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नोटबैन में पहली तारीख: सैलरी-पेंशन की मांग से बढ़ेगी समस्या

नए महीने की शुरुआत के साथ ही सैलरी और पेंशन के लिए पैसे की मांग बढ़ने वाली है

Updated On: Nov 30, 2016 10:11 AM IST

FP Staff

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नोटबैन में पहली तारीख: सैलरी-पेंशन की मांग से बढ़ेगी समस्या

नोटबैन की मार से परेशान बैंकों और ग्राहकों के लिए अगला एक हफ्ता चुनौती भरा होगा. नए महीने की शुरुआत के साथ ही सैलरी और पेंशन के लिए पैसे की मांग बढ़ने वाली है. कैश की डिमांड में यह इजाफा हर महीने होता है लेकिन यह नोटबैन के बाद ‘पहली तारीख’ है और देश पहले से नकदी संकट से जूझ रहा है.

हालांकि अधिकारियों का दावा है कि स्थिति काबू में है. उनका कहना है कि रिजर्व बैंक और अन्य बैंकों के पास पर्याप्त कैश उपलब्ध है. लेकिन जमीनी हकीकत कुछ और बयां करती है. सच्चाई है कि यहां न तो बैंकों के पास पर्याप्त पैसे हैं और न ही एटीएम में.

500 और 100 के नोटों की कम सप्लाई से यह समस्या और गंभीर हो गई है. बैकों और एटीएम में 2000 के नोट हैं लेकिन ग्राहक इन्हें लेने को जल्दी तैयार नहीं होते. छुट्टे की समस्या के कारण लोग छोटे नोट चाह रहे हैं.

टाइम्स ऑफ इंडिया की एक रिपोर्ट में एक बैंक अधिकारी के हवाले से कहा गया है कि 100 और 500 के उपलब्ध नोट मांग की एक फीसदी के बराबर नहीं है.

कैश के लिए मांग ऊंची रहने वाली है. भले ही सरकार कैशलेश इकॉनमी की बात कर रही हो लेकिन सच्चाई तो यही है कि असंगठित क्षेत्र से जुड़े अधिकतर लोगों ने अभी डिजीटल पेमेंट को अपनाया नहीं है. उदाहरण के तौर पर, घर में काम करने वाली मेड, अखबार वाले, दूध वाले अभी भी ऑनलाइन नहीं हैं. इन्हें कैश में ही पेमेंट चाहिए होता है. भले ही सरकार कितना जोर लगा ले, इतनी जल्दी ये ऑनलाइन नहीं होने वाले.

रोचक बात है कि सामान्य तौर पर महीने की शुरुआत में कितना पैसा बैकों से निकाला जाता है, इसका कोई आंकड़ा मौजूद नहीं है.

केयर रेटिंग्स के मदन सबनवीस कहते हैं, ‘इसका अंदाजा लगाने का एकमात्र तरीका यह है  कि हम सरकार के सैलरी बिल को देखें.  इसमें से आमतौर 30 फीसदी बचत के रूप में रह जाती है जबकि 70 फीसदी निकाल ली जाती है.  हालांकि इससे केवल सरकारी कर्माचारियों का आंकड़ा मिलता है.’

सरकार या आरबीआई की ओर से सूचना की कमी के कारण इस स्थिति को लेकर कंफ्यूजन बढ़  ही रहा है. नोटबंदी की घोषणा के 22 दिन बाद भी लोगों को पता नहीं है कि असल में वर्तमान स्थिति क्या है.

प्रधानमंत्री मोदी और उनके समर्थक नोटबंदी के फायदे- आतंकवाद और कालेधन का खात्मा से लेकर कैशलेस इकॉनमी- तक सुनाते थक नहीं रहे. लेकिन जमीन पर आम आदमी एक ही चीज जानता है कि कैश की कमी से परेशानी हो रही है. अगले कुछ दिनों में यह परेशानी और बढ़ सकती है.

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