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बन सकते थे RSS प्रमुख, बेच रहे हैं करी पाउडर

कन्नन इससे पहले शारीरिक प्रमुख का पद संभाल चुके हैं जिस पर मोहन भागवत भी पदस्थ रह चुके हैं जो कि अब सर संघ संचालक हैं

FP Staff Updated On: Jan 18, 2018 03:52 PM IST

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बन सकते थे RSS प्रमुख, बेच रहे हैं करी पाउडर

जिंदगी में कुछ लोग ऐसे होते हैं जो सब कुछ छोड़ने का फैसला ऐसे वक्त लेते हैं जब वह अपने क्षेत्र में सफलता के शिखर पर होते हैं. यह फैसला किसी मजबूरी में नहीं लिया जाता है. जब लोग दिल की सुनते हैं तो ऐसे फैसले खुद-ब-खुद हो जाते हैं.

के. सी. कन्नन ने भी अपने दिल की बात ऐसे वक्त में सुनी, जब वे सिंहासन के बहुत करीब थे. 2014 में  कन्नन ने राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ से ऐसे मोड़ पर किनारा किया, जब वह सह-सरकार्यवाह थे. आरएसएस की शीर्षस्थ पदों में यह तीसरे नंबर का पद है. उन्होंने इस पद से त्यागपत्र देकर ब्रह्मचर्य जीवन से गृहस्थ जीवन की ओर रुख किया और शादी कर ली.

ऐसा नहीं है कि कन्नन ने संघ छोड़ दिया है. वह हर सुबह उठते हैं, अपने घर से नजदीक पलक्कड़, केरल की शाखा में जाते हैं. संघ के विचारक गोलवलकर के विचारों को दिल से मानते हैं लेकिन इन दिनों वह इस दिनचर्या के साथ ही अपना बिजनेस भी देखते हैं. वह अपने परिवार का जीवन-यापन करने के लिए करी पाउडर बेचते हैं.

मोहन भागवत भी रह चुके हैं शारीरिक प्रमुख के पद पर 

कन्नन कहते हैं कि करी पाउडर का बिजनेस केरल में व्यापक है. इस बिजनेस  कई बड़े नाम भी हैं. लेकिन मैंने शुरू से ही सोच रखा था कि आसान राह नहीं चुननी है. हम बिना किसी झूठ के कहेंगे कि हम अपने उत्पाद में प्रिजरवेटिव का इस्तेमाल नहीं करते हैं. इसलिए हमें मुनाफा कम मिलता है लेकिन इससे हमें कोई फर्क नहीं पड़ता.

कन्नन कहते हैं कि मेरा संकल्प यही है कि कभी संघ के प्रभाव का गलत इस्तेमाल नहीं करूंगा. मेरी पत्नी के घरवाले भी इसी बिजनेस में हैं इसलिए वह मुझे काफी कुछ सिखाते हैं.

कन्नन इससे पहले शारीरिक प्रमुख का पद संभाल चुके हैं जिस पर मोहन भागवत भी पदस्थ रह चुके हैं जो कि अब सर संघ संचालक हैं. 2012 में कन्नन संघ के सह सरकार्यवाह पर पदस्थ हुए जो कि संघ की पद श्रेणी में तीसरे नंबर का पद है.

तब भी स्वयंसेवक था, आज भी स्वयंसेवक हूं 

संघ आज सबसे मजबूत संस्था है. 2014 के लोकसभा चुनावों के बाद संघ सबसे ताकतवर संस्था के रूप में उभरी, ऐसी संस्था का सदस्य बनकर आपको कैसा लगता है? वह बताते हैं कि- जब मैं संघ के चोटी के पद पर था तब भी मुझमें ताकत का नशा सिर पर नहीं चढ़ा था. तब भी मैं स्वयंसेवक था, अब भी मैं स्वयंसेवक हूं बस फर्क इतना सा ही है कि तब मुझ पर सह सरकार्यवाह की जिम्मेदारी थी लेकिन अब नहीं है.

वह बताते हैं कि ऐसा कभी नहीं हुआ है कि विजयदशमी की पथ संचलन (परेड) में मैं शामिल न रहा हूं. हर बड़ी जनसभा का हिस्सा रहा हूं लेकिन आप मुझे किसी भी संघ की प्रांतीय बैठक में शामिल नहीं पाएंगे क्योंकि अब मैं किसी भी आधिकारिक बैठक में हिस्सा लेने के लिए पद मुक्त हूं.

संघ की ओर से किसी वरिष्ठ पद के लिए उन्हें बुलाया जा सकता है इस पर अगर विचार करें तो ऐसे तमाम उदाहरण मिल जाएंगे.

पद छोड़नेवाले फिर से आते रहे हैं संघ में 

वसंत राव ओख संघ के अग्रणी प्रचारकों में से एक थे. उनका योगदान उत्तर भारत में संघ की विचारधारा के प्रचार-प्रसार की नजर से अहम है. उन्हें आरएसएस के संस्थापक के. बी. हेडगेवार ने भेजा था. जब देश का बंटवारा हुआ तो उन्होंने अकेले ही राहत कार्यों में खुद को झोंक दिया.

जब डॉ. एस. पी. मुखर्जी ने भारतीय जनसंघ की स्थापना की तब राव इसका हिस्सा बनना चाहते थे लेकिन सरसंघ संचालक गोलवलकर ने उनके इस प्रस्ताव को अस्वीकृत कर दिया. राव ने संघ छोड़कर इसी के समानांतर एक संस्था खड़ी कर ली.

इसमें उनके साथ कई सहयोगी भी साथ आए. लेकिन कुछ वर्षों बाद राव ने गोलवलकर से कहा कि वह संस्था में वापस आना चाहते हैं. गोलवालकर ने उन्हें फिर से संघ का हिस्सा बनाया और वह जीवन पर्यंत संघ में ही रहे.

अविवाहित लोग ही संघ प्रमुख की जिम्मेदारी संभालते रहे हैं 

ऐसा नहीं है कि कन्नन ही इकलौते ऐसे उदाहरण हैं जिन्होंने विवाह के लिए संघ का शीर्षस्थ पद छोड़ा. इनसे पहले सह सरकार्यवाह भैयाजी दानी ने भी साबित किया कि संघ का पद संभालने के लिए अविवाहित होना जरूरी नहीं है. अलग बात है कि लोगों ने अघोषित तौर पर मान लिया है कि संघ का पूर्णकालिक सदस्य बनने के लिए अविवाहित रहना अनिवार्य है. पिछले तीन दशकों में केवल दस लोग ही ऐसे ही हैं जिनके पास विवाहित होने के बाद भी संघ प्रचारक का पद है. लेकिन संघ के शुरुआती दिनों में ऐसी संख्या ज्यादा थी. कन्नन उन अफवाहों पर चुप रहते हैं जिनमें यह कहा जाता है कि उनको संघ फिर से वापस बड़े पद पर बुलाना चाहता है. वह बस यही कहते हैं कि संघ मेरी जिंदगी है. संघ वही निर्णय लेता है जिसे वह ठीक समझता है. संघ जो भी निर्णय लेगा वह मुझे स्वीकार्य होगा और मैं संघ के हर आदेश का जीवन पर्यंत पालन करूंगा.

(न्यूज 18 के लिए अनु नारायणन की रिपोर्ट) 

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