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रमज़ान में आतंकियों के खिलाफ सुरक्षाबलों का अभियान रोकने का कोई औचित्य नहीं

मोदी सरकार ने जम्मू-कश्मीर की मुख्यमंत्री महबूबा मुफ्ती की विशेष सिफारिश पर राज्य में आतंकियों के खिलाफ चलाए जा रहे अभियान को रमज़ान के दौरान रोकने का फैसला किया है

Yusuf Ansari Updated On: May 19, 2018 09:37 AM IST

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रमज़ान में आतंकियों के खिलाफ सुरक्षाबलों का अभियान रोकने का कोई औचित्य नहीं

मोदी सरकार ने जम्मू-कश्मीर की मुख्यमंत्री महबूबा मुफ्ती की विशेष सिफारिश पर राज्य में आतंकियों के खिलाफ चलाए जा रहे अभियान को रमज़ान के दौरान रोकने का फैसला किया है. इस बाबत गृहमंत्री ने सुरक्षा बलों को ज़रूरी हिदायत भी जारी कर दी है. हालांकि गृहमंत्री की इस घोषणा के कुछ देर बाद ही पाकिस्तान में बैठे आतंकी संगठनों के आकाओं ने रमज़ान के दौरान भी सुरक्षा बलों पर हमले जारी रखने का ऐलान कर दिया था. अपने कहे के मुताबिक आतंकियों ने रमज़ान के पहले ही दिन दो वारदात करके अपने इरादे भी ज़ाहिर कर दिए.

ख़बर है कि रमज़ान के पहले ही दिन लश्कर-ए-तैय्यबा के आतंकियों ने हाजिन में सब-इंस्पेक्टर भर्ती परीक्षा की तैयारी कर रहे 23 साल के एक नौजवान की हत्या कर दी है. वहीं सूबे की राजधानी श्रीनगर की एक पॉश कालोनी में आतंकी एर होटल क सुरक्षा में तैनात सुरक्षाबलों पर हमला करके उनके हथियार लेकर भाग गए हैं. ये दोनों ही घटनाएं रमज़ान के दौरान घाटी का माहौल बिगाड़ने की कोशिशें है. एक तरह से देखा जाए तो यह सुरक्षा बलों के एकतरफा सीजफायर का मज़ाक उड़ाने के मकसद से आतंकियों ने ये हरकते की हैं. इसीलिए श्रीनगर में सुरक्षा बलों पर ऐसी जगह हमला किया गया जहां से कुछ ही फासले पर मुख्यमंत्री महबूबा मुफ्ती, पूर्व मुखमंत्री उमर अब्दुल्ला और फारूक अब्दुल्ला समेत राज्य की कई बड़ी राजनीति हस्तियों के घर हैं. ज़ाहिर है ऐसे हाई सुरक्षा वाले इलाके में हमला करके आतंकियों ने सुरक्षा बलों को सीधी चुनौती दी है.

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गौरतलब है कि गृहमंत्रालय ने सुरक्षाबलों को आतंकियों के खिलाफ अभियान रोकने की हिदायत देते वक्त जवाबी कार्रवाई पर की रोक नहीं लगाई थी. लिहाजा इस हमले के बाद सुरक्षाबलों ने हाई अलर्ट जारी करके आतंकियों को ढूंढने के लिए तलाशी अभियान शुरू कर दिया है. सेनाध्यक्ष जनरलल विपिन रावत पहले ही कह चुके हैं कि सेना उससे लड़ने वाले आतंकियों के खिलाफ कोई नरमी नहीं बरतेगी. बरतनी भी नहीं चाहिए. अगर इस्लाम के नाम पर आतंक फैलाने वाले आतंकी रमज़ान के पवित्र महीने का भी एहतराम नहीं करते तो फिर उनके खिलाफ नरमी बरते जाने का कोई औचित्य नहीं है.

रमज़ान की पवित्रता का एहतराम इस्लाम के मानने वालों पर फर्ज़ है न कि सुरक्षा बलों के जवानों पर. धर्मनिरपेक्ष देश के सुरक्षा बल भी धर्मनिरपेक्ष हैं. किसी धर्म के त्यौहार विशेष के एहतराम की खातिर उनके हाथ बांध देना उचित नहीं है.

दरअसल जम्मू-कश्मीर में सक्रिय आतंकियों की नज़र में न रमज़ान की कोई अहमियत है और नहीं ईद की. उनके लिए न मस्जिद कोई मायने रखती है और न नमाज़ी. इसीलिए उनके हमले न रमज़ान में रुकते हैं न ईद पर. इस्लाम के नाम पर आतंक फैला रहे इन आतंकियों को न तो मस्जिदों पर हमला करने शर्म आती है और न ही नमाजियों पर गोली चलाते हुए इनके हाथ कांपते है. इसीलिए सोशल मीडिया पर केंद्रीय गृहमंत्री राजनाथ सिंह से सुरक्षा बलों को रमज़ान में आतंकियों के खिलाफ चलाए जा रहे अभियान को रोकने की हिदायत देने वाले ट्वीट पर जमकर मज़ाक उड़ा था.

कई लोगों ने गृहमंत्री से सवाल किया है कि अगर आतंक का कोई धर्म नहीं होता तो फिर रमज़ान के नाम पर आतंकियों से नरमी क्यों बरती जा रही है. ऐसा करके उन्हें इस्लाम से क्यों जोड़ा जा रहा है?

इस सवाल पर गृह मंत्रालय ही नहीं बल्कि मोदी सरकार भी बैकफुट पर है. हालांकि गृह मंत्रालय के एक प्रवक्ता ने एकतरफा सीज़फायर को आतंकी हमलों से इस्लाम का नाम खराब करने वालों को अलग-थलग करने के लिए यह महत्वपूर्ण कदम बताया है. काश कि ऐसा ही होता. सरकार ने भले ही नेक नीयत से यह कदम उठाया हो लेकिन इस्लाम का नाम खराब करने पर तुले आतंकियों को इससे कोई सरोकार नहीं है.

जम्मू-कश्मीर की मुख्यमंत्री महबूबा मुफ्ती और उनके मरहूम अब्बा मुफ्ती मोहम्मद सईद ने अपनी पार्टी पीडीपी की बुनियाद ही आतंकियों के प्रति ‘हीलिंग टच’ यानि ज़ख्मों पर मरहम लगाने की नीति के साथ रखी थी. आतंकी संगठनों ने इस नीति का जवाब उन्हें नए ज़ख़्मों से दिया है. आतंकी हमले न मुफ्ती सईद के दौर में कम हुए थे न महबूबा मुफ्ती के दौर में कम हो रहे है. बल्कि अब तो राज्य में आतंकियों के समर्थकों ने पत्थरबाज़ी को एक मज़बूत हथियार बना लिया है.

इतिहास गवाह है जम्मू-कश्मीर में आतंकियों ने कभी रमज़ान का एहतराम नहीं किया. पिछले साल भी रमज़ान के दौरान कश्मीर जलता रहा था. पिछले साल यानि 2017 में रमज़ान के दौरान फौज, पुलिस, आतंकवादी और स्थानीय नागरिकों को मिलाकर 42 लोग मारे गए थे. सबसे ज्यादा दर्दनाक मौत डीएसपी मोहम्मद अय्यूब पंडित की हुई थी. उन्हें भीड़ ने पीट-पीटकर मार डाला था. रमज़ान के दौरान पिछले साल 5 स्थानीय नागरिक, 9 पुलिसकर्मी और 25 आंतकी मारे गए थे. इनमें हिजबुल कमांडर सबजार बट भी शामिल था. उसे सुरक्षाबलों ने रमज़ान की शुरुआत में ही एक एनकाउंर में मारा था. उसकी मौत के बाद तीन दिनों तक बाजार बंद रहे. सुरक्षाबलों और आतंकियों के बीच हिंसक झड़प हुई. इसके करीब तीन हफ्ते बाद ही आतंकियों ने पुलिस चौकी को निशाना बनाया जिसमें एसएचओ फिरोज अहमद डार समेत 6 पुलिसकर्मियों की मौत हुई.

इससे पहले साल 2016 में रमज़ान के दौरान कश्मीर घाटी में 32 लोगों की मौत हुई थी. इनमें 2 जवान, 22 आंतकी और 8 सीआरपीएफ के जवान थे. हालांकि उस साल कोई स्थानीय नागरिक नहीं मारा गया था. रमजान खत्म होने के कुछ ही दिन बाद 8 जुलाई 2016 को हिजबुल के पोस्टर बॉय बुरहान वानी को सुरक्षा बलो ने एनकाउंटर में मार गिराया गया था. उसके बाद से कश्मीर में हिंसा का एक नया दौर शुरू हुआ था.

INDIAN PRIME MINISTER WAVES TO PUBLIC IN CHANDIGARH.

जम्मू-कश्मीर में सुरक्षा बलों का एकतरफा सीज़फायर कभी कामयाब नहीं रहा. इससे पहले 19 नवंबर 2000 को तात्कालीन अटल बिहारी वाजपेयी सरकार ने आतंकियों के खिलाफ अभियान रोकने का एकतरफा एलान किया था. यह अभियान 28 नवंबर 2000 से लागू किया गया था. तब केंद्र सरकार की यह योजना बुरी तरह नाकाम रही थी. आतंकियों ने इसका फायदा उठाते हुए कई हमले किए थे. इसमें सुरक्षा बलों के 43 जवानों सहित 129 लोग मारे गए थे.

लिहाज़ा पुराना रिकॉर्ड देखते हुए यह कहा जा सकता है कि रमज़ान के दौरान सुरक्षा बलों को आतंकियों के खिलाफ किसी तरह की नरमी नहीं बरतनी चाहिए. सुरक्षा एजेंसियों का भी साफ मानना है कि आतंकी समूहों पर पैनी निगाह रखना बेहद ज़रूरी है. एकतरफा सीज़फायर जैसे मौकों का इस्तेमाल आतंकी अपना संगठन मजबूत करने में करते हैं.

ग़ौरतलब है कि नब्बे के दशक में रमजान के दौरान घाटी में आतंकवादी सुरक्षाबलों पर हमला नहीं करते थे. कुछ साल पहले यह परंपरा टूट गई. ऐसा लगता है कि आतंकी सुरक्षा बलों को चिढ़ाने और अपने खिलाफ कार्रवाई के लिए उकसाने के मकसद से रमज़ान को दौरान उन पर योजनाबद्ध तरीके से हमला करते हैं. ऐसा करके वो सुरक्षा बलों की इस्लाम और मुसलमान विरोधी छवि बनाना चाहते है. लिहाज़ा रमज़ान में आतंकियों के खिलाफ चलाए जा रहे विशेष अभियान को रोकने का कोई औचित्य नहीं है.

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