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‘NRC पूरी ईमानदारी से काम कर रही है, इसपर ओछी राजनीति नहीं होनी चाहिए’

एक असमिया और एक भारतीय की देशवासियों से समर्थन की अपील- समझिए कि क्यों एनआरसी की प्रक्रिया जरूरी है

Smita Barooah Updated On: Aug 03, 2018 09:46 AM IST

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‘NRC पूरी ईमानदारी से काम कर रही है, इसपर ओछी राजनीति नहीं होनी चाहिए’

हर कहानी की शुरुआत किसी न किसी एक बिंदु से होती है. असम के राष्ट्रीय नागरिक रजिस्टर यानि एनआरसी की शुरुआत असम आंदोलन से हुई थी. मेरे गृहराज्य के इतिहास का ये वो समय था जब राज्य की पूरी जनता उन छात्रों के पीछे मज़बूती से जा खड़ी हुई थी जिन्होंने लगातार छह सालों तक संघर्ष किया था.

ये संघर्ष राज्य के मूल निवासियों के हक़ की रक्षा करने के लिए किया गया था. इन लोगों की मांग थी कि राज्य में रह रहे सभी अवैध बांग्लादेशियों की पहचान कर उन्हें देश से बाहर किया जाए. ये वो समय था जब राज्य में हर तरफ़ भारी अशांति फैली थी, हड़ताल, नस्लीय हिंसा, विरोध-प्रदर्शन और अस्थिर सरकार. हज़ारों की संख्या में युवाओं ने अपनी नौकरी और भविष्य को दांव पर लगा दिया था. असम ने अपनी युवा पीढ़ी का एक पूरा वर्ग इस आंदोलन के दौरान खो दिया था.

असम संधि पर काम करने से कतराती रहीं सरकारें

मेरी आईता (दादी) हमें बताया करतीं थीं, उनकी आंखों में उस जुनून की चमक देखी जा सकती थी, वे बतातीं थीं कि कैसे छात्र सड़कों पर निकला करते थे और नारे लगाया करते थे, ‘आह ओई आह, उलई आह,’ (आओ-आओ, बाहर निकलो). इस आवाज़ को सुनकर हर कोई, क्या युवा क्या बूढ़ा, चाहे किसी भी वर्ग का क्यों न हो, अपने काम-धाम छोड़कर सड़कों पर उतर आता था और उन लड़कों के साथ हो जाया करता था. लोगों के मज़बूत इरादों और उनकी भावनाओं और न्याय की उनकी मांग के सामने भारत सरकार को झुकना ही पड़ा, और 15 अगस्त 1985 को तत्कालीन प्रधानमंत्री राजीव गांधी ने असम संधि पर हस्ताक्षर कर दिए. ये एक (एमओएस) मेमोरैंडम ऑफ़ सेटलमेंट था, जिसे दो पक्षों यानी भारत सरकार और (आसू) यानि ऑल असम स्टूडेंट यूनियन और असम गण संग्राम परिषद के बीच सहमति के साथ तय किया गया था.

लेकिन एक बार दस्तावेज़ों पर हस्ताक्षर हो जाने के बाद, एक के बाद एक आई कई सरकारों ने असम की जनता से किए गए वादे पूरे करने से मुकरते रहे. लेकिन, साल 2005 में केंद्र की यूपीए सरकार ने अंत में एनआरसी की प्रक्रिया की शुरुआत कर दी. लेकिन, इसे शुरू करने के कुछ ही दिन बात किन्हीं न किन्हीं वजहों और राजनीतिक दबाव के कारण उन्होंने इससे अपने कदम पीछे कर लिए. 2014 में केंद्र में एनडीए की सरकार आई और उसने इस मामले को सुप्रीम कोर्ट की निगरानी में आगे बढ़ाया, सुप्रीम कोर्ट ने एनआरसी को लागू करने के लिए कड़े नियम-कायदे भी बनाए, जिसे पूरा करते हुए ये प्रक्रिया अब अपने अंतिम चरण में पहुंच चुकी है.

असम के लोगों के लिए क्या हैं इसके मायने?

आज के दिन में एनआरसी देश में चर्चा का सबसे ज्वलंत मुद्दा बना हुआ है. लेकिन ऐसा करते हुए जानबूझकर जनता के बीच कुछ बेहद झूठा और भ्रामक तथ्य फैलाया जा रहा है, ताकि न सिर्फ़ देश में एक नकारात्मक माहौल बने बल्कि इसलिए भी कि इस प्रक्रिया को बाधित किया जा सके. इस लेख में आगे मैं एनआरसी से जुड़ी कुछ मूल जानकारी आप लोगों के सामने रखूंगी, और ये भी कि असम के लोगों के लिए इसके मायने क्या है.

एनआरसी यानी राष्ट्रीय नागरिक रजिस्टर का मक़सद ये है कि वो असम में रह रहे भारतीय नागरिकों की पहचान कर सके. ऐसा करने के लिए एक बहुत बड़े और जटिल प्रशासनिक क़वायद की ज़रूरत थी. ये कितने बड़े पैमाने पर किया जा रहा था इसे समझाने के लिए मुझे आपके सामने एक-दो आंकड़े रखने होंगे. एनआरसी के ड्राफ़्ट में राज्य के 3.29 करोड़ लोगों का प्रमाणीकरण होना था, ऐसा करने के लिए असम सरकार को उन 6.6 करोड़ निवेदन पत्रों की जांच करनी थी जो उन्हें राज्य की जनता ने भेजे थे. इनमें से 5.5 लाख दस्तावेज़ों को जांच के लिए दूसरे राज्यों के पास भेजा गया था और ये सब कुछ भारत के सुप्रीम कोर्ट की निगरानी में किया गया था.

इसका पहला ड्राफ्ट 1 जनवरी 2018 को जारी किया गया था, जिसमें तक़रीबन 1.9 करोड़ लोगों के नाम शामिल थे, जबकि आवेदन करने वालों की संख्या 3.29 करोड़ थी. मेरे रिश्तेदारों का नाम भी पहली सूची में शामिल नहीं था, जिससे वे काफ़ी परेशान भी हुए. लेकिन फिर एक दूसरा ड्राफ्ट भी सामने आया, जो 30 जुलाई 2018 को जारी किया गया था, इसमें 2.89 करोड़ लोगों के नाम शामिल थे. 40 लाख लोगों के नाम का प्रमाणीकरण अब भी बाक़ी है.

असम की भौगोलिक संरचना को समझिए

ये प्रक्रिया या ये कार्रवाई क्यों ज़रूरी है इसे समझने के लिए किसी को भी असम के भौगोलिक संरचना को समझना पड़ेगा. असम राज्य की सीमा का 4096 किमी का हिस्सा बांग्लादेश से जुड़ा हुआ है, इतना ही नहीं ये सीमा रेखा अन्य उत्तर-पूर्व के राज्य मेघालय, मिज़ोरम, त्रिपुरा और पश्चिम बंगाल तक फैली हुई है. ये जो झरझरा या यूं कहे कि आसानी से किसी को भी घुसपैठ का मौक़ा देने वाली जो सीमा-रेखा है, उसने राज्य में अप्रवासियों के आने की संभावना काफी बढ़ा रखी है.

इस कारण राज्य में बड़ी संख्या में अवैध प्रवासियों का पलायन आम बात है. उत्तर-पूर्व राज्यों की भौगोलिक संरचना में लगातार बदलाव आ रहा है और जिससे वहां की संस्कृति, ज़मीन और नौकरियां ख़तरे में पड़ गई है. पिछले कई सालों में इस सब ने राज्य में सुरक्षा के गंभीर सवाल भी खड़े कर दिए हैं. इसलिए, इस समय जब राष्ट्रीय परिदृश्य में जहां हर तरफ़ असम की चर्चा हो रही है वहीं सच्चाई ये है कि इस समस्या से इस समय उत्तर-पूर्व के कई अन्य राज्य भी ग्रसित हैं.

बांग्लादेश से लगातार अप्रवासी नागरिकों का आना उस समय अपने चरम या यूं कहे कि संकट की स्थिति में पहुंच गया जब वहां आज़ादी की लड़ाई चल रही थी. ऐसा अनुमान है कि लाखों की संख्या में बांग्लादेशी शरणार्थी तब सीमापार कर भारत में घुस आए थे और असम और मेघालय में जा बसे थे. उस समय यहां के स्थानीय लोगों ने मानवीय कारणों के कारण उनका साथ भी दिया क्योंकि बांग्लादेश में तब बड़े पैमाने पर जाति के आधार पर इंसानों को मारा जा रहा था. लेकिन, इसका मतलब ये बिल्कुल भी नहीं था कि राज्य में अप्रवासियों या बांग्लादेशियों का स्वागत अनंत काल तक चलता रहेगा. उस वक्त जो हुआ वो एक तरह से एक बड़ी आबादी के द्वारा राज्य में अवैध घुसपैठ था, जो आजतक जारी है. ऐसे में एनआरसी की तरफ से जो कोशिश चल रही है वो एक बहुत बड़ा कदम है, उन अवैध अप्रवासी बांग्लादेशियों की पहचान करने में, जो 24 मार्च 1971 की अंतिम तारीख़ के बाद राज्य में दाख़िल हुए हैं.

एनआरसी की प्रक्रिया का खाका बहुत ही अच्छे से बना हुआ है. कोई भी व्यक्ति जिसके पूर्वज असम में सालों से रह रहे थे या फिर वे 24 मार्च 1971 से पहले भारत के किसी अन्य राज्य के निवासी थे, इस बात का सबूत या दस्तावेज़ अगर वो एनआरसी के सामने पेश कर देता है तो वो अपना नाम एनआरसी की लिस्ट में नामांकित करवा सकता है. उसके बाद उसके दस्तावेज़ों की जांच-पड़ताल होने के बाद वो इस लिस्ट में शामिल कर लिया जाता है.

'राजनीति नहीं, असम के लोगों का समर्थन करिए'

30 जुलाई को जो एनआरसी लिस्ट जारी की गई है वो महज़ एक ड्राफ्ट है, और उसमें शामिल की गई जो भी बात किसी को भी आपत्तिजनक या झूठे दावे लगते हैं, उसका विरोध करने के लिए पर्याप्त समय भी दिया गया है. जिनका नाम उस सूची में शामिल नहीं है उन्हें एक चिट्ठी भेजी जाएगी और अपनी भारतीय नागरिकता के सबूत देने के लिए मौका भी दिया जाएगा. अंतिम एनआरसी तभी जारी की जाएगी जब इन सभी मामलों की पड़ताल और जांच पूरी कर ली जाएगी और लोगों की आपत्तियों पर सुनवाई हो जाएगी. ये बात सुप्रीम कोर्ट और भारत सरकार बार-बार ज़ोर देकर कह रही है. यहां तक कि एनआरसी का अंतिम प्रारूप बनने के बाद भी, हर वो व्यक्ति जो इस सूची में नहीं होगा उसे फॉरनर्स ट्रिब्यूनल में अपील करने का मौका दिया जाएगा. इससे ये साफ़ है कि ये पूरी प्रक्रिया न सिर्फ सही बल्कि बिना किसी भेदभाव के चल रही है.

कोई भी व्यक्ति इस मामले की गंभीरता और इसकी संवेदनशीलता से इंकार नहीं कर सकता है, और ये भी कि इसका पूरे देश पर क्या दूरगामी असर हो सकता है. ये अफ़सोसजनक है कि कुछ राजनैतिक दल और निहित स्वार्थ वाले लोग जानबूझकर इस मामले का राजनीतिकरण करने की कोशिश कर रहे हैं. वे प्रोपगैंडा फैला कर ऐसा करने की कोशिश कर रहे हैं, जिससे देश में अशांति फैल सकती है. असम के बाहर के कुछ राजनीतिक दल देश में गृहयुद्ध की भी धमकी दे रहे हैं! मैं वैसे लोगों से इससे बेहतर किसी चीज़ की उम्मीद भी नहीं कर सकती हूं क्योंकि उनके उत्थान का रास्ता ही विभाजक और सुविधाभोगी राजनीति से होकर निकला है.

लेकिन, मैं अपने देशवासियों से ज़रूर समर्थन की उम्मीद करती हूं. एक असमिया और एक भारतीय होने के नाते मैं आप सब लोगों से अपील करती हूं कि, 'कृपया आप सब इस समय अपने असम के भाई-बहनों के साथ खड़ें हों, जब वे सब एक कठिन समय से गुज़र रहे हैं. आप सब से मेरी गुज़ारिश है कि इस मसले की गंभीरता को समझने के लिए आपलोग भी थोड़ा पढ़ाई करें, शोध करें, जानकारी इकट्ठा करें- ताकि आपको समझ में आ सके कि इस विशाल कवायद़ की आख़िर ज़रूरत क्यों आ पड़ी है. ये हमारी धरती से उन लोगों को बाहर करने की कोशिश है जो ग़ैरकानूनी तौर पर हमारे घर में घुस आए हैं. ये याद रखिएगा कि भारत अपने सभी भागों या टुकड़ों को मिलाकर बना है, यही इसका योग फल है. अगर हमें एक देश के तौर पर इसकी अखंडता को बनाकर या बचाकर रखना है तो इसके छोटे-छोटे हिस्सों की रक्षा करना बेहद ज़रूरी है.'

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