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बयान के बजाय घटिया भूमिकाओं से अपनी हसरतें निकालें परेश रावल

परेश रावल की राय देशभक्ति के चोले में लिपटी हुई नीचता की एक बेहद बुरी मिसाल है.

Updated On: May 24, 2017 11:14 AM IST

Sandipan Sharma Sandipan Sharma

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बयान के बजाय घटिया भूमिकाओं से अपनी हसरतें निकालें परेश रावल

परेश रावल को राजनीति में आने की बजाय खुद को सिनेमा तक ही सीमित रखना चाहिए था. एक विलेन के तौर पर उनके पास महिलाओं से नफरत करने, मानव अधिकारों का उल्लंघन करने और हिंसा से आनंद हासिल करने के काफी मौके रहे होंगे. उन्होंने मर्दवादी दंभ को दिखाने वाले कई रेप सीन भी किए होंगे.

यह दुख की बात है कि रावल अब एक सांसद हैं जिनकी आंतरिक इच्छाएं अभी भी उनकी बॉलीवुड में निभाई गई बुरे लोगों की भूमिकाओं वाली सोच दर्शा देती हैं.

एक घटिया बयान

रावल ने एक खतरनाक सुझाव दिया कि पत्थरबाजों की बजाय अरुंधति रॉय को आर्मी जीप से बांध देना चाहिए. उनकी राय देशभक्ति के चोले में लिपटी हुई नीचता की एक बेहद बुरी मिसाल है. वह एक ऐसी सोच को जाहिर कर रहे हैं जो कि खासतौर पर महिलाओं के खिलाफ हिंसा को बढ़ावा देती है ताकि विरोध, मानव अधिकारों और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर रोक लगाई जा सके.

मानवीयता के सिद्धांतों का उल्लंघन

मानव अधिकारों के उल्लंघन के लिए हिंसा के प्रति उनका झुकाव, भीड़ द्वारा किसी को मार देना और कानून को न मानने वाले उपाय दिखाते हैं कि रावल उन मूल सिद्धातों का उल्लंघन कर रहे हैं जिनके चलते उन्हें संसद की सदस्यता हासिल हुई है. ये सिद्धांत हैं- कानून का राज, लोकतंत्र के सिद्धांत और व्यक्तियों के अधिकार.

छद्म राष्ट्रवाद और घृणा की सोच

रावल की सोच और एरियाना ग्रांडे के मैनचेस्टर में सोमवार को कंसर्ट में बच्चों और युवाओं को मारने वाले अपराधियों के बीच आखिर क्या अंतर है? फिदायीन ने इस हमले के जरिए अपनी तथाकथित जंग को आगे बढ़ाने के लिए बेगुनाह बच्चों और युवाओं की जिंदगियां खत्म कर दीं. आतंकवादी ने सभ्यता के सिद्धांत, जो कि मानवता के मूल तत्व हैं, के प्रति अपनी घृणा के लिए निहत्थे लोगों को शिकार बनाया.

रावल भी यही सुझाव दे रहे हैं कि रॉय जैसी बेगुनाह, निहत्थी विरोध की आवाजों को हिंसा के जरिए चुप करा दिया जाए. इसके पीछे उनका मकसद हो-हल्ले वाला छद्म राष्ट्रवाद है जिसका वह प्रतिनिधित्व करते हैं. थोड़े से और साहस के साथ रावल भी शायद एक फिदायीन में तब्दील हो सकते हैं जो कि अत्याचार और महिलाओं के प्रति नफरत की किसी खिलाफत के लिए किसी भी हद तक जा सकते हैं.

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अगर रावल सांसद नहीं होते तो उनका रॉय के खिलाफ हिंसा वाले बयान का बचाव करना बाबूभाई के उनके रोल जितना ही हास्यास्पद है. इंडियन एक्सप्रेस से उन्होंने कहा, ‘वह एक आर्मचेयर क्रिटिक हैं. वह एसी कमरों में रहती हैं और सेना के खिलाफ लिखती हैं.’ उन्होंने कहा, ‘आर्मी की बुराई, सेना का मनोबल गिराने और कश्मीर पॉलिसी की आलोचना करने के जरिए वह देश की बेइज्जती करती हैं. आप प्रधानमंत्री की, सत्ताधारी पार्टी की और सरकार की आलोचना कर सकते हैं. लेकिन, जब सेना की बात आती है तो उन्हें समझना चाहिए कि वह अकेली नहीं है. पूरा देश सेना के साथ खड़ा है.’

साहसी सेना को मानव ढाल की जरूरत नहीं

अगर रावल खुद अपने एसी कमरे से बाहर निकले होते तो शायद उन्हें कश्मीर की हकीकत का पता चलता. उन्हें पता चलता कि भारतीय सेना को किसी मानव ढाल की जरूरत नहीं है. घाटी में सेना को अपनी ड्यूटी करने के लिए शिखंडी की तरह छिपकर काम करने की जरूरत नहीं है. सेना के बहादुर सिपाही कश्मीर में खुले बाजारों और चौराहों पर खड़े होते हैं और उनकी आंखों में प्रतिबद्धता और साहस दिखाई देता है. वे किसी भी आतंकी और विरोध करने वालों से निपटने की ताकत रखते हैं. मानव ढाल बनाकर छिपने, लोगों को बंधक बनाना केवल एक अपवाद है और यह घाटी में सेना का एक चलन नहीं है. ऐसे में रावल का कायराना हरकत करने का सुझाव दरअसल सेना की बेइज्जती करने वाला है.

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उदारवादी सोच सेना की आलोचना नहीं

साथ ही, मानव अधिकारों, उदारवादी मूल्य, छद्म राष्ट्रवाद का विरोध करना और अभिव्यक्ति की आजादी- कथित अपराध जिनके लिए रावल अरुंधति रॉय के साथ हिंसा करने की वकालत कर रहे थे- अनिवार्य रूप से सेना की आलोचना नहीं हैं. यह निश्चित तौर पर राजनीति की नाकामी है जिसके चलते सेना ऐसे हालात में फंस गई है जहां उसे अपने ही लोगों से लड़ना पड़ रहा है, अपने ही देश के युवाओं पर बंदूक ताननी पड़ रही है. ऐसे में बेहतर होगा कि रावल अपना गुस्सा राजनेताओं पर निकालते जिनकी वजह से कश्मीर में मौजूदा हालात पैदा हुए हैं.

कश्मीर के हालात समझना जरूरी

लेकिन सोशल मीडिया पर योद्धा बनना कश्मीर की हकीकत, आर्मी के स्टैंडर्ड ऑपरेशनल प्रोटोकॉल्स और मानवता और लोकतंत्र के मूल सिद्धांतों को समझने के मुकाबले कहीं आसान हैं. एक ऐसे वक्त में जहां गौरक्षक होना बुकर सम्मान प्राप्त लेखक होने के मुकाबले ज्यादा सम्मानजनक लगता है, रावल को निचले दर्जे का नैतिक आधार लेने के लिए ज्यादा दोषी नहीं मानना चाहिए क्योंकि वह फर्जी राष्ट्रवादियों और उन्मादियों से तत्काल प्रशंसा हासिल करना चाहते हैं.

बेहतर होगा फिर से सिनेमा का रुख कर लें परेश रावल

लेकिन अगर सिनेमा की अगली कतार में बैठे लोगों से तालियों और सीटियों को सुनने की इतनी इच्छा उनके मन में है तो क्यों नहीं वह फिर से वहीं चले जाते जहां से वह आए हैं. सिनेमा की उस दुनिया में जहां वह अपने गुस्से को निकालने और हिंसा से आनंद पाने के लिए मुफीद रोल हासिल कर सकते हैं.

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