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आखिर करात क्यों येचुरी की जगह माणिक सरकार को बनाना चाहते हैं राष्ट्रीय महासचिव?

हैदराबाद में 18 से 22 अप्रैल के बीच 22 वें कांग्रेस में नए महासचिव पर फैसला होना है

FP Staff Updated On: Apr 11, 2018 05:00 PM IST

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आखिर करात क्यों येचुरी की जगह माणिक सरकार को बनाना चाहते हैं राष्ट्रीय महासचिव?

भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (मार्क्सवादी) में तनातनी बढ़ गई है. पूर्व महासचिव प्रकाश करात और राष्ट्रीय महासचिव सीताराम येचुरी के समर्थक दो अलग-अलग खेमों में बंट गए हैं. दरअसल प्रकाश करात और केरल की लॉबी सीताराम येचुरी को हटाकर त्रिपुरा के पूर्व मुख्यमंत्री माणिक सरकार को राष्ट्रीय महासचिव बनान चाहती है. हैदराबाद में 18 से 22 अप्रैल के बीच 22 वें कांग्रेस में नए महासचिव पर फैसला होना है.

येचुरी फिर से राष्ट्रीय महासचिव बनना चाहते हैं और उनके समर्थकों की नजर भी पूरे घटनाक्रम पर टिकी हैं. केंद्रीय समिति नए महासचिव का चुनाव करती है. इस समिति में करीब 90 सदस्य शामिल हैं. पांच दिवसीय कांग्रेस में नए महासचिव के चुनाव के अलावा भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (मार्क्सवादी) अपनी भविष्य की राजनीतिक रणनीति पर भी बात करेगी.

येचुरी 2019 के लोकसभा चुनाव के मद्देनजर कांग्रेस के साथ गठबंधन करना चाहते हैं. जबकि प्रकाश करात नहीं चाहते कि सीपीआई(एम) कांग्रेस का 'हाथ' थामे. मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी (सीपीएम) 2019 के आम चुनाव में कांग्रेस के साथ कोई गठबंधन नहीं करेगी. कोलकाता में पार्टी की केंद्रीय समिति की बैठक में रविवार को इसको लेकर एक प्रस्ताव पारित किया गया.

त्रिपुरा में हार से कोई सबक नहीं लिया है पार्टी ने 

सीपीएम ने पिछले महीने त्रिपुरा में बीजेपी के हाथों करारी हार से कोई सबक नहीं लिया है. पार्टी मुश्किल में है लेकिन इस पर किसी का ध्यान नहीं जा रहा है. येचुरी और करात के समर्थक एक दूसरे के खिलाफ लड़ रहे हैं.

इससे पहले, पोलित ब्यूरो के सदस्यों में वृंदा करात (70), बीवी राघवुलू (67) एस रामचंद्रन पिल्लई (80) जैसे नेता को येचुरी के उत्तराधिकारी के तौर पर देखा जा रहा था. रामचंद्रन पिल्लई की उम्र आड़े आ रही है. बीवी राघवुलू येचुरी के मुकाबले फिलहाल नौसिखिया है. वृंदा करात पर भाई-भतीज का आरोप लगाया जा सकता है क्योंकि वो प्रकाश करात की पत्नी हैं. ऐसे में 69 साल के माणिक सरकार बड़े दावेदार के तौर पर सामने आए हैं. उनके समर्थकों को लगता है कि वो येचुरी को हरा देंगे.

पार्टी के संविधान में एक महासचिव को अधिकतम तीन बार लगातार चुनने की अनुमति होती है. करात को 2012 में तीसरे कार्यकाल के लिए फिर से निर्वाचित किया गया था. यानी 2005 से 2015 के बीच वो करीब 10 साल तक पार्टी की मदद करते रहे.

कहा जा रहा है कि येचुरी हरकिशन सिंह सुरजीत की राह पर चल रहे हैं. उन्होंने 1996 से 2000 के बीच बीजपी के खिलाफ बाकी दलों को एक जुट करने में अहम रोल निभाया था. वहीं काम येचुरी करना चाहते हैं.

माणिक सरकार की दावेदारी पर उठ रहे हैं सवाल 

पार्टी के अंदर कुछ लोग माणिक सरकार की दावेदारी पर सवाल उठा रहे हैं. उनका कहना है कि सरकार की साफ छवि जरूर है लेकिन वो त्रिपुरा में बीजेपी को हराने में कामयाब नहीं हुए. पश्चिम बंगाल के कई नेताओं का मानना है कि अगर कांग्रेस सहित सभी बीजेपी-विरोधी दल एक साथ आ जाए तो परिणाम अलग होंगे.

2013 के विधानसभा चुनावों में, बीजेपी को सिर्फ 2 प्रतिशत वोट मिले थे और एक को छोड़ बाक़ी सभी उम्मीदवारों की जमानत जब्त हो गई थी. इस साल मार्च में इसके विपरीत बीजेपी को 43 फीसदी वोट मिले और उन्हें 35 सीटों पर जीत मिली. जबकि सीपीएम को 42 फीसदी वोट के साथ सिर्फ 16 सीटों पर जीत मिली. ऐसे में ये साफ है कि अगर सारे विरोधी दल बीजेपी के खिलाफ एक साथ लड़े तो नतीजे अलग हो सकते हैं.

कहा जा रहा है कि माणिक सरकार युवाओं से खुद को कनेक्ट नहीं कर पाए. त्रिपुरा में युवा बेरोजगारी से परेशान थे. राज्यों और संघ शासित प्रदेशों की सूची में त्रिपुरा में सबसे ज्यादा बेरोजगारी है. लिहाजा कई लोग पार्टी से दूर चले गए.

पिछले साल, एबीवीपी को छात्र संघ के चुनाव में 27 सीटों पर जीत मिली थी. जबकि राज्य में 22 सरकारी कॉलेज थे, फिर भी सरकार ने कुछ भी नहीं किया. क्या ऐसा नेता कैडर को उत्साहित कर सकता है और राष्ट्रीय स्तर पर सीपीएम के लिए उम्मीदें जगा सकता है.

तमिलनाडु, त्रिपुरा, आंध्र, तेलंगाना, महाराष्ट्र, केरल और पश्चिम बंगाल के सदस्यों का केंद्रीय समिति और पोलितब्यूरो में वर्चस्व रहा है. माणिक सरकार के लिए समर्थन जुटाने के लिए करात मंगलवार को अगरतला गए थे.

यानी करात और येचुरी के खेमे में ज़ोरदार मुकाबले की उम्मीद की जा रही है.

(न्यूज 18 के लिए के बेंडिक्ट की रिपोर्ट) 

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