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दक्षिणी कश्मीर में बदतर हैं हालात, लिंचिंग के डर से जनता से नहीं मिल रहे विधायक

घाटी में हालात तेजी से संगीन होते जा रहे हैं और ऐसे में यासिर रिशी और उन जैसे हिंदुस्तान के हिमायती राजनेता चाहते हैं कि सियासी समस्याओं का कोई समाधान निकले

Sameer Yasir Updated On: May 12, 2018 10:22 AM IST

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दक्षिणी कश्मीर में बदतर हैं हालात, लिंचिंग के डर से जनता से नहीं मिल रहे विधायक

आम नागरिक और उग्रवादियों के मारे जाने की घटनाओं के बढ़ने के साथ पीपुल्स डेमोक्रेटिक पार्टी (पीडीपी) के दक्षिण कश्मीर के विधायक भय के माहौल में जी रहे हैं. उन्हें डर सता रहा है कि हिंसा पर उतारू भीड़ कहीं उन्हें निशाना ना बना ले. ऐसी अनहोनी के पेशेनजर वे दक्षिण कश्मीर के अपने निर्वाचन-क्षेत्र में जाने से कतराने लगे हैं जबकि दक्षिण कश्मीर का इलाका परंपरागत रूप से पीडीपी के दबदबे वाला इलाका रहा है.

सूबे में पीडीपी, बीजेपी के साथ सरकार में है. पिछले यानी 2014 में हुए विधानसभा चुनावों में दक्षिण कश्मीर की 16 सीटों में से 11 पर पीडीपी ने कामयाबी हासिल की थी. लेकिन इसके बाद से पीडीपी के इस मजबूत गढ़ में पार्टी के लिए हालात एकदम से बदलते चले गए हैं और यह इलाका नए जमाने के उस उग्रवाद का नया ठिकाना बन चला है जो तकनीक के नए-नए औजारों पर सवार होकर अपने वार करती है.

ज्यादा संगीन हुए हैं हालात, उग्रवादियों की तरफ बढ़ा है झुकाव

अतिवाद से हलकान शोपियां जिले में गुजरे कुछ हफ्ते के भीतर 16 उग्रवादी मारे गए हैं और इस इलाके के एक पीडीपी नेता का कहना है कि उसके निर्वाचन क्षेत्र के ज्यादातर इलाकों में लोगों का रुझान उग्रवादियों की तरफ है क्योंकि नई दिल्ली की केंद्र सरकार कोई सार्थक बातचीत की राह निकालने में नाकाम रही है. शोपियां से पीडीपी के विधायक मोहम्मद युसूफ भट ने फ़र्स्टपोस्ट को बताया कि पिछले साल के मुकाबले इस बार जिले में हालात कहीं ज्यादा संगीन हैं.

युसूफ भट (उम्र 68 वर्ष) वकील रह चुके हैं और उन्होंने सामाजिक कार्यकर्ता की भी भूमिका निभाई है. उन्होंने फ़र्स्टपोस्ट से कहा कि हमें 'फौरन ही सियासी पहलकदमी करनी चाहिए ताकि छोटे-छोटे बच्चों की जान की हिफाजत की जा सके. हालात पिछले साल के मुकाबले कहीं ज्यादा संगीन हैं. नई दिल्ली की केंद्र सरकार को संघर्ष के समाधान की कोई ना कोई राह जरूर निकालनी चाहिए.'

युसूफ भट.

युसूफ भट.

नेताओं की जान को भी खतरा

शोपियां विधानसभा निर्वाचन-क्षेत्र के मेमेन्दर इलाके में कायम युसूफ भट के घर को हाल ही में पेट्रोल बम का निशाना बनाया गया था. श्रीनगर के जवाहर नगर इलाके के अपने सरकारी आवास पर भट ने फ़र्स्टपोस्ट से कहा कि 'जिन इलाकों में लाशों को दफनाया जा रहा है और विरोध-प्रदर्शन चल रहे हैं वहां हालत कुछ ऐसी है कि लोग मुझे या किसी और नेता देख लें तो उसे पकड़कर जान से मार डालेंगे.'

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शोपियां जिले में एक और विधानसभा निर्वाचन-क्षेत्र है वाची. वाची के विधायक एजाज अहमद मीर भी युसूफ भट की बातों से सहमत हैं. वे बताते हैं कि उग्रवादियों ने 14 से 28 साल के नौजवानों के मन पर गहरा असर डाला है और उनकी ताकत के बढ़ने के पीछे यह एक बड़ी वजह है.

एजाज अहमद मीर ने श्रीनगर मे फ़र्स्टपोस्ट से कहा कि 'जब भी कोई उग्रवादी कहीं फंस जाता है तो लोग उसे बचाने के लिए चारों तरफ से निकल आते हैं क्योंकि उग्रवादी स्थानीय ही होता है. विदेशी उग्रवादी के मामले में मैं यही बात नहीं कह सकता. लोग जब बहुत ज्यादा जज्बाती हो उठे हैं तो उन्हें ऐसे माहौल में अंकुश में रखना मुश्किल हो जाता है.'

एजाज  मीर अहमद.

एजाज अहमद मीर.

आम नागरिकों को बचाने की कोशिश नाकाम

दोनों ही विधायकों ने कहा कि वे लोग समय-समय पर सुरक्षाबलों को साफ लफ्जों में कहते रहे हैं कि आम नागरिकों को कोई नुकसान नहीं पहुंचना चाहिए और जब भी कोई मुठभेड़ शुरू होती है तो सुरक्षाबल जिले की पुलिस से संपर्क साधते और उसे मौके पर बुलाते हैं ताकि आम नागरिक मुठभेड़ की चपेट में नहीं आएं. पीडीपी के ये दोनों विधायक हिंदुस्तान के हिमायती हैं और उन्होंने बताया कि हमारे साफ-साफ निर्देश देने के बावजूद वाकया कुछ ऐसी रंगत ले लेता है कि नौजवान मुठभेड़ वाली जगह पर झुंड के झुंड आ जुटते हैं और ऐसे में सुरक्षा बल को कार्रवाई करनी पड़ती है जिसमें आम नागरिकों की जान जाती है.

शोपियां इलाके के विधायक युसूफ भट का कहना है कि 'हमें किसी ना किसी तरीके से आम नागरिकों को हताहत होने से बचाना होगा. सही समझ का कोई भी आदमी ऐसी चीजों को सहन नहीं करेगा. लेकिन क्या करूं कि मजबूर तो मैं भी हूं और मैंने अपनी चिंताओं से सरकार को आगाह कर दिया है.'

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दूसरी तरफ युसूफ भट का ये भी कहना है कि सेना को कानून-व्यवस्था के मामलों को संभालने का प्रशिक्षण नहीं मिला होता सो नौजवानों को गरजती बंदूकों के बीच आने और अपनी जान गंवाने से बाज आना चाहिए. उन्होंने ने कहा कि 'जब भी मानवाधिकारों का उल्लंघन होता है, हालात ज्यादा बिगड़ते हैं. कानून-व्यवस्था की बहाली से जुड़ी एजेंसियों को चाहिए कि वे आम नागरिकों के हताहत होने के मामले में जीरो टॉलरेंस का रवैया अपनाएं.'

कोई भी पार्टी नहीं कर सकती सार्वजनिक सभा

भट का कहना है कि गुस्सा सिर्फ पीडीपी के ही खिलाफ नहीं बल्कि दक्षिण कश्मीर में जारी मुख्यधारा की पूरी राजनीति को लेकर भड़का है. लगातार जारी हत्याओं के बाद गुस्से के माहौल में और ज्यादा तेजी आई है.

भट ने बताया कि 'इसी वजह से हमारा सियासी आंदोलन शोपियां के सिर्फ मुख्य शहरी इलाके के सर्किट हाउसों तक सिमटकर रह गया है. उग्रवादियों की हमले के खतरे के आगे किसी भी पार्टी में इतनी कूबत नहीं रह गई है कि वह इलाके में कोई सार्वजनिक सभा करके दिखाएं क्योंकि तब पार्टी के कार्यकर्ता उग्रवादियों का निशाना बन सकते हैं.'

वकालत के पेश में रह चुके युसूफ भट ने शोपियां के तथाकथित बलात्कार और हत्या की घटना से जुड़े जन-आक्रोश की अगुवाई की थी. उन्हें शोपियां विधानसभा क्षेत्र में पड़े 30 हजार वोट में से 15 हजार वोट हासिल हुए थे.

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भट्ट ने कहा कि 'लोगों ने जिन बातों के लिए मुझे वोट डाले आज मैं वही काम नहीं कर पा रहा. इसकी एकमात्र वजह ये है कि मेरे इलाके में मानवाधिकारों का उल्लंघन हो रहा है और मैं लोगों से मिल नहीं पा रहा.' भट्ट ने बताया कि कुछ इलाकों में सेना ही लोगों के मानवाधिकारों का उल्लंघन कर रही है.

किसी काम की कोई जवाबदेही नहीं

एजाज अहमद मीर ने फ़र्स्टपोस्ट को बताया कि 'बीते चार महीने से मैं अपने निर्वाचन-क्षेत्र में नहीं जा सका हूं. वहां जलसा करा लेना कोई मुश्किल काम नहीं लेकिन हमें ये बात समझनी होगी कि कार्यकर्ता उग्रवादियों के निशाने पर आ सकते हैं. लेकिन इन बातों का ये भी मतलब नहीं कि प्रशासन ठप पड़ा है, अपना काम नहीं कर रहा. मुश्किल सिर्फ ये है कि जमीन पर किसी काम की कोई जवाबदेही नहीं रह गई है.'

मीर ने कहा कि जो लोग सोशल नेटवर्किंग साइट पर लिखते हैं वो वोट नहीं डालते और जो लोग उग्रवादियों के बारे में नई-नई जानकारियां देते रहते हैं वो भी वोट करने नहीं आते. जो लोग वोट डालते हैं वे हमसे मिलते हैं, हमसे कब्रिस्तानों की चारदीवारी उठाने की बात कहते हैं, गलियों और सड़कों के बारे में बताते हैं. लेकिन इन बातों का मतलब सिर्फ इतना भर नहीं कि कश्मीर में मसला केवल लोगों को रोजगार मुहैया कराने से जुड़ा है.

कश्मीर घाटी में सिर्फ पीडीपी के लिए ही नहीं बल्कि मुख्यधारा की पूरी राजनीति के लिए जगह सिकुड़ती जा रही है. ये बात यासिर रिशी ने कही. यासिर रिशी जम्मू-कश्मीर के विधान-परिषद में पीडीपी के सदस्य हैं. उन्होंने कहा कि कश्मीर में बंदूकों को गरजते दस साल हो चुके थे तब पीडीपी की स्थापना हुई और पीडीपी ने अपनी तरफ से समस्या नहीं खड़ी की बल्कि हमेशा समस्या का समाधान तलाशने की कोशिश की है.

यासिर रिशी.

यासिर रिशी.

यासिर रिशी ने कहा, 'अगर आप मानते हैं कि इन बच्चों की हत्या की घटनाओं के लिए महबूबा मुफ्ती दोषी हैं तो फिर ये बात हुर्रियत कांफ्रेंस के लिए भी सही है जो हिंसा का उपदेश दिया करती है.' यासिर रिशी के मुताबिक- 'हमें अपने बच्चों को समझाना होगा कि जिन लोगों के हाथ में बंदूक है, उनपर तुम पत्थर नहीं चला सकते.'

लेकिन घाटी में हालात तेजी से संगीन होते जा रहे हैं और ऐसे में यासिर रिशी और उन जैसे हिंदुस्तान के हिमायती राजनेताओं की जमात कश्मीर में बड़ी बेचैनी के आलम में हाथ-पांव मार रही है, चाह रही है कि एक वक्त से जारी सियासी समस्याओं का कोई समाधान निकले. सियासी तौर पर कोई पेशकदमी हो इसके लिए इन राजनेताओं की बेचैनी बेशक समझी जा सकती है. दरअसल, सियासी पेशकदमी के सहारे शांति का कोई रास्ता निकलने से ही ये तय होना है कि लड़ाई के मैदान में तब्दील होती कश्मीर घाटी में इन नेताओं का सियासी वजूद कायम रहेगा या नहीं.

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