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बड़े जोर-शोर से ट्रिपल तलाक की लड़ाई लड़ रहे हैं ये लड़ाके

ट्रिपल तलाक के मसले पर सुधार चाहने वाला धड़ा दो भागों में बंटा नजर आ रहा है

Updated On: Apr 25, 2017 09:14 AM IST

Avinash Dwivedi
लेखक स्वतंत्र पत्रकार हैं

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बड़े जोर-शोर से ट्रिपल तलाक की लड़ाई लड़ रहे हैं ये लड़ाके

तलाक का मसला बेहद उलझाऊ है क्योंकि पितृसत्तात्मक समाज में इसके धागे महिलाओं के अधिकार, समानता सहित कई दूसरे मुद्दों से उलझते रहे हैं.

ऐसे में ट्रिपल तलाक और दूसरे किसी तलाक के मुद्दे पर कोई बात करने से पहले 14 अप्रैल का कानून मंत्री रविशंकर प्रसाद का दिया ये बयान पढ़ें:

'पाकिस्तान, ट्यूनीशिया, मोरक्को, ईरान और मिस्र जैसे एक दर्जन से ज्यादा इस्लामी देशों ने एक साथ तीन तलाक का रेगुलेशन किया है. अगर इस्लामी देश कानून बनाकर तीन तलाक को रेगुलेट कर सकते हैं, और इसे शरिया के खिलाफ नहीं पाया गया है, तो यह भारत में कैसे गलत हो सकता है, जो धर्मनिरपेक्ष देश है.'

प्रसाद बिल्कुल सही थे. ध्यान दीजिए, वो रेगुलेशन शब्द बार-बार दोहरा रहे थे. मतलब ट्रिपल तलाक को भारतीय संविधान के तमाम मूल्यों के हिसाब से ढालने की बात कर रहे थे और आज जब यह स्पष्ट है कि ट्रिपल तलाक से महिलाओं के समानता सहित दूसरे अधिकारों का हनन होता है तो ये ट्रिपल तलाक में सुधार का एकदम सही वक्त है.

खैर, भारत के संवैधानिक इतिहास में पहली बार पिछले सात अक्टूबर को केंद्र ने मुस्लिमों में बहुविवाह, निकाह हलाला और एक साथ तीन तलाक के चलन का सुप्रीम कोर्ट में विरोध किया. पर इससे यूं न समझा जाए कि देश की इतनी बड़ी मुस्लिम आबादी के लिए इतने महत्वपूर्ण मुद्दे पर देश में कभी बहस ही नहीं हुई.

करीब 30 साल पहले इस पर जमकर बहस हुई थी, शाहबानो केस पर. आजादी के बाद मुस्लिम पर्सनल लॉ से जुड़ा, जो एकमात्र राजनीतिक प्रयास किसी भी सरकार के द्वारा हुआ है, वो राजीव गांधी सरकार का मुस्लिम महिला (तलाक में संरक्षण का अधिकार) अधिनियम, (1986) पारित करवाना रहा है.

इसके तहत मुस्लिम महिला के तलाक के जुड़े फैसले करने में कोर्ट पर शरीयत को प्रमुखता दी गई थी यानी फैसला करने का अधिकार मुस्लिम धर्मगुरुओं को सौंप दिया गया था. ध्यान रहे कि ये धर्मगुरू हमेशा ही पुरुष ही होते हैं.

शायरा बानो के चलते फिर छिड़ी शाह बानो वाली बहस

Shah_Bano

शाह बानो

2015 में राष्ट्रीय चर्चा में आए शायरा बानो केस के बाद फिर से ट्रिपल तलाक का मुद्दा गर्माया है. इस बार स्थितियां 30 साल पहले की अपेक्षा ज्यादा साफ हैं और ट्रिपल तलाक के मसले पर सुधार चाहने वाला धड़ा दो भागों में बंटा नजर आ रहा है.

पहला धड़ा पर्सनल लॉ को भारतीय संविधान के समानता के अधिकार के खिलाफ देखता है. दूसरा धड़ा ट्रिपल तलाक और निकाह हलाला (तलाक के बाद पहले पति से दोबारा शादी करने के लिए दूसरे मर्द से शादी करने की बाध्यता) को गैर-इस्लामिक मानता है. वैसे भी, जाहिर तौर पर यह प्रथा शरिया के खिलाफ है.

खैर, ट्रिपल तलाक की इस बहस ने जोर पकड़ा था अब से 30 साल पहले, शाह बानो केस के मसले पर. इंदौर में रहने वाली 62 साल की शाह बानो को उसके पति ने 1978 में तलाक दे दिया था. शाह बानो के 5 बच्चे थे. शाह बानो ने पति से कानूनी तलाक भत्ते की मांग की पर पति इस्लामिक कानून के हिसाब से ही गुजारा भत्ता देना चाहता था. इस पर देश भर में बहुत बहस चल रही थी.

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बाद में सुप्रीम कोर्ट ने शाह बानो को पति से कानूनी भत्ता दिलवाने का आदेश भी दे दिया. पर 1973 में स्थापित ऑल इंडिया पर्सनल लॉ बोर्ड और मुस्लिम धर्मगुरुओं ने मिलकर इस फैसले को मुस्लिम समुदाय के पारिवारिक और धार्मिक मामलों में अदालत का दखल बताते हुए पुरजोर विरोध किया.

इसके बाद राजीव गांधी सरकार ने एक साल के भीतर मुस्लिम महिला (तलाक में संरक्षण का अधिकार) अधिनियम, (1986) पारित कर सुप्रीम कोर्ट के फैसले को पलट दिया. और मुस्लिम समुदाय के धर्मगुरुओं को ही गुजारा भत्ता तय करने का अधिकार मिल गया.

बीजेपी ने शाहबानो केस पर रोटियां ही नहीं सेंकी, खीर पकाई थी

A veiled Muslim bride waits for the start of a mass marriage ceremony in Ahmedabad, India, October 11, 2015. A total of 65 Muslim couples from various parts of Ahmedabad on Sunday took wedding vows during the mass marriage ceremony organised by a Muslim voluntary organisation, organisers said. REUTERS/Amit Dave - RTS3Z5U

शाहबानो केस के दौरान बाबरी मस्जिद मुद्दा भी अपने उफान पर था. इस पूरे माहौल का फायदा उठाकर बीजेपी इसे इस्लाम बनाम महिला अधिकारों की लड़ाई बनाने में सफल रही थी. ये मामला बीजेपी के लिए खुद को भारतीय राजनीति में स्थापित करने का गोल्डेन चांस साबित हुआ.

बीजेपी और संघ ने उस वक्त शाह बानो केस को बाबरी मस्जिद और कश्मीर के मामले में आहत हिंदू समुदाय के गर्व को इसके लिए भुनाया और 90 के दशक में अपनी राजनीतिक हालत हिंदू समुदाय का समर्थन पाकर मजबूत कर ली.

वैसे भी कट्टर हिंदू समुदाय को इस बात का दुख हमेशा से रहा है कि जब हिंदु समुदाय को 1950 से ही हिंदू कोड बिल के तहत लाने की कवायद शुरू हो गई थी तो ऐसे में मुस्लिम समुदाय के साथ ऐसा आज तक क्यों नहीं हो सका है?

कौन हैं ट्रिपल तलाक की बहस में शामिल?

Muslim Women

आज के दौर में ट्रिपल तलाक से जुड़ी जो मुख्य संस्थाएं हैं. उसमें से एक आरएसएस समर्थित राष्ट्रीय मुस्लिम मंच है जो कि ट्रिपल तलाक और निकाह हलाला जैसी परंपरा का सीधा विरोध करता है और सभी के लिए एक यूनिफॉर्म सिविल कोड की मांग करता है.

फिर है ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड, जो आज भी तीस साल पहले के स्टैंड पर कायम है और इसका तर्क है कि पर्सनल लॉ के मामले में कोर्ट में कोई भी बहस और हस्तक्षेप नहीं होना चाहिए.

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इस बीच खुशी की बात ये है कि एक पक्ष इस मामले में भारतीय मुस्लिम महिला मंच भी है जो कि इस सारे मामले को ट्रिपल तलाक बनाम इस्लाम बना दे रहा है. इससे सारे पुराने खिलाड़ियों के खेल के नियम भी बदल जा रहे हैं. ये इन परंपराओं का अंत इनके गैर-इस्लामिक होने यानि इस्लामिक मूल्यों पर खरा न उतरने के चलते चाहता है.

ऐसा नहीं है कि जिन मुद्दों पर महिला मंच बातें रख रहा है उन पर बात नहीं हुई. जो लोग इस्लाम, उसमें छिपे अधिकारों साथ ही शादी और महिलाओं की बराबरी के अधिकार के बारे में जानते हैं वो इस पर बहस करते रहे हैं. फिर भी ये संगठन इस पक्ष को सुप्रीम कोर्ट के सामने पेश कर रहा है जो कि बेहद सकारात्मक है.

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