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बस्तर सीरीज: छत्तीसगढ़ के माओवादियों और इस्लामिक चरमपंथियों में कोई संबंध नहीं- नक्सल विरोधी ऑपरेशन प्रमुख

बस्तर में वामपंथी अतिवाद की घटनाओं पर लगाम कसने के लिए सरकार ने दोधारी रणनीति अपनाई थी और पुलिस-बल का आक्रामक रवैया इस रणनीति का हिस्सा है

Updated On: Aug 02, 2018 07:30 AM IST

Debobrat Ghose Debobrat Ghose
चीफ रिपोर्टर, फ़र्स्टपोस्ट

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(एडिटर्स नोट: इस साल अप्रैल में, गृह मंत्रालय ने वामपंथी अतिवाद से ग्रस्त जिलों में से 44 जिलों के नाम हटा लिए थे. ये इस बात का इशारा था कि देश में माओवादी प्रभाव कम हुआ है. ये एक ऐसी बहुआयामी रणनीति का नतीजा है, जिसके तहत आक्रामक सुरक्षा और लगातार विकास के जरिए स्थानीय लोगों को माओवादी विचारधारा से दूर लाने के प्रयास किए जा रहे हैं. हालांकि, ये नक्सल प्रभावित इलाकों में माओवादियों के कब्जे का अंत नहीं है. खतरा अब भी जंगलों में छुपा हुआ है- हारा हुआ, घायल और पलटकर वार करने के लिए बेताब. माओवादियों के गढ़ में घुसकर अतिवादियों की नाक के ठीक नीचे विकास कार्यों को बढ़ाना प्रशासन के सामने असली चुनौती है. तो फिर जमीन पर असल स्थिति क्या है? फ़र्स्टपोस्ट के रिपोर्टर देवव्रत घोष छत्तीसगढ़ में माओवादियों के गढ़ बस्तर में यही देखने जा रहे हैं. बस्तर वामपंथी अतिवाद से सबसे ज्यादा बुरी तरह जकड़ा हुआ है और यहीं माओवादियों ने अपने सबसे बड़े हमलों को अंजाम दिया है. इस सीरीज में हम देखेंगे कि यहां गांवों में कैसे बदलाव आए हैं, गांव वाले इन बदलावों को लेकर कितने उत्सुक हैं और ये भी कि खत्म होने का नाम नहीं लेने वाले माओवादियों के बीच में विकास कार्यों को बढ़ाने की मुहिम में प्रशासन और सुरक्षा बल कितने खतरों का सामना करते हैं.)

बीते तीन सालों में छत्तीसगढ़ में वामपंथी अतिवाद की घटनाओं में कमी आई है, इसे साफ देखा जा सकता है. इसकी वजह केवल यही नहीं कि आदिवासी गांवों में विकास के काम हुए हैं बल्कि यह भी है कि सूबे की पुलिस ने नक्सलियों के खिलाफ आक्रामक रवैया अख्तियार किया है.

बस्तर में वामपंथी अतिवाद की घटनाओं पर लगाम कसने के लिए सरकार ने दोधारी रणनीति अपनाई थी और पुलिस-बल का आक्रामक रवैया इस रणनीति का हिस्सा है. रणनीति यह बनाई गई थी कि विकास के काम तो किए ही जाएंगे साथ ही पुलिस आक्रामक अभियान भी चलाएगी जबकि पहले की स्थिति इसके उलट थी, तब पुलिस को रक्षात्मक रुख अपनाने की हिदायत रहती थी.

फ़र्स्टपोस्ट के साथ एक खास इंटरव्यू में एंटी नक्सल ऑपरेशन के स्पेशल डायरेक्टर जेनरल डीएम अवस्थी ने मौजूदा हालात, योजना और रणनीति के बारे में जानकारी दी. डीएम अवस्थी स्पेशल इंटेलीजेंस ब्यूरो के भी प्रमुख हैं.

छत्तीसगढ़ सरकार वामपंथी अतिवाद से निबटने में किस हद तक कामयाब हो पाई है?

मोटे तौर पर देखें तो बीते 15 सालों ने तीन दौर देखे हैं. पहला दौर 2003 से 2008 के बीच का रहा जब सरगुजा, राजनंदगांव और बस्तर के इलाके में नक्सलियों का जबरदस्त असर था. इस दौर में माओवादियों ने बड़ी तादाद में हमले किए. दूसरा दौर 2008 से 2013 के बीच का था जब बस्तर और राजनंदगांव के अतिरिक्त माओवादियों का दबदबा गरियाबंद और धमतरी में भी कायम हुआ. पुलिस और सुरक्षाबलों ने अपनी तरफ से बेहतर काम दिखाया लेकिन इसके बावजूद इस दौर में माओवादियों ने कुछ बड़े हमले किए.

इनमें झीरम घाटी में हुआ हमला भी शामिल है जिसमें कांग्रेस के कई नेता मारे गए. ऐसे हमले सूबे के लिए एक दाग की तरह थे. तीसरा दौर 2014 के बाद से शुरू हुआ है, जब जोर छत्तीसगढ़ में नक्सिलयों से निबटने के लिए पूरे ढांचे को नए सिरे से खड़ा करने पर दिया जा रहा है. यह बात विकास कार्यों के बाबत भी कही जा सकती है और सुरक्षा सबंधी रणनीतियों को मजबूत बनाने के बारे में भी. हमने माओवाद से निबटने की अपनी रणनीति बदल दी है और इसके नतीजे आने शुरू हो गए हैं.

सरकार का दावा है कि बस्तर में हुए विकास के कामों के कारण माओवादियों को अपने कदम पीछे खींचने पर मजबूर होना पड़ा है, यह बात किस हद तक सही है?

यह बात सही है. सड़क, शिक्षा संस्थान, प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र, अस्पताल तथा कम्युनिटी सेंटर सरीखे विकास के बहुत सारे काम हुए हैं. केंद्र सरकार की एक योजना के तहत, 75 नए पुलिस स्टेशन बनाए गए हैं. नक्सल-प्रभावित इलाके में हुए विकास कार्य तथा सुरक्षाबलों की कार्रवाई के कारण माओवादी घने जंगलों के भीतर छुपने को मजबूर हुए हैं जो कि उनका एक तरह से गढ़ है. तीन साल पहले हालात ऐसे नहीं थे, तब माओवादियों का सड़क और शहरों तक में दबदबा था.

अगर माओवादियों को कदम पीछे खींचने पर मजबूर होना पड़ा है तो फिर हर महीने उनके हमले क्यों हो रहे हैं?

इसकी कई वजहें हैं. बस्तर 39,117 वर्ग किलोमीटर के दायरे में फैला हुआ है. यह विस्तार केरल तथा कई अन्य राज्यों की तुलना में ज्यादा है. इतने विशाल इलाके में सुरक्षा का काम संभालना अपने आप में बहुत कठिन और चुनौती भरा है. कभी-कभी हल्की सी चूक भी बड़े नुकसान का कारण बन जाती है. माओवादी आमने-सामने की लड़ाई नहीं लड़ते, वे अमूमन इम्प्रोवाइज्ड एक्सप्लोसिव डिवाइसेज (IEDs) के जरिए विस्फोट करते हैं और उनके विस्फोटक जमीन या फिर सड़क पर बिछी कोलतार की पट्टी के नीचे छुपे होते हैं जिसके बारे में अनुमान लगा पाना मुश्किल है. माओवादी अब अपनी जान बचाने की लड़ाई लड़ रहे हैं.

फिलहाल, बस्तर के किस इलाके में नक्सलियों का दबदबा है?

माओवादियों का दबदबा उनके गढ़ माने जाने वाले इलाके जैसे सुकमा जिले के दक्षिणी हिस्से में है, यह तेलंगाना की सीमा से लगता हुआ इलाका है. एक और इलाका बीजापुर है जिसकी सीमा तेलंगाना और महाराष्ट्र से मिलती है. इसी तरह कोंडगांव तथा कांकेर जिले के अलावा दंतेवाड़ा जिले का एक हिस्सा माओवादियों के दबदबे में है. महाराष्ट्र की सीमा से लगते नारायणपुर जिले में अबूझमाड़ का बहुत बड़ा पहाड़ी और जंगली इलाका माओवादियों के नियंत्रण में है. हमारा मुख्य लक्ष्य अबूझमाड़ के इसी इलाके को भेदने का है क्योंकि यह इलाका अब भी बड़े हद तक हमारी पहुंच से दूर बना हुआ है.

छत्तीसगढ़ में वामपंथी अतिवाद से निबटने के लिए आपकी रणनीति क्या है?

हमने 2016 में अपनी रणनीति बदली और आक्रामक रवैया अपनाया. अब सीआरपीएफ, बीएसएफ, आईटीबीपी जैसे केंद्रीय बल और स्पेशल टास्क फोर्स और छत्तीसगढ़ पुलिस के डिस्ट्रिक्ट रिजर्व गार्ड माओवादियों के गढ़ माने जानेवाले इलाके में गश्त करते और अभियान चलाते हैं. हम अब किसी आक्रमण या घात लगाकर किए जाने वाले हमले के इंतजार में नहीं बैठे रहते बल्कि खुफिया सूत्रों से हासिल जानकारी के आधार पर माओवादी दबदबे वाले उन इलाकों में आक्रामक रवैया अख्तियार करते हुए दबिश देते हैं जहां वे अपना कैंप या प्रशिक्षण शिविर चला रहे होते हैं.

पहले माओवादी हमारे सुरक्षाबलों का पीछा किया करते थे आज यह स्थिति उलट गई है. साल 2016 से 2018 के बीच हमने 250 से ज्यादा माओवादियों को मार गिराया है या हथियार सौंपने पर मजबूर किया है. साल 2017 के 25 मई को हमने ऑपरेशन प्रहार शुरू किया. इसमें सुरक्षाबल माओवादियों के छुपने के ठिकानों तक पहुंचे और सात घंटे चली लड़ाई के बाद 30 माओवादियों को मार गिराने में कामयाबी हासिल की. इस लड़ाई में हमारे भी तीन जवान शहीद हुए. इस घटना ने हमारे पूरे रणनीतिक मोर्चे को बदल डाला. हमलोग एक खास एलीट नक्सल-विरोधी सुरक्षाबल ब्लैक पैंथर तैयार करने की कोशिश कर रहे हैं. ब्लैक पैंथर अपने अभियान में कहीं ज्यादा कारगर साबित होंगे.

अक्सर खुफिया जानकारी के मिलने में देरी होने या फिर मौके के हिसाब से तत्काल खुफिया जानकारी ना मिलने के कारण माओवादी पुलिसबल पर भारी पड़ते रहे हैं. अभी क्या स्थिति है?

केंद्रीय और प्रांतीय स्तर के खुफिया एजेंसियों की भूमिका बढ़ गई है. हमारा खुफिया नेटवर्क बेहतर हुआ है, हमें अब पहले की तुलना में सही समय पर सटीक खुफिया जानकारी ज्यादा मिलती है और जमीनी स्तर की इस जानकारी के आधार पर हम पहले की अपेक्षा कहीं ज्यादा कामयाब अभियान चला पा रहे हैं. स्पेशल इंटेलीजेंस ब्यूरो के हमारे अपने ऑपरेशन रूम में चौबीसों घंटे सक्रिय रहने वाला मॉनिटरिंग सिस्टम मौजूद है और हम हासिल जानकारी के हिसाब से अपने सुरक्षाबलों को निशानदेही की जगह पर भेजते हैं. माओवादियों की गतिविधियों की टोह लेने के लिए अब हम हाईटेक सर्विलांस सिस्टम का इस्तेमाल कर रहे हैं. साल 2016 से 2017 के बीच हमने खुफिया जानकारी के आधार पर 200 से ज्यादा अभियान अंजाम दिए हैं.

मामले में ओड़िशा और तेलंगाना जैसे नक्सल-प्रभावित पड़ोसी राज्यों के साथ तालमेल और खुफिया जानकारी का लेन-देन बेहतर हुआ है. खुफिया जानकारी के लेन-देन के हिसाब से इंटेलीजेंस ब्यूरो के काम में भी बहुत ज्यादा सुधार आया है और उनसे हमें अच्छी मदद हासिल हो रही है.

क्या बस्तर के दंडकारण्य क्षेत्र के माओवादियों और देश में सक्रिय अन्य बागी जमातों, खासकर अलकायदा, लश्कर-ए-तैय्यबा या इंडियन मुजाहिद्दीन के बीच कोई खास रिश्ता है?

अलकायदा, लश्कर-ए-तैय्यबा या फिर इंडियन मुजाहिद्दीन के उग्रवादियों के साथ बस्तर के दंडकारण्य के माओवादियों के रिश्ते के बारे में छत्तीसगढ़ पुलिस को अभी तक कोई सबूत नहीं मिले हैं. हां, ये हो सकता है कि माओवादियों के पूर्वोत्तर में सक्रिय बागी जमातों से रिश्ते हों.

माओवादियों को हथियार और गोला-बारुद कहां से हासिल होता है?

ज्यादातर हथियार और गोला-बारूद माओवादियों ने सुरक्षाबलों से लूटे हैं. इसके अतिरिक्त, घने जंगलों में उन्होंने अपने मैन्युफैक्चरिंग यूनिट भी बना रखे हैं. ऐसे इलाके को लिबरेटेड जोन (मुक्त क्षेत्र) कहा जाता है. यहां वे बेहतर किस्म के हथियार बनाते हैं. उन लोगों के पास जर्मनी में बनी पिस्टल और अत्याधुनिक किस्म की बंदूकें हैं जो बहुत संभव है उन्हें नेपाल या बांग्लादेश के रास्ते पूर्वोत्तर की बागी जमातों से मिली हों. माओवादियों ने आईईडी (IEDs) बनाने में महारत हासिल कर ली है. वे इसके लिए टिफिन बॉक्स, प्रेशर कुकर तथा स्टील के डिब्बों का इस्तेमाल करते हैं. विस्फोट की सामग्री वे लोग या तो लूट के जरिए हासिल करते हैं या फिर ठेकेदारों को धमकाकर जुटा लेते हैं.

पुलिस के खिलाफ आरोप हैं कि उसने माओवादी करार देकर मुठभेड़ में कई निर्दोष आदिवासियों को मारा है और आत्मसमर्पण की फर्जी घटनाएं पेश आई हैं...

हो सकता है गुजरे वक्त में ऐसी घटनाएं हुई हों, इससे पुलिस की छवि मलिन हुई है. बहरहाल, हम फर्जी मुठभेड़ के तरफदार नहीं हैं. मैंने निर्देश जारी किया है कि किसी भी निर्दोष व्यक्ति को गिरफ्तार या मुठभेड़ में मारने का वाकया पेश नहीं आना चाहिए, अगर फर्जी मुठभेड़ या किसी किस्म की ज्यादती की कोई शिकायत आएगी तो उस शिकायत के आधार पर कड़ी कार्रवाई की जाएगी. बीते डेढ़ साल में एक भी शिकायत नहीं आई है.

आपने छतीसगढ़ पुलिस हाउसिंग कॉर्पोरेशन(सीपीएचसी) के प्रबंध निदेशक(मैनेजिंग डायरेक्टर) के रूप में इसके प्रमुख की भी भूमिका निभाई है. माओवाद के असर वाले जिलों में सीपीएचसी की क्या भूमिका है?

बीते पांच सालों में सीपीएचसी के काम माहौल को एक सिरे से बदल देने वाले साबित हुए हैं. माओवादियों के असर वाले इलाकों में बुनियादी ढांचे के विकास के काम में बड़ी सफलता हासिल हुई है. कारपोरेशन ने बस्तर डिवीजन में माओवादियों के असर वाले उन इलाके में पुलिस स्टेशन और बैरक बनाया है जहां लोक-निर्माण विभाग (पब्लिक वर्क्स डिपार्टमेंट) अभी तक पहुंच नहीं पाया था. एक खास पहल के तहत हाऊसिंग कॉर्पोरेशन ने सुकमा जिले में दो सड़कें बनाई हैं क्योंकि ठेकेदार डर के मारे टेंडर की प्रक्रिया में शरीक नहीं हुए थे.

Next Up: बस्तर में विकास कार्य हुआ है, इसे साफ देखा जा सकता है लेकिन इसके बावजूद आखिर विरोध की आवाजें यहां क्यों कायम हैं? लेखमाला की अगली और अंतिम कड़ी में इस बात का जायजा लिया जाएगा कि आखिर वो कौन सी शिकायतें और परेशानियां हैं जिनकी वजह से माओवादी आदिवासी गांवों को अपनी तरफ करने में कामयाब होते हैं.

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