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कुलभूषण जाधव के परिवार से पाक का अमानवीय रवैया घटिया कूटनीति का नमूना

पाकिस्तान ने अपने दरवाजे हमारे लिए खोले हैं लेकिन यह दिखाने के लिए कि उसके भीतर कितना अंधेरा और कितनी नीचता है

Sandipan Sharma Sandipan Sharma Updated On: Dec 28, 2017 09:17 AM IST

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कुलभूषण जाधव के परिवार से पाक का अमानवीय रवैया घटिया कूटनीति का नमूना

पाकिस्तानी भारत आते हैं तो हम उन्हें जयपुर में बिरयानी, अजमेर में ज़ियारत और आगरे में डिनर की पेशकश करते हैं. लेकिन दो भारतीय, जिसमें एक मां थी और दूसरी उसकी बहू, पाकिस्तान पहुंचते हैं तो उन्हें सिर्फ अपमान मिलता है. यही इन दो देशों, उनकी संस्कृति और भाव-भूमि का फर्क है. एक मेहमाननवाजी का सिरमौर है तो दूसरा चोट पहुंचाने वाले दिमागी खेल खेलने का उस्ताद!

भुला दें थोड़ी देर के लिए कुलभूषण जाधव और इस बात को कि उन्होंने जासूसी में कोई भूमिका निभाई है, जैसा कि प्रचार किया जा रहा है. कुलभूषण जाधव का कोई दोष है या नहीं- इस बहस को थोड़ी देर के लिए एक तरफ करते हुए फिलहाल हम यही सोचें कि पाकिस्तान ने उन दो औरतों के साथ क्या सलूक किया जिन्हें उसने मानवता के नाते और सद्भाव दिखाने के गरज से अपनी सरजमीं पर बुलाया था. अभी बस इसी को परखें कि पाकिस्तान ने मेजबान के रूप में कैसा बरताव किया.

ऐसा बस पाकिस्तान में ही संभव

इस दुनिया का कौन-सा देश होगा जो बदकिस्मत और अंदर से टूटी-बिखरी दो औरतों को बुलाएगा और फिर उन्हें चोट पहुंचाएगा, अपमानित करेगा? एक बुजुर्ग औरत को ‘कातिल की मां’ का नाम देगा और एक पत्नी से ड्रेस-कोड के बहाने उसके गहने और जूते उतरवाएगा? ऐसा सिर्फ पाकिस्तान में ही हो सकता है.

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जान पड़ता है, जाधव की मां और पत्नी को न्यौता देने के बहाने पाकिस्तान ने नैतिक रुप से पतित लोगों के लिए किसी नाटक की पटकथा तैयार कर रखी थी. लगता है, पाकिस्तान के शैतानी फितरत वाले आईएसआई ने एक नाटक खेला, उसकी मंशा इन दो औरतों को अपने मनोवैज्ञानिक चक्रव्यूह से घेरने और इसी बहाने 125 करोड़ लोगों के देश को फांसने की थी. 'इस्लामी सद्भाव' का ‘मानवतावादी अमल’ जिसका मकसद अपने को दिल का उदार जताने का था, दरअसल निहायत ओछे दर्जे की कूटनीति थी. इस कूटनीति का मकसद था भारत को चोट पहुंचाना, अंतर्राष्ट्रीय मंच पर शोर पैदा करके अपनी तरफ दुनिया के मुल्कों का ध्यान खींचना और अपने देश के भीतर खून की प्यासी जमात को संतुष्ट करना.

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पाकिस्तान को है गहरी बीमारी

कोई मेजबान अगर अपने मेहमान पर शिकारी कुत्ते छोड़े तो दरअसल उसपर दया की जानी चाहिए. दरअसल उसके दिमाग को जांच की जरुरत है कि कहीं उसे गहरा रोग तो नहीं लगा. पाकिस्तान की भर्त्सना होनी चाहिए, उसको उसी की जबान में जवाब दिया जाना चाहिए. साथ ही, हमें इस बात की भी चिंता करनी होगी कि उसको एक गहरी बीमारी ने जकड़ रखा है.

भारत सीमा पार से बुलाए अपने मेहमान के साथ जो सलूक करता है वह किसी भी देश के लिए एक नजीर हो सकता है. करगिल जैसा खूनी खेल रचने वाला जब द्विपक्षीय बातचीत के लिए भारत पहुंचा तो हमने उसकी खातिरदारी की, व्यंजन परोसे, हालांकि उस वक्त हमारा खून खौल रहा था कि इस शख्स ने भारत को एक युद्ध में उलझाया जिसमें हमारे कई जांबाज सैनिक शहीद हुए. जब करगिल जैसे विध्वंस का खेल रचने वाले उस प्रधानमंत्री ने अपनी रिहाइश पर विवाह-समारोह का आयोजन किया तो हमारे प्रधानमंत्री ने ना सिर्फ उसे फूलों का गुलदस्ता भेजा बल्कि बीच यात्रा में अचानक रास्ता बदलकर उसके परिवार की इस खुशी में शरीक होने के लिए पहुंचे. और जब हमारे प्रधानमंत्री ने अपने कार्यकाल की शुरुआत की तो उन्होंने ना सिर्फ जंग और दुश्मनी ठानने वाले ऐसे नेताओं को बुलावा भेजा बल्कि उनकी माताओं के लिए उपहार भी भिजवाए.

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वसुधैव कुटुंबकम् का ये सिला!

जब पाकिस्तान का कोई बीमार नागरिक हमारे विदेश मंत्री से मदद की आस लिए मिलता है तो विदेश मंत्री निजी तौर पर हस्तक्षेप करते हुए मदद करती हैं ताकि उन्हें वीजा मिल जाए और समय रहते भारत के अस्पताल में उपचार हासिल हो सके. जब पाकिस्तान के अभिनेता, गायक और कलाकार काम मांगते हुए हमारे मुल्क का दरवाजा खटखटाते हैं तो हमारा मनोरंजन उद्योग बाहें पसारकर उनका स्वागत करता है. और जब कुछ हिन्दुस्तानी नागरिक इस बात को लेकर नाराज होते हैं कि दुश्मनों के साथ मोहब्बत का बरताव किया जा रहा है तो हिंदुस्तान के ही उदारवादी नागरिक मेहमानों की तरफदारी में यह कहते हुए उठ खड़े होते हैं कि हमारा आदर्श वसुधैव कुटुम्बकम् (सारा संसार ही एक परिवार है) का है, ‘अतिथि देवो भव’ का है.

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अपने साथी भारतीयों से मैं कहूंगा कि बेशक गुस्सा कीजिए लेकिन अपने ऊपर गर्व भी होना चाहिए. मेहमानों के साथ अमानवीय बरताव करके पाकिस्तान ने फिर से उस विचार को सच साबित किया है जिसका नाम भारत है, साथ ही उसका अपना छल-छद्म, क्रूरता और वहशीपना भी दुनिया के सामने जाहिर हुआ है.

पाकिस्तान ने अपने दरवाजे हमारे लिए खोले हैं लेकिन यह दिखाने के लिए कि उसके भीतर कितना अंधेरा और कितनी नीचता है.

आइए, हम भी किसी मुन्नाभाई की तरह पाकिस्तान को इसी प्रार्थना के साथ फूल भेजें कि उसकी बीमारी जल्दी ठीक हो.

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