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पद्मावत: SC के फैसले के बावजूद ये हिंसक विरोध लोकतंत्र पर हमला है

किसी को कोई हक नहीं है कि वह मानवीय सभ्यता की विनाश-गाथा कानूनी व्यवस्था को ताक पर रखकर लिखे

Sushil K Tekriwal Sushil K Tekriwal Updated On: Jan 25, 2018 01:43 PM IST

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पद्मावत: SC के फैसले के बावजूद ये हिंसक विरोध लोकतंत्र पर हमला है

सवाल पद्मावत का नहीं, संविधान से अदावत का है. सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बावजूद फिल्म की रिलीज पर प्रहार संवैधानिक प्रावधानों व कानून का शासन स्थापित रहने की प्रक्रिया की सीधी अवमानना है. साथ ही कानून व्यवस्था के प्रबंधन में चूक करके कई असामाजिक संगठनों को हिंसा करने देने के राज्य सरकारों के फैसले से ऐसा लगता है जैसे सब कुछ प्रायोजित है. किसी खास बिरादरी के आडंबर को संरक्षण देने की आड़ में राज्य सरकारों द्वारा राजधर्म के अनुपालन में चूक करना संविधान की मर्यादाओं का हनन करने जैसा है. हिंसा के तांडव पर अपनाई जा रही यह चुप्पी देश के लोकतंत्र व अर्थतंत्र—दोनों के लिए खतरा है.

अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को भीड़तंत्र ने मानो अगवा कर लिया है. यह परिपाटी काफी खतरनाक है जिसका सीधा असर लोकतंत्र के स्वास्थ्य पर पड़ेगा. संवैधानिक आस्था का अंर्तग्रहण अबाध्य है जिसको हमें अपने विचारों में आत्मसात करना होगा. इन खबरों के वैश्विक प्रसार से देश की आर्थिक छवि को भी धक्का लगेगा और विदेशी निवेश सीधा प्रभावित होगा. ऐसे में केंद्र सरकार और राज्य सरकारों को कानून व्यवस्था का अनुपालन सख्ती से सुनिश्चित करना चाहिए ताकि कुछ मुट्ठी भर छुटभैये लोगों के हाथों संवैधानिक व्यवस्था गिरवी न हो जाए और भारत के प्रत्येक नागरिकों का मौलिक व मानव अधिकार संरक्षित रहे. बजाए इसके सरकार एक तमाशबीन बन गई है.

भारतीय सिनेमा की दुनियाभर में पहचान

मानवीय सवेदनाओं और भावनाओं को व्यक्त करने का एक बहुत ही सशक्त माध्यम है सिनेमा. सिनेमा विज्ञान की एक अद्‌भुत व अनुपम देन है. सिनेमा को बनाने वाले को पूरा हक भारतीय संविधान व कानून देता है कि वह किस रूप में इसे अभिव्यक्त करे. हिंसा के माध्यम से इस अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर हमला दरअसल संविधान के मूल्यों पर एक कातिलाना हमला है. एक खास वर्ग के तथाकथित नुमाइंदे के तौर पर कुछ लोगों की नकारात्मक व विध्वंसक सोच ने देश के बहुसंख्यकों को हाशिए पर खड़ा कर दिया है.

भारत का फिल्म उद्योग आज विश्व के विकसित देशों के समकक्ष खड़ा है. भारतीय फिल्में पड़ोसी देशों, खाड़ी देशों तथा उन देशों में जहां प्रवासी भारतीय बड़ी संख्या में हैं, अच्छा व्यवसाय कर रही हैं. भव्यता और गुणवत्ता की दृष्टि से भारतीय फिल्मों की सराहना पूरी दुनिया में हो रही है. भारतीय फिल्मों के माध्यम से पूरा विश्व भारत को समझता भी है. आज सारा विश्व यह जान गया है कि भारत में संविधान, सर्वोच्च न्यायालय, कानूनी शासन, लोकतंत्र, संवेदनशील सरकारी तंत्र जैसे संस्थान संर्पूणता के साथ काम कर रहे हैं. आज इस संदेश की प्रासंगिकता तथा इसकी सारगर्भितता बनाए रखने की जरूरत है. आज सरकारी तंत्र के सामने यह चुनौती मुंह बाए खड़ी है जिसका निराकरण त्वरित होना चाहिए.

A television journalist sets his camera inside the premises of the Supreme Court in New Delhi February 18, 2014. India's Supreme Court commuted death sentences on three men for involvement in the killing of former prime minister Rajiv Gandhi to life imprisonment on Tuesday because of an 11-year delay in deciding on their petitions for mercy. Gandhi was killed by an ethnic Tamil suicide bomber while campaigning in an election in the southern Indian town of Sriperumbudur in May 1991. REUTERS/Anindito Mukherjee (INDIA - Tags: CRIME LAW POLITICS) - GM1EA2I1FGD01

सुप्रीम कोर्ट फ्रीडम ऑफ स्पीच पर पहले भी टिप्पणी कर चुका है

सुप्रीम कोर्ट ने सिनेमा की अभिवव्यक्ति की स्वतंत्रता पर अपने कई पूर्व में दिए गए फैसलों में स्पष्ट कहा है कि वैचारिक अतिरेकता और विरोधात्मक स्वर हिंसा का सहारा लेकर कलात्मक रचना का गला नहीं घोंट सकते. देश की सबसे बड़ी अदालत ने हमेशा से यह भी कहा है कि संवैधानिक दायरे में परिभाषित अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की पवित्रता और रक्षणियता सर्वोच्च है. हम किसी तुगलकी काल में नहीं जी रहे हैं. मानव सभ्यता के सबसे खूबसूरत क्षणों में हम इस समय जी रहे हैं जहां समरसता और सद्भावना जरूरी है. किसी बात पर असहमति महज होने से किसी सृजन की गर्भ में हत्या नहीं की जा सकती. यह पाप है. इसका विरोध या इस पर प्रतिबंध संवैधानिक और कानूनी दायरों में ही हो सकता है.

सिनेमाई स्वतंत्रता और कलाकारों व पात्रों की अभिव्यक्ति सर्वोच्च है. कोई किसी की हत्या केवल इस कारण से नहीं कर सकता कि वह दूसरे के विचारों से असहमत है. असहमति की बहस में भी स्वस्थ संरचनात्मक मनोविज्ञान और उदार मानस का होना बहुत जरूरी है क्योंकि हम किसी मध्यकालीन सभ्यता में नहीं जी रहे हैं.

किसी को कोई हक नहीं है कि वह मानवीय सभ्यता की विनाश-गाथा कानूनी व्यवस्था को ताक पर रखकर लिखे. ऐसा होने से समाज में अराजकता और कानूनहीनता की स्थिति बनेगी जिसे संभालना असंभव हो जाएगा और कानूनी व्यवस्था के साथ-साथ देश की अर्थव्यवस्था भी चौराहे पर खड़ी मिलेगी.

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