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दिल्ली सीलिंग: व्यापारियों के जख्मों में अपना इलाज खोज रही राजनीतिक पार्टियां!

वोट की राजनीति की दास्तान यह है कि दिल्ली की सभी राजनीतिक पार्टियां इस वक्त कारोबारियों के साथ सुर में सुर मिला कर दिल्ली बंद में साथ दे रही हैं

Ravishankar Singh Ravishankar Singh Updated On: Jan 23, 2018 10:52 PM IST

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दिल्ली सीलिंग: व्यापारियों के जख्मों में अपना इलाज खोज रही राजनीतिक पार्टियां!

दिल्ली में चल रही सीलिंग की कार्रवाई के विरोध में मंगलवार को कारोबारियों का दिल्ली बंद काफी असरदार रहा. कारोबारियों ने हाथ में कटोरा लेकर दिल्ली की सड़कों पर उतर कर सीलिंग की कार्रवाई का जमकर विरोध किया. सुप्रीम कोर्ट की मॉनिटरिंग कमेटी के निर्देश पर पिछले कुछ दिनों से दिल्ली में सीलिंग की कार्रवाई चल रही है. इस कार्रवाई को लेकर दिल्ली के कारोबारियों में काफी आक्रोश है. दिल्ली के पॉश इलाकों से शुरू हुई सीलिंग की यह कार्रवाई अब दिल्ली के दूसरे इलाकों में भी शुरू कर दी गई है.

मंगलवार को दिल्ली के 2 हजार से ज्यादा व्यापारिक संगठन और लगभग 7 लाख कारोबारियों ने दिल्ली के कारोबार को पूरी तरह बंद कर दिया. इस बंद को अहम माना जा रहा क्योंकि दिल्ली की सत्ता पर काबिज आम आदमी पार्टी, एमसीडी की सत्ता पर काबिज बीजेपी और कांग्रेस पार्टी के व्यापारिक संगठनों का भी इस बंद को समर्थन मिला है. इस बंद से खासकर दिल्ली की दुकानों के साथ होटल व्यवसाय पर भी असर पड़ा है.

कारोबारियों के संगठन (कॉन्फेडरेशन ऑफ ऑल इंडिया ट्रेडर्स) कैट का कहना है कि सुप्रीम कोर्ट की आड़ में दिल्ली नगर निगम 1957 के मूलभूत प्रावधानों का उल्लंघन कर रहा है. सीलिंग के नाम पर एमसीडी द्वारा दिल्ली के कारोबारियों को बेवजह परेशान किया जा रहा है.

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दूसरी तरफ दिल्ली में हो रही सीलिंग की कार्रवाई को राजनीतिक दलों द्वारा साधने की भी कवायद शुरू हो गई है. दिल्ली की तीन बड़ी राजनीतिक पार्टियां आम आदमी पार्टी, कांग्रेस और बीजेपी व्यापारियों को लामबंदी करने में कोई कोर कसर नहीं छोड़ना चाहतीं. दिल्ली सरकार के मंत्री और आप के प्रदेश अध्यक्ष गोपाल राय ने मंगलवार को सैकड़ों कार्यकर्ताओं और कारोबारियों के साथ सड़क पर उतर कर सीलिंग का विरोध कर आगे का इरादा जता दिया है.

कनॉट प्लेस, मेहरचंद मार्केट, ग्रीन पार्क, हौजखास, साउथ एक्सटेंशन, ग्रेटर कैलाश, डिफेंस कॉलोनी, खान मार्केट, करोलबाग, पहाड़गंज केशवपुरम सहित दिल्ली के कई इलाकों में सीलिंग की कार्रवाई को लेकर हड़कंप मचा हुआ है. ये वैसे इलाके हैं, जहां पर व्यापारियों के द्वारा राजनीतिक दलों को चंदे के रूप में सबसे ज्यादा और मोटी रकम मिलती है.

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दिल्ली में सीलिंग की कार्रवाई सुप्रीम कोर्ट की मॉनिटरिंग कमेटी के आदेश पर की जा रही है. पिछले दिनों ही सुप्रीम कोर्ट की मॉनिटरिंग कमेटी ने साफ कर दिया है कि दुकानदारों को नोटिस नहीं अब सीधे सीलिंग की जाएगी. सुप्रीम कोर्ट द्वारा नियुक्त मॉनिटरिंग कमेटी ने इससे पहले दिल्ली के तीनों नगर निगमों के आयुक्त, डीडीए और अन्य एजेंसियों के साथ बैठक की थी.

अगले साल होने वाले लोकसभा चुनाव को देखते हुए बीजेपी जहां डिफेंसिव लग रही है, वहीं कांग्रेस और आम आदमी पार्टी इस मुद्दे को भुनाने में कोई कोर कसर नहीं छोड़ना चाहती हैं. क्योंकि दिल्ली में एक बड़ा तबका व्यापारी वर्ग से ताल्लुक रखता है.

दूसरी तरफ एमसीडी लगातार कहता रहा है कि केंद्र सरकार से मिल कर समाधान निकालने की दिशा में काम कर रहे हैं, लेकिन इसके बावजूद सीलिंग को लेकर मॉनिटरिंग कमेटी किसी भी तरह की ढील नहीं दे रही है. हर दिन दिल्ली के किसी न किसी एक इलाके में सीलिंग की कार्रवाई हो रही है.

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दिल्ली एमसीडी को पुराने समय से कवर कर रहे कुछ पत्रकारों का मानना है कि बिगड़े हालात कहीं न कहीं एमसीडी की देन हैं. 2007 में एमसीडी ने दिल्ली के दुकानदारों से कनवर्जन चार्ज वसूलना शुरू किया था. 2007 में एमसीडी ने कनवर्जन चार्ज के रूप में 550 करोड़ रुपए वसूले थे.

बाद में एमसीडी ने दुकानदारों के साथ मनमानी रूप से अभियान चला कर पेनाल्टी लगाकर पैसा वसूलने का काम शुरू कर दिया. कनवर्जन चार्ज वसूले जाने के बावजूद बाजार के रखरखाव के लिए एमसीडी की तरफ से किसी भी तरह का कोई बंदोबस्त नहीं किया गया.

एमसीडी की कारस्तानी से बाजार की हालात दिनोंदिन बद से बदतर होती चली गई. आज स्थिति यह हो गई है कि सुप्रीम कोर्ट को इस मामले में मॉनिटरिंग कमेटी का गठन कर हालात सुधारनी पड़ रही है.

सुप्रीम कोर्ट की मॉनिटरिंग कमेटी इस बात से नाराज है कि व्यापारियों के द्वारा सालों से कनवर्जन चार्ज नहीं दिया गया है. कनवर्जन चार्ज नहीं देने के कारण बाजारों को बेहतर नहीं बनाया जा सका है. मार्केट में अवैध निर्माण और पार्किंग एरिया पर कब्जा कर लिया गया.\

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सुप्रीम कोर्ट ने दिल्ली में सीलिंग को लेकर 2006 के अंत में ही एक कमेटी का गठन कर अवैध निर्माण हटाने के आदेश दिए थे. 2006 में ही सुप्रीम कोर्ट ने निगरानी के लिए पूर्व चुनाव आयुक्त केजे राव को नियुक्त किया था. केजे राव की अध्यक्षता में ही सुप्रीम कोर्ट की मॉनिटरिंग कमेटी का गठन किया गया था. अभी जो दिल्ली में कार्रवाई चल रही है वह भी केजे राव के नेतृत्व में ही किया जा रहा है.

2006 में भी सीलिंग को लेकर दिल्ली में बड़ी कार्रवाई की शुरुआत हुई थी. एमसीडी ने उन बाजारों और दुकानों पर कार्रवाई शुरू की थी जो कि रिहायशी एरिया में थे. इस कार्रवाई में एमसीडी ने घरों में बनी दुकानों को सील कर दिया था. इस कार्रवाई से घबराकर दिल्ली सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में गुहार लगाई थी कि दिल्ली सरकार इस मामले को लेकर जल्द ही एक मास्टर प्लान लाने जा रही है, जिसमें ऐसे दुकानों को रेगुलर करने की एक नीति लाई जाएगी.

सुप्रीम कोर्ट में इस गुहार के बाद ही एमसीडी ने दिल्ली में सर्वे कर दो नीति लाई थी. एमसीडी की इस नीति के तहत रिहायशी इलाकों की जिन सड़कों पर 100 प्रतिशत कारोबार या दुकानें चल रही थीं, उन्हें कॉमर्शियल घोषित कर दिया गया.

लेकिन, जहां पर कारोबार 50 प्रतिशत के आसपास था, वहां पर मिक्स लैंड यूज किया गया. ऐसी सड़कों पर ग्राउंड फ्लोर पर कारोबार चलाने की तो छूट दी गई थी, लेकिन फर्स्ट फ्लोर या उससे ऊपर की मंजिलों को रिहायशी घोषित कर दिया गया.

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दिल्ली में साल 2007 में मास्टर प्लान आने के बाद ऐसी सड़कों पर व्यापारिक गतिविधियों के लिए हर साल कनवर्जन चार्ज और वन टाइम पार्किंग शुल्क लेने का प्रावधान किया गया. फिलहाल सुप्रीम कोर्ट की मॉनिटरिंग कमेटी उन दुकानों के खिलाफ कार्रवाई कर रही है, जिन्होंने हर साल जमा होने वाले कनवर्जन शुल्क को जमा नहीं कराया है.

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दिल्ली में सीलिंग की कार्रवाई बेशक सुप्रीम कोर्ट के निर्देश पर हो रही है. लेकिन, इसमें सबसे ज्यादा भद्द एमसीडी की पिट रही है. एमसीडी लगातार दलील दे रही है कि हम बिना नोटिस के सीलिंग की कार्रवाई नहीं करेंगे, इसके बावजूद सीलिंग की कार्रवाई रुक नहीं रही है.

वोट की राजनीति की दास्तान यह है कि दिल्ली की सभी राजनीतिक पार्टियां इस वक्त कारोबारियों के साथ सुर में सुर मिला कर दिल्ली बंद में साथ दे रही हैं. लेकिन, कहीं न कहीं दिल्ली में सीलिंग की कार्रवाई के पीछे इन राजनीतिक दलों का ही हाथ रहा है.

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