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सुप्रीम कोर्ट को प्रासंगिक बनाए रखने के लिए सुधार की नहीं क्रांति की जरूरतः जस्टिस गोगोई

जस्टिस गोगोई ने कहा है कि सुप्रीम कोर्ट को आम लोगों के लिए सेवा योग्य बनाए रखने के लिए सुधार की नहीं बल्कि क्रांति की जरूरत है

FP Staff Updated On: Jul 12, 2018 10:36 PM IST

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सुप्रीम कोर्ट को प्रासंगिक बनाए रखने के लिए सुधार की नहीं क्रांति की जरूरतः जस्टिस गोगोई

सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस रंजन गोगोई ने 'दो भारत' के बीच का भेद बताते हुए कहा है कि एक भारत ऐसा है जो यह मानता है कि यह अपने आप में नया है जबकि दूसरा 'हास्यास्यपद रूप से तैयार की गई गरीबी रेखा' के नीचे रहता है. जस्टिस गोगोई ने कहा कि दोनों संघर्ष की स्थिति में है. सुप्रीम कोर्ट के सीनियर जस्टिस गोगोई ने कहा कि उस 'संवैधानिक क्षण' का समय आ गया है जो काफी समय से लंबित है.

उन्होंने कहा कि दो भारत को लेकर प्रचलित असमानता को लोग मानते हैं. एक ऐसा भारत है जो दिहाड़ी मजदूरी कर रात्रि आश्रय (नाइट शेल्टर) में रहता है जिसकी पहुंच शिक्षा और स्वास्थ्य जैसी सेवाओं तक नहीं होती. जस्टिस गोगोई ने कहा कि कम से कम ऐसे लोगों को कानून की अदालत तक पहुंचने दें.

इंडियन एक्सप्रेस की खबर के मुताबिक, ‘The Vision of Justice (न्याय की दृष्टि)’ पर बोलते हुए उन्होंने हाल में हुई घटनाओं का जिक्र किया और कहा कि क्या यहीं संवैधानिक नैतिकता की धारणा है जो में दिल्ली सरकार बनाम एलजी के मामले में देखने को मिली और अब सुप्रीम कोर्ट में धारा 377 पर चल रही सुनवाई में देखी जा रही है.

जस्टिस गोगोई ने न्यायपालिका के संदर्भ में संवैधानिक इतिहास और सुप्रीम कोर्ट का जिक्र भी जिक्र किया. उन्होंने कहा कि सुप्रीम कोर्ट का रोल लगातार विकसित हुआ है. उन्होंने कहा कि 70-80 के दशक में मूल संरचना के सिद्धांत का विस्तार हुआ. ऐसे ही 1980 में आर्टिकल 21 का और 1990 के दशक तक सुशासन न्यायालय तक एक हद तक हम पहुंचे.

आजादी के 50 साल बाद तक अदालत ने अच्छा काम किया उसे आगे बढ़ा रहें

जस्टिस गोगोई ने कहा कि आजादी के पचास वर्ष बाद तक अदालत ने एक बहुत ही अच्छी व्यवस्था पैदा की है जिसे हम आज तक बढ़ा रहे हैं. साथ ही उन्होंने कहा कि लेकिन आज हम एक ऐसे जगह खड़े हैं जहां पर अदालत में ट्रायल शुरू होने से पहले ही एक ट्रायल होने लगता है.

उन्होंने कहा कि यह हमारी सामूहिक विफलता है लेकिन क्या यह कानून और राष्ट्र के लिए चिंता का विषय नहीं है कि हम समावेशी के भाव को भी खत्म कर रहे हैं. जस्टिस गोगोई ने कहा कि हमें एक सुधार की नहीं बल्कि एक क्रांति की जरूरत है. जमीन पर चुनौतियों को पूरा करने के लिए, सुप्रीम कोर्ट को आम आदमी के सेवा योग्य बनाए रखने के लिए और सुप्रीम कोर्ट को राष्ट्र के लिए प्रासंगिक रखने के लिए क्रांति जरूरी हो गई है.

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