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नोटबंदी@एक साल: जो पहले 2 महीनों में हुआ, अकेले वही न भूलने वाली त्रासदी है- ज्यां द्रेज

विकास अर्थशास्त्री ज्यां द्रेज नरेंद्र मोदी सरकार की पिछले साल 500 और 1000 के पुराने नोट बंद करने के फैसले के मुखर आलोचक हैं.

Ankita Virmani Ankita Virmani Updated On: Nov 08, 2017 05:01 PM IST

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नोटबंदी@एक साल: जो पहले 2 महीनों में हुआ, अकेले वही न भूलने वाली त्रासदी है- ज्यां द्रेज

विकास अर्थशास्त्री ज्यां द्रेज नरेंद्र मोदी सरकार की पिछले साल 500 और 1000 के पुराने नोट बंद करने के फैसले के मुखर आलोचक हैं. उन्होंने चेतावनी दी थी कि 'फलती-फूलती अर्थव्यवस्था में नोटबंदी रेसिंग कार के टायर में गोली मारने जैसा साबित होगा.' एक साल बाद ऐसा लगता है कि उनकी चेतावनी सही साबित हुई है. मौजूदा वित्तीय वर्ष की पहली तिमाही में विकास दर तीन साल के निचले स्तर 5.7 फीसदी पर पहुंच गई है. विकास दर पर जीएसटी और नोटबंदी का दोहरा असर पड़ा है.

एनडीए सरकार के सबसे बड़े फैसले के एक साल पूरे होने पर फर्स्टपोस्ट ने द्रेज के साथ ईमेल इंटरव्यू किया. पेश है उसके मुख्य अंश:

नोटबंदी को एक साल हो गए हैं. आप इसे सफल मानते हैं या असफल?

मुझे लगता है कि नोटंबदी के बारे में बेबाकी से राय रखनी चाहिए और इसे सबसे बड़ी भूल मानना चाहिए. प्रधानमंत्री ने 8 नवंबर, 2016 के संबोधन में जो उद्देश्य बताए थे, निश्चित रूप से वो पूरे नहीं हुए हैं. अगर उद्देश्य कुछ और थे तो उन्हें इस बारे में बताना चाहिए. नहीं तो उन्हें मानना चाहिए यह बड़ी भूल थी.

दूसरे अर्थशास्त्रियों की तरह मैं सोचता था कि वास्तव में नोटबंदी का उद्देश्य क्या था. कई तरह की अवधारणा सामने रखी गई. इनमें से कोई यह नहीं बता पाता कि प्रधानमंत्री अर्थव्यवस्था के साथ इतना बड़ा जोखिम क्यों लेना चाहते थे. आज, मेरा मानना वही है जो प्रधानमंत्री ने पिछले साल आठ नवंबर को कहा था. उन्होंने इस मिथक पर विश्वास किया कि बड़े पैमाने पर काला धन नकदी में रखा गया है और इसे बाहर निकालना चाहिए.

यह मिथक क्यों है?

आमतौर पर काले धन को लेकर गलतफहमी यह है कि वो स्टॉक में रहता है न कि फ्लो में. अर्थव्यवस्था में काले धन को अवैध कमाई कहते हैं. वह फ्लो है, न कि स्टॉक. अवैध कमाई ठहरी हुई नहीं रहती और न ही उसकी जमाखोरी हो सकती है. इसका उपयोग जगुआर खरीदने, दुबई में शॉपिंग, राजसी शादी करना और दूसरे कामों में होता है. कहा जा सकता है कि इस प्रक्रिया में काला धन सफेद बन जाता है. अवैध कमाई को जमा करके रखा जाता है, इस गलत विचार के चलते कई तरह के भ्रम पैदा होते हैं. किसी भी निश्चित समय पर काला धन का कुछ हिस्सा नकद में रखा जाता है. लेकिन इस थोड़ी-सी नकदी पर प्रहार अवैध कमाई को रोकने के खिलाफ मामूली सा कदम है. यह चालू नल के नीचे पोंछा लगाने जैसा है.

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आरबीआई का कहना है कि जितने नोट बंद किए गए थे, करीब-करीब सभी वापस आ गए हैं . इसका मतलब यह है कि काला धन था ही नहीं?

हमारे आसपास बड़ी मात्रा में काला धन है, अवैध कमाई के रूप में. लेकिन जैसा कि मैंने कहा, हमें सूटकेस में बंद नकदी के मिथक से इसे अलग करके देखना होगा. इस हद तक कि अवैध नकदी का कुछ हिस्सा उसमें मौजूद था, लेकिन नोटबंदी के दौरान सफाई के साथ इसे सफेद कर लिया गया. वास्तव में, हम जानते हैं कि बंद हुए अधिकतर बड़े नोट बैंकों में वापस आ चुके हैं. इसलिए या तो नोटबंदी नूरा-कुश्ती थी, क्योंकि अवैध कमाई का बहुत कम हिस्सा नकदी के रूप में मौजूद था, या फिर यह मनी-लॉन्ड्रिंग ऑपरेशन में तब्दील हो गया. आज, सरकार यह कह रही है कि लाखों बैंक खातों की जांच, छापे और दूसरे उपायों से सफेद किए गए काले धन का पता लगाएगी.

Cash recovered in Delhi

कैशलेश अर्थव्यवस्था के बारे में आप क्या सोचते हैं? क्या एक देश के रूप में हम इस बदलाव के लिए तैयार हैं?

मुझे लगता है कि यह विचार ऊपर से सीढ़ी चढ़ने की कोशिश करने की प्रवृत्ति सरीखा है. दूसरे उदाहरण बुलेट ट्रेन और स्मार्ट सिटीज के साथ असाधारण आसक्ति है. वास्तव में अधिकतर लोग समय पर चलने वाली ट्रेन और सुविधाओं से युक्त शहर चाहते हैं. इसी तरह, जब लेन-देन की बात आती है, लोगों को बेहतर सेवाएं देने वाले बैंकों की जरूरत है. इसके साथ उन्हें उस सुविधा की जरूरत है तो नकदी हर दिन मुहैया कराता है. देश के अधिकतर हिस्सों में आज भी प्रभावी बैंकिंग सेवाएं नदारद हैं. कैशलेस अर्थव्यवस्था भविष्य का विचार है. लाखों लोग आज जो मुश्किलें झेल रहे हैं, उससे इसका कोई लेना-देना नहीं है. नोटबंदी के बाद छोटा दुकानदार भी पेटीएम और दूसरे एप इस्तेमाल करने लगा.

इस तरह नोटबंदी ने हमें डिजिटल जाने के लिए प्रेरित किया और डिजिटल का मतलब है पारदर्शी लेन-देन?

मैं इन ऐप के खिलाफ नहीं हूं. जिनको इनसे सुविधा मिलती है, वो इनका उपयोग करें. लेकिन नोटबंदी जैसे बेरहम माध्यम के जरिए इनको बढ़ावा देना मेरी समझ से परे हैं. कुछ डिजिटल भुगतान प्रणालियों को सुविधा देना या सब्सिडी देना सबसे अच्छा है. आर्थिक सर्वे में नोटबंदी से विकास दर पर कम से कम 1.2 फीसदी कम होने का अनुमान है. लेकिन कोई भी बदलाव, यहां तकि हमारे निजी जीवन में भी छोटा से छोटा बदलाव भी असर डालता है.

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यह अनुमान काल्पनिक है और सही आंकड़े इससे भी बुरे हो सकते हैं. लेकिन अगर यह 1.2 फीसदी भी है तो इतनी रकम केंद्र और राज्य सरकारें मिलकर स्वास्थ्य पर खर्च करती हैं. दूसरे शब्दों में, नोटबंदी से नुकसान एक साल में स्वास्थ्य पर होने वाले सरकारी खर्च के बराबर है. मेरा डर है कि घाटा यहीं खत्म नहीं होगा, और नोटबंदी से भारत मंदी के चक्रव्यूह में फंस जाएगा. हालांकि मुख्य मुद्दा विकास दर नहीं बल्कि लोगों की जिंदगी पर पड़ने वाला असर है. नोटबंदी के पहले दो महीनों में जो कुछ हुआ, वो माफ न की जान सकने वाली तबाही है.

आप इसे कैसे देखते हैं कि कमजोर वर्गों को जैसे कि मनरेगा मजदूरों को सीधे उनके बैंक खातों में मेहनताना मिलता है. इससे बिचौलियों की भूमिका खत्म हो रही है. क्या आप इसे स्वागतयोग्य कदम मानते हैं?

नरेगा मजदूरी का बैंक खातों के जरिए भुगतान 10 साल पहले शुरू हो गया था. वास्तव में, जन-धन योजना से काफी पहले नरेगा के साथ ही भारत में फाइनेंशियल इनक्लुजन यानी वित्तीय समावेशन के क्षेत्र में बड़ा बदलाव शुरू हुआ. मेरा मानना है कि नरेगा मजदूरी का बैंक भुगतान बुरी चीज नहीं है, लेकिन बैंकिंग तंत्र अब भी इस काम को सही तरह से अंजाम नहीं दे पा रहा. आम तौर पर भुगतान में देरी होती है और अधिकतर इलाकों में बैंकों में क्षमता से ज्यादा भीड़ होती है. इसलिए मेरा मानना है कि लोगों को आज अच्छी बैंकिंग सेवाओं की जरूरत है न कि कैशलेस अर्थव्यवस्था वाले दिवास्वप्न की.

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