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नीतीश कुमार का दलित वोट बैंक को लेकर खेला गया मास्टर स्ट्रोक कितना कारगर?

पिछले 2 अप्रैल को देश में उग्र दलित आंदोलन के बाद राजनीतिक दलों में दलित वोट बैंक साधने की नई कवायद शुरू हो गई है

Ravishankar Singh Ravishankar Singh Updated On: May 09, 2018 08:09 PM IST

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नीतीश कुमार का दलित वोट बैंक को लेकर खेला गया मास्टर स्ट्रोक कितना कारगर?

बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने दलितों के विकास के लिए एक नया तरीका ढूंढ निकाला है. नीतीश कुमार की अगुवाई वाली एनडीए सरकार ने दलित छात्रों की आर्थिक मदद के लिए अब एक नई पद्धति विकसित कर ली है. बिहार सरकार यूपीएससी और बीपीएससी की प्रारंभिक परीक्षा में उत्तीर्ण होने वाले एससी और एसटी उम्मीदवारों को आगे की तैयारी जारी रखने के लिए एक लाख और 50 हजार रुपए देने का फैसला किया है.

बीते मंगलवार को ही बिहार कैबिनेट ने मुख्यमंत्री अनुसूचित जाति एवं अनुसूचित जनजाति सिविल सेवा प्रोत्साहन योजना के नाम से एक योजना की शुरुआत की है. बिहार कैबिनेट ने दलित और आदिवासी छात्रों के लिए और भी कई योजनाओं की शुरुआत की है.

बिहार के किसी भी छात्रावास में रहने वाले दलित और आदिवासी छात्रों को सरकार अब हर हफ्ते एक हजार रुपए की भत्ता भी देने जा रही है. इसके अलावा भी राज्य सरकार ने दलित और आदिवासी छात्रों को 15 किलो गेंहू और चावल हर महीने देने का निर्णय किया है.

बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार का यह फैसला आने वाले दिनों में देश के दूसरे राज्यों में भी दोहराया जा सकता है. ऐसे में सवाल यह पैदा होता है कि क्या वोट बैंक की राजनीति को लेकर देश में नया खेल शुरू हो गया है? सरकार के इस फैसले के बाद अनारक्षित वर्ग के छात्रों के मनोबल पर कहीं बुरा प्रभाव तो नहीं पड़ेगा?

पिछले 2 अप्रैल को देश में उग्र दलित आंदोलन के बाद राजनीतिक दलों में दलित वोट बैंक साधने की नई कवायद शुरू हो गई है. राजनीतिक पार्टियां 2019 लोकसभा चुनाव को देखते हुए ज्यादा सतर्क दिखने लगी है. देश की सभी राजनीतिक पार्टियां किसी भी कीमत पर दलित वोट बैंक को अपने पास से खिसकने नहीं देना चाहती है. राजनीतिक पार्टियों ने दलित वोट बैंक को साधने के लिए तरह-तरह की तरकीब आजमाना शुरू कर दी हैं. बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार का भी यह फैसला इसी नजिरये से देखा जा रहा है.

प्रतीकात्मक तस्वीर

प्रतीकात्मक तस्वीर

दलित आंदोलन को करीब से समझने वाले वरिष्ठ पत्रकार अनिल चामड़िया फ़र्स्टपोस्ट हिंदी से बात करते हुए कहते हैं, ‘नीतीश कुमार का यह फैसला बढ़िया है, लेकिन बहुत ही देरी से लिया गया फैसला है. नीतीश कुमार कई टर्म से बिहार के सीएम हैं और अब जाकर इस तरह के फैसले ले रहे हैं. उनका यह फैसला दबाव का ही सूचक है. देश में इस वक्त पढ़े-लिखे दलितों का जो मूड है वह बिल्कुल एंटी एनडीए मूड है. अब एंटी एनडीए मूड के दौर में यह फैसला लिया गया है. कुछ दलित छात्र जो यह पात्रता हासिल करने की क्षमता रखते हैं, उनको निश्चित ही इस फैसले से लाभ मिलेगा.’

दिल्ली विश्वविद्यालय के असिसटेंट प्रोफेसर (अतिथि) सुभाष गौतम भी फ़र्स्टपोस्ट हिंदी से बात करते हुए कहते हैं, ‘बिहार सरकार का यह फैसला राजनीतिक है. जो छात्र यूपीएससी या बीपीएससी की तैयारी कर रहे हैं वह किसी न किसी रूप में परीक्षा की तैयारी में खुद सक्षम हैं. पैसे की जरूरत यूपीएससी और बीपीएससी छात्रों को नहीं बल्कि जो छात्र यहां तक भी नहीं पहुंच पा रहे हैं, उनके लिए यह अनुदान अगर होता तो सही मायने में इसका सही उपयोग हो पाता. दलित छात्रों को दिया जाने वाला यह अनुदान मुझे लगता है कि वोट बैंक की राजनीति का हिस्सा है. आप एक तरफ तो नौकरी नहीं दे रहे हैं और दूसरी तरफ इस तरह के हथकंडे अपनाकर वोट बैंक की राजनीति कर रहे हैं.’

दूसरी तरफ सामान्य वर्ग के छात्र नीतीश कुमार के फैसले का विरोध कर रहे हैं. फ़र्स्टपोस्ट हिंदी ने बिहार लोक सेवा आयोग की परीक्षा की तैयारी करने वाले एक छात्र कन्हैया कुमार से बात की. कन्हैया कुमार ने फ़र्स्टपोस्ट हिंदी से बात करते हुए कहा, ‘राजनेता वोट बैंक की राजनीति में छात्रों के भविष्य के साथ खिलवाड़ कर रहे हैं. इनको समझना चाहिए कि इस तरह के फैसले से सामान्य वर्ग के छात्रों में भी गुस्सा पैदा होगा. यह आगे चल कर काफी गंभीर रूप धारण कर सकता है. वैसे भी इस देश में बेरोजगारों की लंबी फौज खड़ी है.’

दूसरी तरफ यह कहा जा रहा है कि बिहार में एनडीए गठबंधन वाली सरकार दलितों के लिए विशेष पैकेज का एलान कर दलितों के प्रति सहानुभूति दिखा कर एक तीर से कई निशाने साधे हैं. बिहार की मुख्य विपक्षी पार्टियां आरजेडी को भी नीतीश कुमार ने जवाब दे दिया है, जो लगातार सरकार पर दलित विरोधी होने का आरोप लगा रही थी.

2 अप्रैल 2018 को देश में उग्र दलित आंदोलन के बाद कई राज्य सरकारों की रातों की नींद गायब हो गई थी. ऐसे में दलित वोट वैंक को साधने के लिए कई कदम उठाने की बात कही जा रही है. खासकर बीजेपी ने यूपी में दलित वोट बैंक साधने के लिए राज्य से लेकर केंद्र तक मंत्रिमंडल में विस्तार की भी बात कही जा रही है.

पिछले दिनों एससी-एसटी एक्ट में गिरफ्तारी को लेकर सुप्रीम कोर्ट का एक निर्णय आया था. इसके बाद देशभर में बवाल कटा. ऐसे में राजनीतिक पार्टियां खासकर बीजेपी और कांग्रेस दलितों को लुभाने के लिए कई तरह के प्रयास कर रही हैं.

मध्य प्रदेश में भी दलित हिंसा के बाद बीजेपी जमीनी स्तर पर दलितों में पैठ बनाने के लिए बस्ती प्रमुख तैयार कर रही है. सबसे बड़ी बात है कि बस्ती प्रमुख की जिम्मेदारी किसी राजनीतिक व्यक्ति को नहीं, बल्कि रिटायर्ड अफसरों को दी जा रही है.

कर्नाटक चुनाव में भी कांग्रेस पार्टी बीजेपी को दलित उत्पीड़न के मुद्दे पर घेरने की कोशिश कर रही है. एससी-एसटी एक्ट को लेकर सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद भी कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी मोदी सरकार पर जमकर निशाना साध रहे हैं. राहुल गांधी मोदी सरकार पर सुप्रीम कोर्ट में मजबूती से अपना पक्ष नहीं रखने के आरोप लगा रहे हैं.

PM Modi attends the concluding ceremony of Centenary of Champaran Satyagraha in Bihar

कांग्रेस पार्टी देश भर में मोदी सरकार को एंटी दलित ठहराने की कोशिश में लगी हुई है. कांग्रेस को लगता है कि देश भर में दलित और मुस्लिम अगर उसके साथ आ जाएं तो बीजेपी को परेशानी हो सकती है.

आपको बता दें कि पिछले लोकसभा चुनाव में बीजेपी को बहुत बड़ी तादाद में दलित और आदिवासी तबके ने वोट दिया था. दलित समुदाय के समर्थन का ही नतीजा है कि यूपी से मायावती के नेतृत्व में बीएसपी का लोकसभा चुनाव में खाता तक नहीं खुल पाया था. विधानसभा चुनाव में महज 19 सीटों पर बीएसपी सिमट गई थी.

राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि एससी-एसटी अधिनियम के विषय में सुप्रीम कोर्ट के फैसले के खिलाफ दलित विरोध बीजेपी को परेशान कर रहा है. देशभर में कई दलित संगठनों का सरकार के प्रति रोष बढ़ता ही जा रहा है. देशभर की विपक्षी पार्टियां सरकार पर दलित विरोधी का आरोप लगा रही हैं. सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद भी देश में एससी-एसटी कानून में बदलाव को लेकर बहस छिड़ी हुई है. बीजेपी के लिए ताजा दलित आंदोलन गले की फांस बन गया है. बीजेपी की समस्या यह है कि उसके एक के बाद एक दलित सांसद खुलकर नाराजगी व्यक्त कर रहे हैं.

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