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पद्मावती विवाद: शाही अतीत पर बर्बरता का समर्थन किस संविधान का पालन है?

क्या यह अपनी आजादी के परचम लहरा रही भारत की उन प्रेरणास्पद बेटियों के लिए चेतावनी है कि अंतत: उन्हें सती समर्थक समाज में ही रहना है, इसीलिए फड़फड़ाने से बाज आ जाएं?

Updated On: Nov 22, 2017 06:46 PM IST

Anant Mittal

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पद्मावती विवाद: शाही अतीत पर बर्बरता का समर्थन किस संविधान का पालन है?

राजशाही और उपनिवेशवाद के खात्मे और लैंगिक बराबरी वाला लोकतांत्रिक संविधान अंगीकार करने के करीब सात दशक बाद भारत अपने कथित शाही अतीत पर बर्बरता की प्रागैतिहासिक हदें पार करने को आतुर है! गोमाता के बाद अब पद्मावती हमारी राष्ट्रमाता हैं. महज ढाई घंटे की फिल्म और उसके कुछ काल्पनिक किरदारों को निभाने वाले कलाकारों अथवा निर्माता-निर्देशकों को सरेआम सर उडाने की तालिबानी धमकियां देकर यह जुनूनी लोग क्या सरदार पटेल की विरासत को पावों तले नहीं रौंद रहे? ऐसी विकट धमकियों के बावजूद सरदार पटेल की शान में कसीदे पढ़ने वाले हमारे शासकों की चुप्पी क्या जता रही है?

आखिर पाटीदारों, किसानों,पशुपालकों के नेता और लंदन रिटर्न बैरिस्टर एवं आजाद भारत के पहले उपप्रधानमंत्री-गृहमंत्री वल्लभ भाई पटेल ने ही तो रियासतों का एकीकरण किया था. महात्मा गांधी के इस समर्पित अनुयायी ने अपनी गिरती सेहत के बावजूद रियासती सदरों को अपना राजपाट छोड़ शराफत से भारत नामक संघ में अपनी रियासत विलीन करने को मनाया था.

क्या सूझबूझ रही

जरा याद कीजिए हैदराबाद के हेकड़ निजाम का प्रसंग. सरदार ने उसके हिंसक और बर्बर रजाकारों के बावजूद कितने धैर्य और सूझबूझ से बिना खून बहाए उतनी बड़ी और रणनीतिक महत्व की रियासत को भारत का गण बना लिया. यह भी कल्पना कीजिए कि आधुनिक लोकतांत्रिक, प्रभुतासंपन्न भारत के निर्माताओं की चौकड़ी में शामिल सरदार पटेल ने साल भर में अलग-अलग भाषाओं-बोलियों, रीति-रिवाजों और मिजाज वाली 500 रियासतों को काल की डाल पर सदियों से इतराते भारत की वेणि में दृढ़ता की बुनियाद पर कितनी खूबसूरती और सहजता से गूंथा था.

सरदार के उस करिश्मे को उनके अन्य तीनों साथियों महात्मा गांधी, जवाहरलाल नेहरू और डॉ भीमराव अंबेडकर का भी भरपूर नैतिक, सामरिक और कानूनी समर्थन हासिल था. उस करिश्मे को सरदार की निजी उपलब्धि बताना जल्दबाजी इसलिए होगी क्योंकि विरासत के दंभ में फूले उन राजे-रजवाड़ों के पैरों के नीचे से कालीन यानी प्रजा का समर्थन तो बापू अपने त्याग और समर्पण से जनता के मन में आजादी की लौ जगाकर पहले ही खींच चुके थे.

बाद में अपनी पूर्व प्रजा के समान भारत के सामान्य नागरिक बन चुके पूर्व राजे-रजवाड़ों की अंतिम सामंती निशानी प्रिवीपर्स भी इस देश की बेटी तथा पहली महिला प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने ही खत्म करने का साहस किया था. उसके बावजूद उसी सामंती अतीत की कथित बेटी की आन के नाम पर आज भारत की एक प्रख्यात, बेकसूर एवं कर्तव्यनिष्ठ बेटी की नाक काटने का फरमान जारी कर कुछ लोग बर्बरता पर उतारू हैं!

बलिदान के बगैर आधुनिक भारत कल्पना से परे

इतिहास में उल्लिखित राजपूतों और अन्य सभी जातियों तथा वर्गों के योद्धाओं के बलिदान को याद रखे बिना आधुनिक भारत कल्पनातीत है. पुरानी कहावत है कि अपने नायकों को भूल जाने वाले देशों को काल के गाल में समाने में देर नहीं लगती. हमारे देश में तो विदेशी आक्रांताओं के सामने घुटने टेकने के बजाए अपने सम्मान की खातिर घास की रोटी कबूलने वाले महाराणा प्रताप के कथित वंशज गाड़ुलिया लुहारों का उदाहरण आज भी मौजूद है जिन्होंने आजादी के बाद सरकार की तमाम कोशिशों के बावजूद राणा की आन की खातिर कहीं बसना कबूल नहीं किया.

बहरहाल पद्मावती को राष्ट्रमाता बताने वाले मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान से यह सवाल पूछना तो देशद्रोह नहीं होगा न कि वे करीब 16,000 क्षत्राणियों के साथ जौहर यानी आत्महत्या करने को मजबूर क्यों हुईं? यह शायद तत्कालीन पितृ सत्तात्मक समाज की कुरूपता ही थी कि देश की आन-बान-शान के लिए शहीद होने वाले रणबांकुरों की विधवाओं को बच्ची-बूढ़ियों सहित आत्महत्या के लिए मजबूर होना पड़ता था?

तो फिर शौर्य और मर्यादा के कथित प्रतीक वो राज्य विषमता की कितनी गहरी बुनियाद पर खड़े थे? उनकी शासन प्रणालियां कितनी कमजोर थीं? वैसी विषम सामाजिक व्यवस्था की प्रशंसा में मरने-मारने पर उतारू हम लोग लैंगिक बराबरी और जानमाल की सुरक्षा पर आधारित समाज की स्थापना की गारंटी देते अपने संविधान को कहीं बेआबरू तो नहीं कर रहे?

क्या हमारी सरकार इतनी कमजोर है?

हमारा संविधान और कानून हमें बताता है कि आत्महत्या अपराध है और सिर्फ कमजोर मानस वाले या निरूपायता के शिकार लोग ही उसकी राह चुनते हैं. तो क्या यह मान लें कि मध्यप्रदेश, राजस्थान, उत्तरप्रदेश, हरियाणा और पंजाब के मुख्यमंत्रियों द्वारा उसी संविधान पर उंगली उठाई जा रही है जिसकी बदौलत वे उन्हीं नागरिकों पर शासन करते हैं जो उन्हें चुनकर राजसत्ता सौंपते हैं?

क्या हमारी सरकार आज इतनी कमजोर पड़ गईं कि कानून-व्यवस्था बिगाड़ने की जरा सी आशंका उन्हें घुटने टेकने पर मजबूर कर देती है? किसी काल्पनिक कथानक पर बनी फिल्म पर रोक अथवा पुनर्विचार की वकालत करके क्या वे उन लोगों का परोक्ष समर्थन नहीं कर रहे जो अपने ही साथी नागरिकों के सर पर करोड़ों रूपए के इनाम का गैरकानूनी एलान कर रहे हैं?

यहां सवाल यह भी है कि ऐसी रूढ़ और बर्बर मानसिकता दिखा कर हम अपने संविधान की ताकत के बूते खाप पंचायतों की गिरफ्त से आजाद होने को संघर्षरत हमारी बेटियों को कहीं निरूत्साहित तो नहीं कर रहे? अथवा यह अपनी आजादी के परचम लहरा रही भारत की उन प्रेरणास्पद बेटियों के लिए चेतावनी है कि अंतत: उन्हें सती समर्थक समाज में ही रहना है, इसीलिए फड़फड़ाने से बाज आ जाएं!

दीपिका सिर्फ कलाकार ही नहीं प्रकाश पादुकोण की बेटी भी हैं

अफसोस यह है कि नाक काटने की धमकी की शिकार दीपिका पादुकोण अपने जीवंत अभिनय के बूते दुनिया भर में करोड़ों दिलों की मलिका ही नहीं बल्कि भारत के गौरवाशाली बेटे प्रकाश पादुकोण की बेटी भी हैं.

प्रकाश ने ही हमें 200 साल गुलाम रखनेवाले ब्रिटेन की धरती पर अपनी लगन और मेहनत के बूते पहली बार बैडमिंटन का अंतरराष्ट्रीय खिताब'आॅल इंगलैंड चैंपियनशिप' जीत कर भारत और करोड़ों देशवासियों की नाक उंची की थी. इसके बावजूद लोग उन्हीं की बेटी की नाक काटने पर उतारू हैं वह भी तब जबकि हमारी ही दूसरी बेटी मानुषी शिल्लर हमारे चिर प्रतिद्वंद्वी चीन में पूरी दुनिया पर भारतीय सौंदर्य और मेधा का सिक्का जमाकर 'मिस वर्ल्ड' का ताज जीत लाईं!

वैसे भी कानून और संविधान रक्षित आधुनिक भारत में किसी स्त्री कलाकार की नाक काटने की धमकी देकर कोई भी नागरिक कानून की गिरफ्त से कैसे बच सकता है? लेकिन सर और नाक काट लाने पर इनाम घोषित करने वाले जुनूनी और इतिहास से अनभिज्ञ इन लोगों का हमारा कानून बाल भी बांका नहीं कर पा रहा!

विडंबना यह है कि बीकानेर जिले के देशनोक कस्बे में जिन करणी माता के नाम पर बनी करणी सेना नाक या सर कलम करने के एलान किए जा रही है वे इतनी दयालु देवी हैं कि मनुष्य के सबसे बड़े दुश्मन 'चूहों' को भी अपने मंदिर में भक्तों से दूध पिलवाती हैं!

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