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जब देश के नए CEC ओपी रावत को कार से कुचलने की कोशिश हुई थी

ओपी रावत नियम-कायदे से काम करने वाले अफसर माने जाते रहे हैं. यदि काम नियमों के खिलाफ है तो रावत पर दबाव बनाकर भी काम लेना संभव नहीं होता

Dinesh Gupta Updated On: Jan 22, 2018 09:50 AM IST

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जब देश के नए CEC ओपी रावत को कार से कुचलने की कोशिश हुई थी

ओपी रावत नियम-कायदे से काम करने वाले अफसर माने जाते रहे हैं. जो नियमानुसार है, उसे करने में कोई दिक्कत उन्हें नहीं होती. यदि काम नियमों के खिलाफ है तो रावत पर दबाव बनाकर भी काम लेना संभव नहीं होता. आईएएस की नौकरी से उनका रिटायरमेंट दिसंबर 2013 में हो गया था. वे उत्तरप्रदेश मूल के हैं. 1977 बैच के आईएएस अधिकारी श्री रावत मध्यप्रदेश में कई महत्वपूर्ण पदों पर रहे हैं.

उन पर कभी भी किसी राजनीतिक दल का समर्थक होने का ठप्पा नहीं लगा. उन्होंने कांग्रेस सरकारों के मुख्यमंत्री रहे अर्जुन सिंह, मोतीलाल वोरा और दिग्विजय सिंह के साथ भी काम किया और बीजेपी सरकार के मुख्यमंत्री रहे सुंदरलाल पटवा, उमा भारती, बाबूलाल गौर शिवराज सिंह चौहान के भी प्रिय रहे हैं. सुंदरलाल पटवा जब राज्य के मुख्यमंत्री थे तब उन्होंने रावत को उनकी योग्यता के आधार पर जनसंपर्क विभाग का संचालक नियुक्त किया था. बाबूलाल गौर उन दिनों जनसंपर्क विभाग के मंत्री थे. गौर, रावत की कार्यशैली से काफी प्रभावित रहे हैं. उमा भारती के बाद गौर राज्य के मुख्यमंत्री बने. वे रावत को अपना प्रमुख सचिव बनाकर मुख्यमंत्री सचिवालय में ले आए. रावत के कारण ही राज्य की गौर सरकार कभी विवादों में नहीं आई. गौर, सभी महत्वपूर्ण फैसले रावत से राय लेने के बाद ही करते थे.

रावत को अपने पूरे सेवाकाल में थोड़ी सी असुविधा उमा भारती के मुख्यमंत्री रहते हुई. उमा भारती ने रावत को एक्साइज कमिश्नर नियुक्त किया था. यह पद कमाई वाला पद माना जाता है. रावत इस पद को स्वीकार नहीं करना चाहते थे. उमा भारती से उन्होंने ट्रांसफर कैंसिंल करने का आग्रह किया. लिखित में भी आग्रह किया. उमा भारती ने वादा करके भी आर्डर कैंसिल नहीं किया. मजबूरन ओपी रावत को एक्साइज कमिश्नर का पद स्वीकार करना पड़ा. एक्साइज कमिश्नर के तौर उन्होंने शराब की दुकानों की नीलामी लॉटरी के जरिए करने की नीति को लागू किया. इसके कारण राज्य की रिकॉर्ड आबकारी आय हुई.

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सुरेश पचौरी को भी मिला है रावत के अनुभव का लाभ

ओपी रावत के लिए रक्षा मंत्रालय की पदस्थापना काफी चुनौतीपूर्ण रही है. रक्षा मंत्रालय में वे मई 93 से जून 98 तक पहले संचालक फिर ज्वाइंट सेक्रेट्री रहे हैं. हथियारों की खरीदी का महत्वपूर्ण काम वे देखते थे. इस दौरान उनके साथ दो अप्रिय घटनाएं घटित हुईं. एक घटना में उनकी कार को कुचलने की कोशिश की गई. दूसरी घटना लोधी रोड पर टहलते वक्त अचानक एक पेड के गिर जाने की है. इस घटना में रावत और उनकी पत्नी मंजू रावत को गंभीर चोटें आईं थी. दिल्ली के एम्स में उनका इलाज चला. मामले की जांच में यह तथ्य सामने आया कि रक्षा सौदे की एक फाइल पर निगेटिव नोट के चलते प्रभावित कंपनी ने रावत को रास्ते से हटाने की कोशिश की थी. रावत के फर्जी हस्ताक्षर से डिफेंस सप्लाई का एक फर्जी आर्डर भी तैयार किया गया था.

कार एक्सीडेंट के बाद ओपी रावत जब तक रक्षा मंत्रालय में रहे उन्होंने सरकारी गाड़ी का उपयोग नहीं किया. हमले की आशंका हमेशा ही बनी रहती थी. वे दिल्ली में सिर्फ डीटीसी के बस से ही सफर करते थे. पी.वी. नरसिंहराव की सरकार में मध्यप्रदेश कांग्रेस के नेता सुरेश पचौरी को रक्षा मंत्रालय में राज्य मंत्री बनाया गया था. उस दौरान रावत ने मंत्रालय को चलाने में पचौरी की काफी मदद की.

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वन भूमि के पट्टे दिलाने में मिला अवार्ड

मध्यप्रदेश देशभर के उन राज्यों में अग्रणी है जिन राज्यों में वन अधिकार अधिनियम का श्रेष्ठ क्रियान्वयन किया गया है. मध्यप्रदेश में इसका श्रेय ओपी रावत को ही जाता है. देश में वन अधिकार कानून वर्ष 2006 में लागू किया गया. मध्यप्रदेश में बड़ी संख्या में आदिवासी वन क्षेत्र में निवास करते हैं. कानून के क्रियान्वयन की जिम्मेदारी राज्य के आदिवासी विभाग को दी गई. ओपी रावत विभाग में जून 2007 में पदस्थ किए गए. उन्होंने वन भूमि के पट्टे देने का काम तेजी से क्रियान्वित किया. उनके कार्यकाल में वन अधिकार अधिनियम के तहत एक लाख तीन हजार 28 दावों में हक प्रमाण-पत्र वितरित बांटे गए. इसके कारण मध्यप्रदेश वन अधिकार कानून के अमल में देश में पहले नबंर पर रहा. रावत को तत्कालीन प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह ने अवार्ड भी दिया.

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रावत ने अपने कैरियर की शुरूआत अविभाजित मध्यप्रदेश के सरगुजा जिले से सहायक कलेक्टर के तौर पर की. वे नरसिंहपुर और इंदौर के कलेक्टर रहे. संचालक शहरी विकास, जनसंपर्क, आयुक्त महिला एवं बाल विकास विभाग, सहकारिता विभाग, रहे हैं. कृषि, वाणिज्य एवं उद्योग, आदिम जाति कल्याण विभाग के वे प्रमुख सचिव रहे हैं. मुख्य सचिव के वेतनमान में रहते हुए सरकार ने उनकी पदस्थापना नर्मदा घाटी विकास विभाग में की थी. बाद में भारत सरकार में भारी उद्योग मंत्रालय के सचिव बन गए. उनका रिटायरमेंट भी केंद्र सरकार से ही हुआ है. रावत उन अधिकारियों में हैं, जिन्होंने रिटायरमेंट के बाद पद की मांग के लिए नेताओं के चक्कर नहीं लगाए.

निजी यात्रा को सरकारी नहीं बनाते हैं

फिजिक्स से पोस्ट ग्रेजुएट ओपी रावत के बारे में यह जानकारी कम ही लोगों को है कि वे ज्यादा सरकारी सुख-सुविधाओं के उपयोग से बचते रहते थे. जिस श्रेणी की पात्रता उन्हें है, उतनी ही सुविधाएं उन्होंने स्वीकार की. रावत ने अपनी निजी अथवा पारिवारिक यात्रा को कभी भी सरकारी यात्रा का रूप देने की कोशिश नहीं की. उनके पूरे कैरियर में केवल एक मौका ऐसा आया था, जब किसी मंत्री ने अप्रत्यक्ष तौर पर पैसे की मांग की थी.

ओपी रावत केंद्र सरकार से डेप्यूटेशन से वापस लौटे तो दिग्विजय सिंह सरकार ने उन्हें ग्रामीण विकास विभाग का सचिव नियुक्त कर दिया. विभाग के मंत्री छत्तीसगढ़ मूल के थे. उन्होंने रावत को बंगले पर बुलाया. एक वरिष्ठ पत्रकार भी वहां मौजूद थे. उनकी मौजूदगी में ही मंत्री जी ने अपने काम के तरीके बारे में बताते हुए कहा कि मैं आईएएस अफसरों से पैसा भी लेता हूं और डांटता-फटकराता भी हूं. रावत ने दो टूक शब्दों में कह दिया कि पैसे की उम्मीद मुझसे न रखें.

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