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सामाजिक जीवन को लेकर चिंतित हैं बुजुर्ग: अध्ययन

देश में ज्यादातर बुजुर्ग अपना सामाजिक जीवन बनाए रखने और रोजमर्रा की जरूरतें पूरी होने को लेकर चिंतित हैं.

Updated On: Oct 06, 2018 07:57 PM IST

Bhasha

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सामाजिक जीवन को लेकर चिंतित हैं बुजुर्ग: अध्ययन

देश में ज्यादातर बुजुर्ग अपना सामाजिक जीवन बनाए रखने और रोजमर्रा की जरूरतें पूरी होने को लेकर चिंतित हैं. शारीरिक स्वास्थ्य महज 10 प्रतिशत बुजुर्गों के लिए प्रमुख चिंता का विषय है.

आईवीएच सीनियर केयर के जरिए वेलनेस हेल्थ एंड यू (एज फ्रेंडली इंडिया) के साथ मिलकर हाल में कराए गए एक सर्वेक्षण के अनुसार 66 फीसदी वृद्ध माता-पिता के लिए सामजिक सुरक्षा और रोजमर्रा की जरूरतें प्रमुख चिंता का विषय हैं. 'जुग जुग जिएंगे' शीर्षक वाला सर्वेक्षण अकेले रह रहे बुजुर्गों की आवश्यकताओं पर बजुर्गों और उनके बच्चों का दृष्टिकोण समझने के लिए कराया गया.

अध्ययन दर्शाता है कि बच्चे किस तरह अपने बुजुर्ग माता-पिताओं की आवश्यकताओं को समझने में विफल रहते हैं. इसमें खुलासा हुआ कि दूर रह रहे 67 फीसदी बच्चों के लिए उनके माता-पिता का स्वास्थ्य प्रमुख चिंता है, जबकि केवल 18 फीसदी बच्चे अपने माता-पिता के सामाजिक जीवन और उनकी रोजमर्रा की आवश्यकताओं को लेकर चिंतित हैं.

बुजुर्ग देखरेख विशेषज्ञ और मैक्स अस्पताल में कंसल्टैंट और वेलनेस हेल्थ एंड यू के अध्यक्ष डॉ. जीएस ग्रेवाल ने कहा कि घर से दूर रहे रहे बच्चों और उनके माता-पिता की सोच में अंतर कई सवाल उत्पन्न करता है. बच्चे जहां अपने माता-पिता के शारीरिक स्वास्थ्य के बारे में चिंता करते हैं, वहीं सामाजिक जीवन खोने और रोजमर्रा की आवश्यकताओं के पूरा होने में कठिनाई को लेकर बुजुर्गों की चिंता बुनियादी मानसिक स्वास्थ्य मुद्दों को रेखांकित करती है.

बच्चे समझने में विफल

उन्होंने कहा कि बच्चे यह समझने में विफल रहते हैं कि केवल शारीरिक स्वास्थ्य नहीं, बल्कि शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य दोनों मिलाकर ही स्वास्थ्य बनता है. अपने बच्चों की गैर मौजूदगी में सामाजिक रूप से एकांत जीवन जीने से बुजुर्गों में अकेलेपन की भावना आ जाती है जो बाद में अवसाद में बदल सकती है. डॉ. ग्रेवाल दिल्ली मेडिकल एसोसिएशन के सचिव भी हैं.

सर्वेक्षण में दिल्ली, एनसीआर, पंजाब, हरियाणा, चंडीगढ़, उत्तर प्रदेश, महाराष्ट्र, आंध्र प्रदेश, पश्चिम बंगाल और कर्नाटक से एक-एक हजार बुजुर्ग और कम से कम पांच साल से दूर रह रहे उनके बच्चों को शामिल किया गया. ब्योरा अकेले रह रहे बुजुर्गों से आमने-सामने की बातचीत और उनके बच्चों से ब्योरा ई मेल या टेलीफोन पर लिया गया.

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