्यूलर. ये शब्द सुनकर आपको अगर दौरे ना पड़ें तो आप पागल करार दिए जाएंगे.

अगर आप अपनी जगह खड़े-खड़े कूदने लगे या सिर के बाल नोचने लगे तो माना जाएगा कि आपकी मानसिक सेहत ठीक है. आजू-बाजू खड़े किसी आदमी को थप्पड़ मार दें तो आपकी सेहत इतनी अच्छी मानी जाएगी कि आप दूसरों की दिमागी हालत के बारे में सर्टिफिकेट जारी कर पाएंगे.

सरकार खुश है कि देश में मानसिक रूप से स्वस्थ लोगों की तादाद बढ़ रही है. अब जो बेचारे दिमागी रूप से बीमार हैं, उनका क्या किया जाए, यह सवाल जरूर सरकार के सामने है.

बहुत से लोगो का सुझाव था कि सबको पाकिस्तान भेज देना चाहिए. सुझाव अच्छा था, लेकिन मेक इंडिया के दौर में अगर इलाज बाहर हो तो नाक नहीं कट जाएगी? लिहाजा तय ये हुआ कि अपना पाकिस्तान भारत में ही बना लिया जाए ताकि लोगो को भेजने का खर्चा भी बचे और सम्मान भी.

लीजिये पाकिस्तान बन गया

बहुत से लोग मानने को तैयार नहीं है, लेकिन सच है कि भारत ने अपने सपनों का पाकिस्तान बना लिया है. शुद्ध, शाकाहारी, सात्विक और भगवा पाकिस्तान. यहां के लोगों का मानसिक स्वास्थ्य पूरी तरह ठीक है, एकदम ओरिजनल वाले पाकिस्तान की तरह. इस बात को साबित करने के लिए हर रोज दिमागी सेहत के उम्दा नमूने पेश किए जा रहे हैं.

ताजा नमूना बीजेपी के देशभक्त सांसद परेश रावल की तरफ से आया है. रावल साहब अंग्रेजी की लेखिका अरूंधति रॉय को मानसिक तौर पर बीमार मानते हैं. वजह ये है कि अरुंधति कश्मीर के बारे में जो राय रखती हैं, वह रावल साहब को पसंद नहीं है. पसंद मुझे भी नहीं है.

लेकिन रावल साहब दिमागी रूप से ज्यादा सेहतमंद हैं, इसलिए उन्हें अरुंधति को सजा सुनाने का अधिकार है. सजा उन्होंने यह तजवीज की है कि अरुंधति को आर्मी की जीप में बांधकर घसीटा जाए.

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'अरुंधति को जीप में बांधकर घसीटो'

इधर रावल साहब का ट्वीट गया और उधर से हजारों संख्या में लोग टूट पड़े अपनी-अपनी दिमागी सेहत का नमूना पेश करने. सबने करतल ध्वनि से इस सुझाव का स्वागत किया है.

किसी ने कहा- जब जीप अरुंधति को घसीट जा रहा हो तो मैं पत्थर बरसाउंगा. कोई सागरिका घोष, बरखा दत्त और राणा अयूब जैसी बाकी महिलाओं को भी जीप में बांधकर घसीटना चाहता है, तो कोई रेप का ख्वाहिशमंद है. प्रेम से बोलिये- यत्र नार्यस्तु पूज्यते तत्र रमन्ते देवता!

परेश रावल की इस देश में जबरदस्त फैन फॉलोइंग है. मान लीजिए उनकी इस अपील को साकार करने के लिए अगर लोग अरुंधति रॉय के घर पर धावा बोल दें और उनके साथ वही करें जो रावल साहब चाहते हैं, तो इसका जिम्मेदार कौन होगा? कोई नहीं होगा, क्योंकि वो कार्रवाई भीड़ की होगी.

भीड़ का यही फायदा है कि उसका कोई चेहरा नहीं होता है. वह निर्गुण और निराकार होती है. भीड़ पर कभी कोई मुकदमा दर्ज नहीं होता. अगर दर्ज हो भी जाए तो साबित कुछ नहीं होता.

पिछले तीन साल साल की घटनाओं पर गौर कीजिए. रूलिंग पार्टी के अलग-अलग नेताओं ने कभी लव जेहाद, कभी गोरक्षा तो कभी एंटी रोमियो स्क्वाड के नारे बुलंद किये. भीड़ ने लोगों को यहां-वहां पीटना शुरू किया.

कागजात के साथ गाय खरीदकर ले जा रहे पहलू खान को भीड़ ने पीट-पीटकर मार डाला. कई और जगहों पर इसी तरह की घटनाएं हुईं. किसी को कोई फर्क पड़ा? क्या आपको अब भी कोई शक है कि हम अपना पाकिस्तान बना चुके हैं.

थोड़ा पढ़-लिख लीजिए सरकार

परेश रावल जैसे लोगों को देश की जनता ने संसद में इसलिए भेजा है क्योंकि उनसे उम्मीद की जाती है कि देश का कानून और संविधान बेहतर तरीके से समझते हैं.

लेकिन क्या वाकई ऐसा है? अगर रावल साहब सचमुच कानून और संविधान और भारतीयता को समझते तो फिर वो अरुंधति रॉय को तर्कपूर्ण आधार पर ये बताते कि उनका नजरिया सही नहीं है.

लेकिन इन सब कामों में मेहनत की जरूरत होती है. साथ ही तार्किक बात करने वालों को फेसबुक पर लाखों लाइक और ट्वीटर पर हजारों फॉलोअर नहीं मिलते हैं.

इसके बदले भीड़ को उकसाना एक आसान तरीका है. सत्ता पक्ष से जुड़े तमाम लोग यही कर रहे हैं. क्या आपको अब शक है कि भारत में एक नया पाकिस्तान नहीं बन चुका है?

कश्मीर की बदहाली बीजेपी के लिए फायदेमंद?

कश्मीर पर सबसे समझदारी भरा और साहसिक काम अटल बिहारी वाजपेयी की सरकार ने किया था. वह भी एक राष्ट्रवादी सरकार थी. वाजपेयी ने राज्य में दस साल से चल रही हिंसा को रोकने के लिए दिलेरी भरे कदम उठाये थे. इसके बहुत बेहतर नतीजे सामने आए थे. अलग-थलग पड़ी कश्मीरी आवाम का देश की मुख्य धारा में लौटने का सिलसिला शुरू हुआ था. लेकिन वह गुजरे कल की बात है.

पिछले तीन साल में आप मौजूदा सरकार की कश्मीर नीति उठाकर देख लीजिये, आपको फर्क समझ में आ जाएगा. आज कश्मीर में हालात इतने बुरे हैं, जितने पहले कभी नहीं रहे... और वो भी तब जबकि वहां पीडीपी के साथ मिलकर चल रही बीजेपी की सरकार है. पीडीपी वही पार्टी है जो अलगाववादी नेताओं के साथ हमदर्दी रखती है. लेकिन बीजेपी को इस बात से कोई फर्क पड़ता है? सत्ता की राजनीति में सबकुछ जायज है.

कश्मीर के नाम पर पूरे देश में एक अलग तरह का उन्माद फैलाया जा रहा है. इस सवाल का जवाब कोई देना को तैयार नहीं है कि आखिर जब केंद्र और राज्य में एक ही पार्टी की सरकार है तो फिर जिम्मेदारी किसकी है. गौर से देखें तो ये बात बहुत साफ है कि कश्मीर मसले को बीजेपी सिर्फ अपने राजनीतिक फायदे के हिसाब से देख रही है. उधर हालात बिगड़ेंगे और इधर राष्ट्रवाद का नारा बुलंद किया जाएगा.

अंडर लाइन मैसेज ये जाएगा कि मुसलमान जहां भी बड़ी तादाद में होते हैं, वहां समस्याएं खड़ी होती हैं. हिंदू वोट गोलबंद होंगे और 2019 की जीत पक्की. बहुसंख्यक ध्रुवीकरण की यह चिर-परिचित राजनीतिक शैली है, जिसे पाकिस्तान ने आजमाया और नतीजे में वह पहले इस्लामिक फिर सुन्नी और अब सिर्फ पंजाबी मुसलमानों का देश बन चुका है. क्या भारत उसी रास्ते पर नहीं बढ़ रहा है?

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शुक्र है आर्यावर्त में परेश रावल नहीं थे

बात बहुत लंबी है. लौटते हैं, एक बार फिर दिमाग के डॉक्टर परेश रावल की तरफ. जिनके बारे में वोटरों को लगता है कि वे कानून, संविधान और देश की आत्मा को बहुत अच्छी तरह समझते हैं. लेकिन माननीय सांसद एक लेखिका के सवालों से इसे इतने आहत हैं कि उसे जीप में बांधकर घसीटना चाहते हैं. यही परंपरा अगर सदियों पुरानी भारतीय संस्कृति में होती तो क्या होता?

फिर तो सावित्री का रेप हो जाता

पति सत्यवान के प्राण लेकर यमराज लौट रहे थे. सावित्री उनका पीछा कर रही थी और प्रार्थना कर रही थी कि प्राण वापस लौटा दीजिये. यमराज कह रहे थे कि ऐसा आजतक नहीं हुआ. सावित्री कह रही थी, जो पहले कभी नहीं हुआ हो वह कभी ना कभी होता है.

यमराज ने कहा ऐसा संभव नहीं है, कुछ और मांग लो. सावित्री ने कहा- ठीक है, तो पुत्र दे दीजिये. यमराज ने कहा- तथास्तु! सावित्री ने कहा- पति के बिना पुत्र कहां से होगा? सावित्री के तर्क के आगे यमराज हार गए और उन्होंने पति लौटा दिया.

जरा सोचिए तर्क के मामले में निरुत्तर हुए यमराज में अगर परेश रावल की आत्मा होती तो क्या होता? वे उस अबला को भैंस की पूंछ में बांधकर घसीटने का आदेश दे सकते थे. या फिर अपने यमदूतों से कहते- इसका पति नहीं है, तुम्हीं इसे पुत्र दे दो.

अगर आर्यावर्त आज के जैसा होता तो गार्गी से शास्त्रार्थ के दौरान याज्ञवल्कय ऋषि भी वही करते जो बिग बॉस में स्वामी ओम महिला प्रतिभागियों के साथ कर रहे थे. अगर आर्यावर्त आज जैसा होता तो शास्त्रार्थ हारने के बाद शंकराचार्य मंडन मिश्र की पत्नी को कुलटा करार देते. लेकिन क्या उन्होंने ऐसा किया?

भारतवासी पिछले पांच हजार साल से दिमागी तौर पर स्वस्थ थे या अब दिमागी रूप से बीमार हुए हैं, ये फैसला आपको करना है.

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