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नीरव मोदी मामला: अपनी गलतियों से सीखते क्यों नहीं भारतीय बैंक

आखिर वो क्या बात है पंजाब नेशनल बैंक में, जो घोटालेबाजों, धोखेबाजों और डिफॉल्टर्स की नजर में इसे आकर्षक बनाती है.

Updated On: Feb 19, 2018 07:13 PM IST

Sandipan Sharma Sandipan Sharma

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नीरव मोदी मामला: अपनी गलतियों से सीखते क्यों नहीं भारतीय बैंक

आखिर वो क्या बात है पंजाब नेशनल बैंक में, जो घोटालेबाजों, धोखेबाजों और डिफॉल्टर्स की नजर में इसे आकर्षक बनाती है. ऐसा इसलिए है क्योंकि पीएनबी कई बार धोखा खाने के बाद बाद भी अपनी गलतियों से सबक सीखने को तैयार नहीं है, नतीजा यह है कि उसे लग रहे झटके रुकने का नाम नहीं ले रहे.

मेहुल और नीरव से बैंक को लगे 11 हज़ार करोड़ के बड़े फटके से बहुत पहले भी पीएनबी इस तरह की परिस्थितियों का सामना कर चुका है. उस समय बैंक को एक और तेज तर्रार कारोबारी राजेंद्र सेठिया ने चूना लगाया था.

बैंक के लिए सेठिया से मोदी-चौकसी की जोड़ी तक की कहानी तीस वर्ष लंबी है, लेकिन तीन दशक बीत जाने के बाद भी पीएनबी ने घोटालों को रोकने का कोई सबक नहीं सीखा. आज भी बैंक की कार्यशैली धोखेबाजों को फ्रॉड करने से रोकने की नहीं बल्कि उन्हें इसके लिए प्रेरित करने की दिशा में काम करती है.

मेरी सेठिया से मुलाकात दिल्ली में कुछ वर्षों पहले एक शादी समारोह में हुई थी. सेठिया बिल्कुल नहीं बदले थे, तीखी मूंछे, शिष्टता से बात करने का तरीका और शानदार जीवन जीने की चाहत वैसी ही थी जैसी उनकी अस्सी के दशक में कारोबारी जीवन की ऊंचाई के दौरान थी.

80 का दशक वो समय था जब सेठिया की भव्य पार्टियों में निमंत्रण पाने के लिए उस समय के रसूखदार इंतजार करते थे. खिलाने-पिलाने के अलावा सेठिया की दरियादिली भी मशहूर थी. अपने घर में जमा कर के रखे गए महंगी घड़ियां, जूते, सूट और अन्य आकर्षक चीजें वो मेहमानों को पेश कर देते थे. इससे मेहमानों पर उनका खासा असर पड़ता था. उस समय बैंकों के हालत ये थी की वो सेठिया को कर्ज देने के लिए तैयार बैठे हुए थे.

nirav modi

नीरव मोदी

जब उनसे बात हुई तो उन्होंने जोर देकर बताया कि वो बैंक को धोखा देने वाले फ्रॉड नहीं थे जैसा कि पीएनबी ने उन्हें पेश किया. कई महीने तिहाड़ में काट चुके सेठिया ने दावा किया कि वो आरोपी नहीं बल्कि पीड़ित थे.

लेकिन पीएनबी का अपना अलग दावा था. पीएनबी ने सेठिया की कंपनी एसेल को चलाने के लिए बिना किसी सिक्योरिटी के उन्हें करोड़ों रुपए कर्ज दे दिए. बैंक का दावा था कि सेठिया ने फर्जी कागजातों के आधार बैंक से कर्ज ले लिया था. कुछ सालों के बाद जब सेठिया का धंधा मंदा पड़ने लगा तो बैंक को अपना रुपए डूबते दिखने लगे. बाद में बैंक को इस मामले में काफी नुकसान उठाना पड़ा.

कहते हैं कि अपनी गलतियों से नहीं सीखने वालों को भविष्य में तगड़ा झटका लगता है. पीएनबी इस समय ऐसे ही दौर से गुजर रहा है. सेठिया मामले के तीन दशक के बाद नीरव-चौकसी की जोड़ी ने बैंक को ठीक उसी तरह से ठगा है जैसे सेठिया ने बैंक को चूना लगाया था. सेठिया की तरह ही नीरव और मेहुल रसूखदार थे और उन्होंने भी बैंक के रूपए मारने के लिए वही तरीका अपनाया जैसा तीन दशक पहले सेठिया ने अपनाया था.

बैंक ने इन दोनों को इनके कारोबार के लिए इनके बिजनेस संपत्ति से कई गुना ज्यादा कर्ज दे दिया. बैंक ने फर्जी एलओयू ( लेटर ऑफ अंडरटेकिंग ) के सहारे इनकी कंपनियों को कर्ज दिया और नतीजा सबके सामने है.

लेकिन बड़ा सवाल ये है की आखिर केवल दो कर्मचारियों ने मोदी-चौकसी की जोड़ी को करोड़ों गबन करने में कैसे सहायता की. बैंकों में तीन वर्षों में कर्मचारियों के तबादले का नियम है, लेकिन कहा जा रहा है कि कुछ कर्मचारियों ने लगातार सात वर्षों तक फर्जी एलओयू जारी किया. ऐसा तभी हो सकता है जब उन कर्मचारियों को एक ही जगह पर लगातार काम करने दिया जाए. ऐसे में इसमें किसी वरिष्ठ अधिकारी के शामिल होने की संभावना से इंकार नहीं किया जा सकता है. इसके अलावा इतने बड़े कर्ज को बिना बड़े स्तर के अधिकारी की सहमति के बिना जारी ही नहीं किया जा सकता. सैकड़ों करोड़ के लेन-देन से बड़े अधिकारी कैसे अनभिज्ञ रहे और ये ऑडिटर्स की नजर से कैसे बच गए, ये जांचकर्ताओं के साथ साथ सेठिया को भी चौंका रहा है.

PNB

सच्चाई ये है कि ये पब्लिक सेक्टर बैंक्स अपनी गलतियों से सीखने की कोशिश नहीं करते. हरेक कुछ सालों के बाद इन बैंकों को जालसाज चूना लगा जाता है और ये लकीर पीटते रह जाते हैं. आज भी आम डिफॉल्टर से बैंक सख्ती से पेश आते हैं जबकि उच्च स्तर की पहुंच रखने वाले, सिस्टम की कमियां ढूढ़ कर बड़े कर्ज लेने वालों के लिए बैंक पलक पांवड़े बिछाए रहती है.

इस घोटाले में बैंक से लूटा गया पैसा आम भारतीय का था. ये धोखाधड़ी जमाकर्ताओं और करदाताओं के साथ हुई है. किसी दूसरी कंपनी में ऐसा होता तो उसे अब तक सजा और जुर्माना दोनों लगाकर उसे घुटने टेकने पर मजबूर कर दिया जाता. लेकिन ये दुर्भाग्य है कि भारत में बैंकों को घुटने पर अगर कोई ला सकता है तो वो हैं धोखेबाज अपराधी और जालसाज.

(इस लेख को अंग्रेजी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें.)

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