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झारखंड: आखिर किस बात से दुखी हैं पद्मश्री पुरस्कार से सम्मानित किसान सिमोन उरांव!

जलपुरुष सिमोन उरांव ने पिछले 30 साल के अथक परिश्रम से अपने बलबूते पर 8 छोटे-बडे़ तालाब और एक दर्जन से ज्यादा चेक डैम बनाकर गांव की दो हजार एकड़ जमीन पर सिंचाई की सुविधा पहुंचा दी

Brajesh Roy Updated On: Jun 24, 2018 09:12 AM IST

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झारखंड: आखिर किस बात से दुखी हैं पद्मश्री पुरस्कार से सम्मानित किसान सिमोन उरांव!

भारत किसानों का देश है. किसान सिर्फ अन्न ही नहीं उपजाते बल्कि हमारी प्रकृति को सहेजने वाले धरोहर भी माने जाते हैं. यही वजह है कि किसानों के लिए समाज और सरकार हर तरफ से योजनाएं बनाई जाती हैं ताकि हमारे अन्नदाता खुशहाल रहें, समृद्धि पाएं. पर सिद्धांत और व्यवहार में हमेशा से बड़ा फर्क दिखा है. देश के पूर्व प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री ने कभी एक नारा दिया था- 'जय जवान जय किसान'. जिसे आज मुंह चिढ़ा रही है हमारी व्यवहारिक व्यवस्था. देश के जवानों की जगह आज हम ‘किसानों की जय’ को समझने की कोशिश फिलहाल करते हैं. आपको परिचय करवाते हैं एक ऐसे किसान से जिन्हें देश की सरकार ने दो साल पहले पद्मश्री से नवाजा है.

जलपुरुष के नाम से विख्यात किसान पद्मश्री सिमोन उरांव झारखंड की राजधानी रांची के बेड़ो गांव में रहते हैं. 87 वर्षीय आदिवासी किसान सिमोन उरांव का पूरा जीवन जल, जंगल, जमीन और जल संरक्षण के लिए बीत गया. आज दादा सिमोन उरांव उदास हैं, पीड़ा बढ़ती जा रही है. ये पीड़ा राज्य और देश के किसानों के लिए है.

क्या है पीड़ा दादा सिमोन उरांव की...?

जलपुरुष सिमोन उरांव ने पिछले 30 साल के अथक परिश्रम से अपने बलबूते पर 8 छोटे-बडे़ तालाब और एक दर्जन से ज्यादा चेक डैम बनाकर गांव की दो हजार एकड़ जमीन पर सिंचाई की सुविधा पहुंचा दी. कभी एक फसल के लिए अभिशप्त बेड़ो बांध टोली के गांव में आज किसान तीन फसल ले रहे है. लेकिन ऐसी सुविधा और व्यवस्था पूरे राज्य के दूसरे किसी गांव में उपलब्ध नहीं है. यह है दादा सिमोन उरांव की पहली पीड़ा.

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जल संरक्षण और संग्रह के उपाय के लिए पद्मश्री सिमोन उरांव ने ठेठ गंवई अंदाज में काम किया. पहाड़ों से बहकर बेकार हो रहे जल को बिना किसी सरकारी मदद या योजना के, दादा सिमोन उरांव ने चेक डैम बनाकर संग्रहित किया. ढालू जमीन पर बड़े तालाब बनाकर जल को खेतों तक केनाल के माध्यम से पहुंचाया. ये व्यवस्था राज्य के दूसरे हिस्सों में आज भी नहीं दिखती बुजुर्ग किसान सिमोन उरांव को, ये है इनकी दूसरी पीड़ा.

Padmshri Simon Oraon (NEW 1)

अच्छी फसल हो और किसानों को उचित प्रशिक्षण मिले, ये एक बड़ी चाहत है पद्मश्री सिमोन उरांव की. अनपढ़ बुजुर्ग किसान खुद के विषय मे अपने ज्ञान को लेकर बताते हैं कि थोड़ा उपर वाले की मेहरबानी रही और मेरी खेती के प्रति लगन ने मुझे हर कदम पर सिखाया. आज बेहतर खेती के लिए किसानों को प्रोत्साहित करने की जरूरत है जिसका व्यवहारिकता के धरातल पर घोर अभाव है. मिट्टी जांच , अच्छे बीज और भरपूर सिंचाई के साथ किसानों के लिए प्रशिक्षण की व्यवस्था सुनिश्चित नही है, ये है दादा सिमोन उरांव की एक और पीड़ा.

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अन्न भंडारण, फसल के लिए बाजार और उसका सही मूल्य मिले तो किसान के चेहरे पर खुशी, संतोष दिखेगा. लेकिन कागजों और डेटा से बाहर निकलकर ये चीजें जमीनी धरातल पर उतर नहीं पाती, ये है पद्मश्री की पीड़ा. औने-पौने दाम में किसानों को अपना फसल बेचना पड़ता है और बिचौलिये मलाई खाते हैं. इस पीड़ा से आहत हैं सिमोन दादा.

दया के पात्र नहीं हैं किसान!

सिमोन उरांव कहते हैं कि सबसे पहले देश में किसानों को लेकर सहानुभूति के माहौल में सुधार लाने की जरूरत है. किसान सहानुभूति या फिर दया के पात्र नहीं हैं. चमाचम एसी दफ्तर में बैठने वाले नेता और अधिकारियों ने किसानों को अब बेचारा कहना शुरू कर दिया है. सही माहौल और उचित व्यवस्था नहीं मिलने के कारण देश के अन्नदाता मौत को गले लगाने लगे हैं, ये हैं पद्मश्री किसान सिमोन उरांव की सबसे बड़ी पीड़ा.

सिमोन उरांव आगे यह भी कहते हैं कि 'किसान और उसके परिवार को सम्मान देने का कार्य देश की सरकार को करना चाहिए. देश आजाद हुआ था तो किसानों में भी उम्मीद जगी थी आज हम बेचारे हो गए? पहचान हमारी गरीबी की होती है. हाड़ तोड़ मेहनत कर दूसरों को भरपेट भोजन परोसने वाले देश के किसान खुद दो जून के भोजन के लिए अपनी किस्मत को कोसते रहें?'

Padmshri Simon Oraon NEW 2

आज भी है खेती से प्यार

दरअसल सिमोन उरांव खेती किसानी से आज भी बहुत प्यार करते हैं. यही वजह है कि किसानों की पीड़ा उन्हें व्यथित कर देती है. उन्होने अकेले दम पर जल संग्रहण और सिंचाई सुविधा के लिए जो कार्य किया वो अनुकरणीय है. भारत सरकार ने सिमोन उरांव को पद्मश्री सम्मान देकर देश के किसानों को सम्मानित करने का एक संदेश भी दिया. बावजूद इसके किसानों की दिशा और दशा को लेकर पद्मश्री का सवाल खड़ा करना लाजिमी है.

जमीनी हकीकत भी है कि आज किसान बेरोजगारी और पलायन का दर्द झेलने को मजबूर हैं. भरपेट भोजन मिलता और परिवार में माहौल अनुकूल बन पाता तो किसी भी किसान के आत्महत्या की खबर सुर्खियां नहीं बनती. किसी भी सरकार में विपक्ष को बोलने का मौका नहीं मिलता. आलम यह है कि जिस किसान के पास दस बीघा जमीन है वो और उसके बेटे पेट भरने के लिए दिहाड़ी मजदूरी करने को विवश हैं. अपनी जमीन का राजा दूसरे की चौखट रखवाली करता दिखता है.

विडंबना है और मन को देने वाली ये पीड़ा भी है. पद्मश्री सिमोन उरांव ने देश के किसानों के लिए ऐसे समय में आवाज उठाई है जो समय का किसानों का माना जाता है. बारिश के लिए आसमान को ताक रहे किसान अब अपने खेतों का रुख करने वाले हैं. मन में इस साल भी एक उम्मीद है अपनी खुशहाली की, समृद्धि की. बस चाहत है कि सच में इस बार ‘किसानों की जय’ हो जाए...

(लेखक स्वतंत्र पत्रकार हैं)

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