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काले धन पर एक कोशिश तो बनती थी बॉस!

हो सकता है यह प्रयोग फेल हो जाए, लेकिन कम से कम एक कोशिश तो बनती है बॉस!

Updated On: Nov 18, 2016 12:46 PM IST

Pratima Sharma Pratima Sharma
सीनियर न्यूज एडिटर, फ़र्स्टपोस्ट हिंदी

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काले धन पर एक कोशिश तो बनती थी बॉस!

आजकल देश का माहौल गरम है. लोग बैंकों और एटीएम की कतार में खड़े हैं. सरकार 500 और 1000 के पुराने नोट बंद करने के फायदे गिना रही है. विपक्ष अपने पूरे लाव-लश्कर के साथ इस पहल की कमियां गिनाने में लगा है. इस कदम के खिलाफ अपना पक्ष रखने वाले आम आदमी की ओट में ही अपनी बात रख पा रहे हैं.

भले ही वो समाजवादी पार्टी के मुलायम या अखिलेश हों या फिर बहुजन समाजवादी पार्टी की मायावती. आम आदमी के नाम से दिल्ली में अपनी सरकार बनाने वाले अरविंद केजरीवाल भला इस मौके को भुनाने से कैसे चूक जाएंगे. चैनलों से लेकर फेसबुक लाइव तक...

हर माध्यम से केजरीवाल आम जनता को यह अहसास दिलाने में लगे हैं कि 'आपको दिक्कत हो रही है. आम आदमी को बहुत दिक्कत हो रही है. लाइन में लगे लोगों के पास काला धन नहीं है. उनकी मेहनत की कमाई है.' यानी विपक्ष का हर नेता आम आदमी को यह समझाने में लगा है कि आपको बहुत दिक्कत हो रही है. लिहाजा यह कदम गलत है.

बेचारी नहीं हैं हम!

कुछ बड़े पत्रकार महिलाओं की आजादी से जोड़कर भी इसे देख रहे हैं. देश का शायद ही कोई पुरुष होगा जिसे यह पता नहीं होगा कि महिलाएं कुछ पैसे अपने पास जोड़कर रखती हैं. इसके मायने ये नहीं है कि अब जब वे पुराने नोट बदलवाने के लिए पैसे निकालेंगी तो पति उन्हें चोर की नजर से देखेगा. अगर ऐसा सच में है तो ये महिलाएं अब भी यह बात अपने पति को जाहिर नहीं करेंगी. मुमकिन है वो किसी और की मदद लेंगी. वो उनका भाई, दोस्त, बहन या बच्चे कोई भी हो सकता है.

Serpentine queue seen outside Bank of India at Sheikh Memon Street, Masjid as ATM was closed to non availability of cash, in Mumbai, India on November 11, 2016. (Sanket Shinde/SOLARIS IMAGES)

अभी भी घर संभालने जैसा बड़ा काम करने वाली महिलाओं को बेचारगी से मत देखिए. जो घर के खर्चों से बचाकर हजारों-लाखों जमा करना जानती हैं, वो अपना पैसा संभाल भी सकती हैं.

इसमे कोई शक नहीं है कि जनता खासतौर पर हर रोज कमाने खाने वालों को काफी दिक्कतों का सामना करना पड़ रहा है. छोटी दूरी पर चलने वाले आॅटो वालों को कोई सवारी नहीं मिल पा रही है. क्योंकि सवारी के पास किराया देने के लिए 10 रुपए खुले नहीं हैं. अगर है भी तो वह उन पैसों का इस्तेमाल दूसरी जरूरी चीजों के लिए करना चाहता है.

समस्याओं का कोई स्टेटस नहीं 

शादी ब्याह के इस सीजन में हर तबके के लोगों को पैसा चाहिए. दिहाड़ी मजदूरों को पैसे की जितनी जरूरत है, उतनी ही जरूरत मध्यम वर्ग के लोगों को भी है. जिन्हें सब्जी-दूध खरीदने से लेकर कामवाली बाई को पैसे देने के लिए खुले पैसे की जरूरत होती है. जिनके पास कभी पैसे की कमी नहीं थी, उन्हें भी पैसे जुगाड़ करने पड़ रहे हैं. अगर उनकी शॉपिंग प्लास्टिक मनी से नहीं हो पा रही है तो उनके पास पैसे मांगने के अलावा कोई दूसरा रास्ता नहीं है. मुमकिन है कि आपके सामने भी ऐसे हालात पैदा हुए हो.

सब्जी बेचने वाले, रिक्शा चलाने वाले निश्चित तौर पर दोहरी समस्या से जूझ रहे हैं. एक तरफ उन्हें सवारी नहीं मिल रही है. दूसरी तरफ अपनी जमा पूंजी बदलवाने के लिए अगर वो दिन भर बैंक में लाइन लगाते हैं तो उस दिन उन्हें कमाई का मौका नहीं मिलेगा. ऐसे में अगर घर में कोई बीमार पड़ जाता है या शादी है तो दिक्कतें दोगुनी हो जाती हैं.

जनता के नाम पर बोलना बंद करो नेता जी!

गरीब, हताश, निराश जनता के नाम झंडा ऊंचा करने वाले नेताओं की बात अगर मान ली जाए तो क्या होगा? यानी नोट बंद करने का फैसला अचानक नहीं लेना चाहिए था. लोगों को नोट बदलवाने का मौका मिलना चाहिए था. या फिर धीरे-धीरे नोट बदलवाने की प्रक्रिया शुरू करनी चाहिए थी.

हमें ईमानीदारी से यह सोचना चाहिए कि अगर सरकार सच में यही तरीका अपनाती तो इसका असली फायदा किसे मिलता. आम जनता को या फिर तिजोरी में काला धन छिपाने वाले को. हमें नहीं लगता कि इस सवाल का जवाब देना जरूरी है क्योंकि आप सबको इसका जवाब पता है.

जनता को भी बदलना होगा 

जनता की एक अलग की पौध होती है. हमें अमेरिका जैसा विकास चाहिए, लेकिन हम रूढ़ीवादिता से निकलेंगे नहीं. हमें सिंगापुर की तरह सिटी प्लानिंग चाहिए, लेकिन मौका मिलते ही हम अपनी बालकनी बढ़ा लेंगे. हमें यूरोप जैसी सफाई चाहिए लेकिन हम सड़क पर थूकेंगे. हम चाय की दुकान पर बैठकर काला धन रखने वालों को गरियाएंगे लेकिन खुद कोई समस्या में नहीं फंसना चाहेंगे.

इसी मनोदशा की वजह से नेता अपने-अपने हिसाब से जनता को हांक लेते हैं. ऐसा नहीं है कि इस कदम से देश से काला धन पूरी तरह साफ हो जाएगा. लेकिन यह अपनी तरह की पहली कोशिश है. एक प्रयोग है. हो सकता है यह प्रयोग फेल हो जाए, लेकिन कम से कम एक कोशिश तो बनती है बॉस!

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