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शराबबंदी कानून में ढील देना नीतीश की सियासी जरूरत है

नीतीश कुमार के लिए महादलितों के बीच अपनी लोकप्रियता बनाए रखने के लिए कानून में ढील देना जरूरी था.

Vivek Anand Vivek Anand Updated On: Jul 12, 2018 08:28 PM IST

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शराबबंदी कानून में ढील देना नीतीश की सियासी जरूरत है

अगस्त 2016 की बात है. बिहार में शराबबंदी लागू हुए बस कुछ महीने हुए थे. बिहार के सीएम नीतीश कुमार घूम-घूम कर शराबबंदी का प्रचार कर रहे थे. शराबबंदी को लेकर इतना सख्त कानून बना दिया गया था कि हर जुर्म उसके सामने छोटा लगने लगा था. अपने आप में अनोखा मामला सामने आया था. शराबबंदी के नए कानून का सहारा लेकर बिहार के नालंदा जिले के एक पूरे गांव पर सामूहिक जुर्माना लगाया गया था. नालंदा जिले के कैलाशपुरी गांव के हर घर पर 5 हजार रुपए का जुर्माना लगा था.

हर घर में जिले के डीएम ने नोटिस भिजवाया था. आरोप था कि पूरे गांव में शराब पीने की प्रवृत्ति पाई गई थी. बताया जा रहा था कि तीन बार छापे के बाद भी गांव में शराब बनाने का सिलसिला नहीं थमा था. गांव वाले नाराज थे. उनका कहना था कि पुलिस उन लोगों के ऊपर जुर्माना लगाए जो शराब बना रहे हैं, पूरे गांव पर जुर्माना लगा देना कहां का न्याय है? एक-दो लोगों की गलती का भुगतान पूरा गांव क्यों करे? इस मामले ने काफी सुर्खियां बटोरी थी. सीएम नीतीश कुमार का गृहजिला है नालंदा. शराबबंदी कानून का सबसे बड़ा पेंच वहीं फंस गया.

शराबबंदी ऐसा मामला है कि इसके सामाजिक असर की दुहाई देकर कानूनी सख्ती की मुखालफत करना आसान नहीं है. लेकिन बिहार में कानूनन शराब पीना अवैध हो जाने के बाद से ही विरोधाभास दिखने लगे थे. मसलन- शराबबंदी कानून लागू हो जाने के बाद नीतीश कुमार कहा करते थे कि इस कानून की बदौलत जो आदमी पहले शराब पीता था, अब वो उन्हीं पैसों के दूध पिएगा. लोगों की सेहत बनेगी. परिवार में खुशियां आएंगी.

पिछले दिनों बिहार जाना हुआ, हमने बहुत ढूंढ़ा कि कोई ऐसा इंसान मिल जाए जिसकी जिंदगी में शराब की जगह दूध ने ले ली हो. एक इंसान भी ऐसा नहीं मिला. हो सकता है कुछ लोगों ने शराब छोड़ दी हो. लेकिन जिन लोगों ने शराब छोड़ दी वो दूध पीने लग गए हों, इस बात में संदेह है. इस बात में कोई शक नहीं कि शराब की बुराई का शिकार सबसे ज्यादा गरीब तबका था.

शराब ने गरीबों के परिवार बर्बाद किए थे. मेहनत मजदूरी करके परिवार चलाने वाले लोगों के लिए शराब की लत अभिशाप की तरह था. लेकिन ये भी उतनी ही बड़ी सच्चाई है कि शराबबंदी लागू होने के बाद इस कानून का शिकार भी सबसे ज्यादा गरीब तबका ही रहा. खुद सरकार ने गैर आधिकारिक तौर पर सर्वे करवाया तो पता चला कि इस कानून का सबसे ज्यादा शिकार दलित, ओबीसी और अत्यंत पिछड़ा वर्ग के लोग हुए हैं. इस कानून में बदलाव की जरूरत काफी पहले से महसूस की जा रही थी. इसके प्रावधानों में ढील देना जरूरी हो गया था.

Alcohol Ban

प्रतीकात्मक तस्वीर

बुधवार को नीतीश सरकार की कैबिनेट की बैठक हुई. इसमें 2016 के शराबबंदी कानून में फेरबदल को लेकर कैबिनेट ने मंजूरी दे दी. शराबबंदी कानून में फेरबदल को लेकर मॉनसून सत्र में बिल पेश किया जाएगा. बिहार में विपक्षी दल पहले से ही शराबबंदी के सख्त कानून का विरोध कर रहे थे. कानून में ढील देने वाले बिल को पास करने में कोई अड़चन नहीं आना चाहिए.

पिछले हफ्ते इस बिल को लेकर नीतीश कुमार ने कहा था, ‘शराबबंदी कानून में सुधार वाले बिल को मॉनसून सत्र में लाया जाएगा. हमें इस बारे में लोगों का फीडबैक मिला है. कानून के कुछ प्रावधानों का पुलिस और एक्साइज डिपार्टमेंट गलत इस्तेमाल कर रहे हैं. हमारा मकसद है कि किसी भी तरह से इस कानून का दुरुपयोग नहीं हो, लोगों को बेवजह परेशान नहीं किया जाए.’

बिहार में शराबबंदी का कानून अप्रैल 2016 में लागू हुआ था. रातोंरात शराब की दुकानें बंद हो गई. डिस्ट्रीब्यूटर्स के यहां ताले पड़ गए. शराब की फैक्ट्रियों को बंद करना पड़ा. कानून लागू होते ही पुलिस ने शराब के शौकीनों की धर-पकड़ शुरु कर दी. अब तक करीब 1.4 लाख लोगों को इस कानून का शिकार होना पड़ा है. बिहार में सबसे बड़ा अपराध है शराब पीना. इसके बाद भी इस अपराध में कमी आई हो या फिर शराबबंदी की वजह से दूसरे अपराध कम हुए हों, पारिवारिक झगड़ों में कमी आई हो, इस बारे में पुख्ता तौर पर कुछ नहीं कहा जा सकता.

पिछले साल नवंबर में राज्य के समाज कल्याण विभाग ने एक रिपोर्ट जारी की थी. नीतीश कुमार ने खुद ये रिपोर्ट सार्वजनिक की थी. इस रिपोर्ट को पांच जिलों की 2,368 महिलाओं के साथ बातचीत के आधार पर तैयार किया गया था. रिपोर्ट से पता चला कि शराबबंदी के बाद महज पांच फीसदी महिलाओं ने लगातार शारीरिक अत्याचार और छह फीसदी महिलाओं ने आर्थिक सहयोग से वंचित होने की शिकायत की.

रिपोर्ट में इस बात का भी खुलासा हुआ कि शराबबंदी के बाद घरेलू हिंसा के मामलों में भी कमी आई है. हालांकि नेशनल क्राइम रिकॉर्ड ब्यूरो यानी एनसीआरबी के आंकड़े कुछ अलग ही कहानी बता रहे हैं. एनसीआरबी के आंकड़ों के मुताबिक बिहार में साल 2016 में पति या ससुराल के अन्य सदस्यों के द्वारा महिला पर हिंसा करने के कुल 3,794 मामले दर्ज किए गए थे. जबकि साल 2015 में ये आंकड़ा 3,792 का था. यानी हिंसा के मामले कम नहीं हुए. एनसीआरबी के आंकड़ों के मुताबिक साल 2015 में बिहार में घरेलू हिंसा के कुल 161 मामले दर्ज किए गए थे, जो साल 2016 में बढ़कर 171 हो गए. इसमें भी कमी नहीं आई.

एक बात ये भी है कि इतना सख्त कानून लागू हो जाने के बाद भी शराबबंदी कितनी प्रभावी रही इसके दावे को लेकर विरोधाभास है. ये भी एक हकीकत है कि पूर्ण शराबबंदी के बाद भी बिहार में शराब की होम डिलीवरी की खबरें आ रही हैं. बिहार में शराब बैन है लेकिन इसके बावजूद शराब हासिल करना उतना भी मुश्किल नहीं है.

यहां शराबबंदी के बाद एक चुटकुला बड़ा फेमस हुआ था. बैन पर मजे लेते हुए कहा गया था कि शराबबंदी के बाद अब शादियों में नागिन डांस की विलक्षण कला अब विलुप्त हो जाएगी. पिछले दिनों बिहार में हुई एक शादी में जाने का मौका मिला. मुझे लगा कि शायद सच में इस कला के दर्शऩ से मैं महरूम रह जाऊंगा. अब कहां शराब के नशे में मदमस्त डांस देखने का मौका मिलेगा. लेकिन उस वक्त मैं हैरान रह गया जब बारात में नागिन डांस करने वालों की लाइन लग गई. सुरूर में कोई कमी नहीं थी. पुलिस थाने के सामने से बारात गुजर रही थी. सामने खड़े दारोगा जी भी जान रहे थे कि बारातियों के इस नागिन डांस के पीछे कौन सा नशा काम कर रहा है. लेकिन देखकर अनजान बनने में ज्यादा सुकून था. ऐसे मामले हर जगह देखने को मिल जाएंगे.

सवाल यहीं से शुरू हुआ कि जब यही हकीकत है तो इतने सख्त कानून की जरूरत ही क्यों. शराबबंदी कानून के प्रावधान इतने कठोर हैं कि एक्ट में शराब बनाने, रखने, बेचने और सप्लाई करने वालों को 10 साल से आजीवन कारावास और एक लाख रुपए जुर्माने की सजा हो सकती है. अगर कोई व्यक्ति शराब पीता है, तो उसे कम से कम 5 साल और अधिकतम 7 साल की सजा हो सकती है. 1 लाख से 7 लाख रुपये तक जुर्माने का भी प्रावधान है. इन सारे प्रावधानों में अब ढील दी जा रही है.

नए कानून के मुताबिक पहली बार शराब पीते पकड़े जाने पर 50 हजार के जुर्माना देने पर छोड़ दिया जाएगा. जुर्माना नहीं देने पर तीन महीने तक जेल का प्रावधान होगा. पहली बार शराब पीते पकड़े जाने पर जमानत मिलने का प्रावधान कर दिया गया है. जबकि अभी ये गैरजमानती अपराध के दायरे में है. नया कानून पहले से चल रहे मामलों पर भी लागू होगा. यहां तक कि जिन्हें पुराने कानून के आधार पर सजा मिल चुकी है, उन्हें भी नए कानून का लाभ मिलेगा.

दूसरी और तीसरी बार शराब पीते पकड़े जाने पर भी सजा में नरमी रखी गई है. दूसरी और तीसरी बार पकड़े जाने पर 2 से 5 साल तक की सजा होगी. शराब के उत्पादन और बेचने पर सजा के प्रावधान में, अगर पहली बार ऐसा करते पाया जाता है तो 2 साल की सजा का प्रावधान है, दूसरी बार पकड़े जाने पर कम से कम 10 साल की जेल का प्रावधान रखा गया है.

बताया जा रहा है कि शराबबंदी कानून के कम से कम 5 प्रावधानों में नरमी की गई है. छूट मिलने वाले प्रावधानों में पहले बार शराब पीने पर, पूरे परिवार के वयस्क सदस्यों की गिरफ्तारी पर और शराब पीने पर घर और गाड़ी को जब्त करने वाले कानून में ढील दी गई है. पूरे परिवार के वयस्क सदस्यों की गिरफ्तारी का कानून काफी सख्त है. इसमें घर की महिला सदस्यों को भी गिरफ्तार कर लिया जाता है. ऐसे मामलों में गिरफ्तारी के बाद किसी भी घर में सिर्फ नाबालिग बच्चे ही रह जाते हैं. सवाल उठता कि इस परिस्थिति में बच्चों की देखभाल कौन करेगा? इसलिए कानून के इस प्रावधान में नरमी लाना जरूरी था.

प्रतीकात्मक तस्वीर

प्रतीकात्मक तस्वीर

सरकार इस पर भी विचार कर रही है कि शराब पकड़े जाने पर पूरे गांव या समुदाय के खिलाफ जुर्माना लगाए जाने के प्रावधान में ढील दी जाए. शराबबंदी कानून में ऐसा प्रावधान है कि अगर किसी खास इलाके से शराब पकड़ी जाती है तो उस पूरे इलाके को लोगों पर जुर्माना लगाया जाए. सरकार विचार कर रही है कि ऐसे मामलों में शराब का उत्पादन करने, डिस्ट्रीब्यूटर और बेचने वालों से जुड़े लोगों पर भी जुर्माना लगाया जाए.

शराबबंदी के कानून का सबसे ज्यादा खामियाजा एससी समुदाय को भुगतना पड़ा है. कच्ची शराब के व्यवसाय से जुड़े ज्यादातर लोग महादलित मुसहर और पासी जाति से आते हैं. सख्त कानून की वजह से इस जाति के लोगों के बीच सरकार की लोकप्रियता घटी है. नीतीश कुमार के लिए महादलितों के बीच अपनी लोकप्रियता बनाए रखने के लिए कानून में ढील देना जरूरी था.

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